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Pollution in Delhi: दिल्ली में 1970 से प्रदूषण ढा रहा सितम, जानें कैसे वक्त के साथ गैस चैंबर बनती चली गई राजधानी

AQI in Delhi: दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण पिछले 50 सालों से लोगों का जीवन दुश्वार कर रहा है. बस गुजरते वक्त के साथ बढ़ते प्रदूषण के कारण बदलते रहे हैं.

Pollution Level in Delhi: अक्टूबर-नवंबर का महीना आते ही समूचा दिल्ली-एनसीआर गैस चैंबर में तब्दील हो जाता है. पिछले कुछ सालों में यह समस्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है. पिछले कुछ सालों की बात की जाए तो दिल्ली सरकार लगातार कहती रही है कि दिल्ली एनसीआर के गैस चैंबर में तब्दील होने की वजह पड़ोसी राज्यों में किसानों द्वारा जलाई जा रही पराली है क्योंकि पराली का धुआं दिल्ली एनसीआर में पहुंचता है और उसको गैस चैंबर में तब्दील कर देता है. लेकिन दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण की समस्या कोई नई नहीं है. दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण पिछले 50 सालों से लोगों का जीवन दुश्वार कर रहा है. बस गुजरते वक्त के साथ बढ़ते प्रदूषण के कारण बदलते रहे हैं.

70 के दशक से प्रदूषण ढा रहा सितम

दिल्ली में प्रदूषण की समस्या आज की नहीं बल्कि 70 के दशक से ही दिल्ली में प्रदूषण लोगों के जीवन को दुश्वार करता रहा है. बस फर्क इतना है कि उस दौरान जो कारण थे वह आज के कारणों से अलग थे. वो हैं सुप्रीम कोर्ट के वकील विजय पंजवानी. विजय पंजवानी का दिल्ली के प्रदूषण से खास नाता रहा है. ये कहा जा सकता है कि जब से अदालत से प्रदूषण के रोकथाम को लेकर आदेश जारी होने शुरू हुए तभी से विजय पंजवानी उन मामलों से जुड़े रहे हैं. इसी वजह से विजय पंजवानी जब आज दिल्ली में प्रदूषण के हालात देखते हैं तो उनको 1970 का वो दशक भी याद आता है जब दिल्ली के आसमान में रात में तारे देखना भी मुश्किल था.

विजय पंजवानी प्रदूषण के उन मामलों से भी जुड़े हैं जो सालों पहले शुरू हुए थे और आज तक चले आ रहे हैं. 90 के दशक में एमसी मेहता ने जो याचिकाएं दायर की थीं, उनका निपटारा आज तक नहीं हो सका है क्योंकि प्रदूषण का वो मामला आज भी उसी तरह ज्वलंत है. 1990 में पर्यावरणविद और वकील एम सी मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली प्रदूषण से जुड़ी याचिका लगाई थी, जिन पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट पिछले 25 सालों के दौरान अलग-अलग आदेश देता रहा है और अभी भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका उसी तरह लम्बित हैं.

इसी वजह से जब भी प्रदूषण को लेकर कोई भी मामला सामने आता है तो पर्यावरणविद और वकील एम सी मेहता का नाम उससे जुड़ जाता है. 1985 में पहली बार एम सी मेहता ने दिल्ली के प्रदूषण को लेकर एक जनहित याचिका दायर की थी और उसके बाद से लेकर अब तक कई और याचिकाएं दायर होती रही हैं, जिन पर वक्त वक्त पर सुप्रीम कोर्ट निर्देश देता रहा है.

दिल्ली प्रदूषण की बात की जाए तो यह कोई नया नहीं है सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में साल 1985 में एमसी मेहता ने एक जनहित याचिका दायर की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उस पर गंभीरता से सुनवाई शुरू हुई साल 1996 से. 

