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राजनीति की चौसर पर तेजी से बढ़ते पीके, सलाहकार से लेकर उपाध्यक्ष बनने तक की कहानी

एक तरफ नीतीश कुमार अपने काम में जुटे हुए थे तो दूसरी ओर उस काम के बखान के लिए पीके अपने शब्दों की बाजीगरी दिखा रहे थे.

नई दिल्लीः प्रशांत किशोर राजनीति के चौसर पर भी बहुत ही तेजी आगे की ओर सरकते जा रहे हैं. कभी नरेंद्र मोदी-अमति शाह के नजदीक तो कभी राहुल के करीबी रहने वाले पीके अब नीतीश कुमार के दुलारे बन चुके हैं. 'नीतीश के सात निश्चय' और 'सबको सम्मान और अधिकार, फिर एक बार नीतीश कुमार' जैसे एक के बाद एक नारों के जरिए धुंधली पड़ रही छवी को फिर से चमकाने वाले पीके नीतीश कुमार के चहेते बन चुके हैं. वही पीके जिन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार के चुनावी अभियान को धार दिया था. ऐसी धार कि उसके आगे मोदी-शाह की जोड़ी भी विफल हो गई थी.

परदे के पीछे से पीके गढ़ रहे थे नीतीश की छवि 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले तो पीके को अपनी छवि निर्माण और सरकार के काम की जानकारी लोगों के बीच तक पहुंचाने के लिए के लिए बुलाया था. प्रशांत किशोर अपने काम में लगे हुए थे. एक तरफ नीतीश कुमार अपने काम में जुटे हुए थे तो दूसरी ओर उस काम के बखान के लिए पीके अपने शब्दों की बाजीगरी दिखा रहे थे.

पीके की जुबान में नीतीश का काम

लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने वाले नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को अपनी कुर्सी पर बैठा दिया था. मांझी को सत्ता सौंपकर नीतीश कुमार ने न सिर्फ विरोधियों को चौंका दिया था बल्कि खुद को परदे के पीछे कर लिया था. परदे के पीछे रहते हुए नीतीश कुमार पीके से मिले और अपने (नीतीश कुमार) लिए काम करने को कहा. फिर क्या था, प्रचार अभियान ने जोर पकड़ा और हर जगह सरकार के वादे और उसे पूरा करने के पोस्टर लगने शुरू हो गए. हर तरफ नीतीश सरकार के काम काज को ढ़िंढोरा पीटा जाने लगा. सड़कों पर बड़े-बड़े पोस्टर लगाए गए तो सोशल मीडिया पर भी जमकर प्रचार शुरू कर दी गई.

सत्ता के नजदीक पहुंचे पीके

देखते ही देखते नीतीश कुमार लोगों के घर घर तक प्रचार माध्यम के जरिए पहुंच गए. प्रचार के लिए प्रयोग किए गए शब्द और नारे लोगों के जुबान पर चढ़ गई. 2015 के विधानसभा चुनाव का नतीजा ये रहा कि राज्य में फिर से नीतीश कुमार की सरकार बनी और पीके को नीतीश ने कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया. कहा जाता है कि 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू यादव को साथ लाने में भी प्रशांत किशोर ने अहम भूमिका निभाई. महागठबंधन के पीछे पीके का ही दिमाग माना जाता है.

इसके बाद से ही कयास लगाया जा रहा था कि पीके सक्रिय राजनीति में आ सकते हैं. इस बारे में जेडीयू नेताओं से कई बार सवाल भी किए गए लेकिन सभी नेताओं ने इस सवाल पर या तो चुप्पी साध ली या इसे खारिज कर दिया. तभी खबर आई कि प्रशांत किशोर सक्रिय राजनीति में आ रहे हैं और वे जेडीयू में शामिल हुए.

यूं ही नहीं कोई पीके बन जाता है

पार्टी में शामिल होने के बाद उन्हें नंबर दो की कुर्सी मिली. पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया. उपाध्यक्ष बनते ही पीके ने अपनी राजनीतिक कौशल दिखाना शुरू कर दिया. लोगों के बीच घूम-घूमकर प्रशांत किशोर पार्टी के लिए युवा काडर तैयार करने में जुट गए.

किसी को भनक भी नहीं लगी और पीके ने अपना पहला लक्ष्य तय कर दिया. पटना यूनिवर्सिटी में अध्यक्ष पद पर पहला निशाना साधा और पार्टी के उम्मदीवार को जिताने में कामयाब हो गए. पीके ने छात्र जेडीयू की ओर से मोहित प्रकाश को चुनावी मैदान में उतारा और जीत दिलवाने में अहम भूमिका निभाई. हालांकि, जीत के बाद उनपर कई तरह के आरोप भी लगे.

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जेडीयू के तेवर बदलने में जुट गए हैं पीके

पार्टी में पीके के शामिल होने के बाद पीके ने जेडीयू को नए तेवर और कलेवर देने की कोशिश में जुट गए हैं. पार्टी प्रवक्ताओं को टीवी डिवेट के लिए तैयार कर रहे हैं. पार्टी के अंदर युवाओं को जगह दी जा रही है. नए और युवा कार्यकर्ताओं को पार्टी के साथ जोड़ा जा रहा है. एबीपी न्यूज़ के शिखर सम्मेलन कार्यक्रम के दौरान अध्यक्ष पद को लेकर खुद नीतीश कुमार भी कह चुके हैं कि ''पार्टी जिसे चाहेगी उसे कमान सौंप सकती है. यह हमारी पार्टी नहीं है.''

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