सुप्रीम कोर्ट ने दिए कई आदेश

1996 में सुप्रीम कोर्ट ने एम सी मेहता की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली के आस-पास चल रहे हैं 246 ईंट के भट्टों को बंद करने का निर्देश दिया क्योंकि उन ईंट के भट्टों की वजह से दिल्ली और आसपास की हवा लगातार खराब हो रही थी. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उसी दौरान सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों को भी दिल्ली से हटाकर बाहर भेजने का निर्देश दिया और यह कार्रवाई साल 2004 तक चलती रही. इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय से कहा कि वह एक एक्सपर्ट कमेटी बनाए जो सुप्रीम कोर्ट को जरूरत पड़ने पर मदद कर सके.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद साल 1998 में एनवायरनमेंट पॉल्यूशन अथॉरिटी यानी एपीसीए का गठन किया गया, जिसका काम सरकार के अलग-अलग विभागों के बीच सामंजस्य बैठा कर कोर्ट के आदेशों का पालन करवाना था. इस एपीसीए की अध्यक्षता भूरेलाल को दी गई. इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में डीजल वाहनों की वजह से होने वाले प्रदूषण को भी गंभीरता से लिया और आदेश जारी करते हुए कहा कि डीजल बसों और गाड़ियों को सीएनजी में तब्दील किया जाए और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च 2000 की डेट लाइन भी तय कर दी. हालांकि इस पर अमल करने में कुछ और साल लग गए.

बढ़ती गाड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर की चिंता

साल 2001 आते-आते सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में लगातार बढ़ती गाड़ियों की संख्या को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि दिल्ली को वाहन प्रदूषण से बचाने के लिए जरूरी है कि दिल्ली के आसपास एक पेरिफेरल रोड तैयार की जाए, जिससे दिल्ली से होकर गुजरने वाले वाहन बाहर ही बाहर निकल सकें. उसी दौरान ईस्टर्न और वेस्टर्न पेरिफेरल का सुझाव के सामने आया था लेकिन वह स्टोन ऑपरेशन शुरू होने में उसके बाद करीबन डेढ़ दशक से ज्यादा का वक्त गुजर गया.

साल 2004-05 आते-आते लंबित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण की एक वजह अरावली में चल रहे खनन को भी माना क्योंकि उसकी वजह से दिल्ली एनसीआर में काफी धूल बढ़ रही थी. इस वजह से सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह से खदान पर भी नियंत्रण करने का आदेश जारी किया. इसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट लगातार दिल्ली प्रदूषण के मुद्दे पर सुनवाई करता रहा और केंद्र से लेकर राज्य सरकारों की तरफ से उठाए गए कदमों को लेकर सवाल भी उठाता रहा. साथ ही निर्देश भी जारी किए.

साल 2014 आते-आते सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली प्रदूषण को लेकर एक के बाद एक कई सारे आदेश जारी किए. इनमें प्रदूषण फैलाने वाले लोगों के खिलाफ जुर्माना लगाने के साथ ही कंपनसेशन सेस, गाड़ियों के लिए भारत स्टेज 4, 5 और 6 की रूपरेखा तैयार करने के साथ ही पार्किंग फीस बढ़ाने के साथ साथ एनजीटी ने 10 साल से ज़्यादा पुरानी डीज़ल गाड़ियों और 15 साल से ज्यादा पुरानी पेट्रोल गाड़ियों के चलाने पर रोक लगाने का आदेश जारी किया. वहीं कूड़ा जलाने और प्लास्टिक जलाने पर रोक लगाने का निर्देश जारी किया. 

साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर दीवाली के दौरान बिकने वाले पटाखों की बिक्री पर भी रोक का आदेश जारी कर दिया था. 2017 में इसी आदेश को सख्ती से लागू करने का निर्देश जारी किया गया. इसके साथ ही दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में जलाई जा रही पराली को जलाने से रोकने और किसानों को जागरुक करने का आदेश दिया गया. इसी तरह से साल 2019, 2020 और इस साल भी सुप्रीम कोर्ट लगातार दिल्ली समेत पूरे एनसीआर मे बढ़ते प्रदूषण के मुद्दे पर सुनवाई करता रहा है. यानी कुल मिलाकर दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण की समस्या कोई नई नहीं है सालों से चली आ रही और साल दर साल ये समस्या और ज़्यादा विकराल रूप धारण करती जा रही है. 

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