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Delimitation Bill: परिसीमन से छंट जाएंगे मुसलमान! क्यों 72 सालों में सिर्फ 541 मुस्लिम सांसद लोकसभा पहुंचे? पढ़ें इनसाइड स्टोरी

Delimitation Bill Explained: लोकसभा में परिसीमन बिल पर चर्चा चल रही है, लेकिन इस बीच असम केा परिसीमन भी याद आ रहा है, क्योंकि इसमें मुसलमानों की हकमारी की गई थी. यह मॉडल देश में लागू होगा?

लोकसभा में महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े 3 बिलों पर चर्चा जारी है. विपक्ष ने इन बिलों का विरोध किया है. बिलों पर चर्चा के लिए 16 और 17 अप्रैल को 15 घंटे का समय तय किया गया है. कल शाम 4 बजे वोटिंग की जाएगी. संशोधन बिल में लोकसभा सांसदों की संख्या 850 करने का प्रस्ताव है, जबकि मौजूदा संख्या 543 है. राज्यों में 815 और केंद्र शासित प्रदेशों में 35 तक सीटें होंगी. सीटों की सटीक संख्या तय करने के लिए परिसीमन भी किया जाएगा, लेकिन इसमें एंगल उठ रहा है मुसलमानों का, क्योंकि इतिहास में झांक कर देखें तो परिसीमन से मुसलमानों की पैकिंग, क्रैकिंग और स्टैकिंग की गई है, जिसका हालिया उदाहरण असम है...

पैकिंग, क्रैकिंग और स्टैकिंग ठीक-ठीक क्या हैं?

पैकिंग, क्रैकिंग और स्टैकिंग अमेरिका में चुनाव क्षेत्रों की हेरफेर (gerrymandering) की तीन मुख्य तकनीकें हैं. भारत में ये शब्द 2023 के असम परिसीमन के बाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुए.

  • पैकिंग: किसी समुदाय (यहां मुसलमानों) के वोटरों को एक या दो सीटों में ही ठूंस दिया जाए, ताकि वे उन सीटों पर भारी बहुमत से जीतें, लेकिन बाकी सीटों में उनका वोट बेकार हो जाए.
  • क्रैकिंग: मुसलमान-बहुल इलाकों को कई सीटों में बांट दिया जाए, ताकि किसी एक सीट पर वे बहुमत न बना सकें और हिंदू-बहुल इलाकों में उनके वोट बिखर जाएं.
  • स्टैकिंग: छोटे-छोटे हिंदू-बहुल इलाकों को एक साथ जोड़कर नई सीट बनाई जाए, ताकि मुसलमानों के मुकाबले हिंदू वोटरों का बहुमत बन जाए.

ये तकनीकें जनसंख्या, भूगोल और प्रशासनिक आधार पर सीमाएं बदलते वक्त इस्तेमाल की जा सकती हैं. भारत में परिसीमन संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत होता है, यानी हर सीट की जनसंख्या लगभग बराबर हो. चुनाव आयोग का कहना है कि यह पूरी तरह तटस्थ और जनसंख्या आधारित है, न कि धर्म आधारित, लेकिन आलोचक कहते हैं कि 2023 असम में इन तकनीकों का इस्तेमाल हुआ.

मुसलमानों की लोकसभा में भागीदारी कितनी है?

2011 जनगणना के मुताबिक, मुसलमान भारत की आबादी का करीब 14.2% हैं, लेकिन लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व हमेशा कम रहा है.

 

72 सालों में कुल 541 मुस्लिम लोकसभा सांसद चुने गए
72 सालों में कुल 541 मुस्लिम लोकसभा सांसद चुने गए

बांग्लादेशी राजनीतिज्ञ मोहम्मद अब्दुल मन्नान की किताब 'एट द बॉटम ऑफ द लैडर: स्टेट ऑफ द इंडियन मुस्लिम' के मुताबिक, 1952 से 2024 तक कुल 541 मुस्लिम लोकसभा सांसद चुने गए. 2024 में इनमें से 21 INDIA गठबंधन से और बाकी NDA या अन्य पार्टियों से थे. गैप साफ है, 14% आबादी बनाम 4.4% प्रतिनिधित्व. हालांकि, मुख्य कारण सिर्फ परिसीमन नहीं, बल्कि पार्टियां मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट ही कम देती हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में मुसलमानों की आबादी केंद्रित है (नेचुरल पैकिंग) और वोटर लिस्ट में नाम जुड़ने की समस्या भी बनी रहती है.

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई ने कहा कि 2006 की सच्चर कमेटी ने पहली बार इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया. रिपोर्ट में कहा गया कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में कुछ SC आरक्षित विधानसभा सीटें उन इलाकों में हैं जहां मुसलमान ज्यादा और SC कम हैं, जबकि सामान्य सीटों में उलटा है. कमेटी ने इसे एलिगेशन माना और उम्मीद जताई कि तब चल रहे परिसीमन में इसे सुधारेंगे. रिपोर्ट ने साफ कहा कि इससे मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी प्रभावित हुई, लेकिन रिपोर्ट ने कोई 'साजिश' का सबूत नहीं दिया. सिर्फ आंकड़े दिखाए.

 

परिसीमन से मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी प्रभावित
परिसीमन से मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी प्रभावित

तो क्या परिसीमन में मुसलमानों की हकमारी हुई?

नॉर्वेजियन शोधकर्ता फ्रांसेस्का रेफसम जेन्सेनियस ने 2013 में स्टडीज इन इंडियन पॉलिटिक्स में जर्नल में पेपर प्रकाशित करते हुए लिखा, क्या परिसीन कमिशन ने मुस्लिमों से भेदभाव किया? उन्होंने चुनाव आयोग के आर्काइवल रिकॉर्ड्स और 1971 जनगणना के ब्लॉक-लेवल डेटा से 14 राज्यों की 1970 के दशक वाली 1974-2007 वाली सीटों का विश्लेषण किया. नतीजा:

  1. SC आरक्षित सीटों में मुसलमानों की औसत आबादी सामान्य सीटों से कम थी, जबकि SC आरक्षित सीटों में SC आबादी ज्यादा होती है, बाकी समुदाय कम.  
  2. मुसलमान 52 विधानसभा सीटों में बहुमत में थे, इनमें सिर्फ 2 SC आरक्षित थीं.
  3. SC % समान रखकर तुलना करने पर मुसलमानों और सामान्य सीटों में कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं हुआ.

जेन्सेनियस ने साफ लिखा, 'सच्चर रिपोर्ट का सबूत भटकाने वाला था.  कोई सिस्टमिक डिस्क्रिमिनेशन नहीं मिला.' यह स्टडी आज भी सबसे प्रमाणिक मानी जाती है.

 

जेन्सेनियस ने लिखा कि सच्चर रिपोर्ट का सबूत भटकाने वाला था
जेन्सेनियस ने लिखा कि सच्चर रिपोर्ट का सबूत भटकाने वाला था

2023 में 2001 जनगणना आधारिक असम परिसीमन कमीशन ने 126 विधानसभा और 14 लोकसभा सीटों की नई सीमाएं तय कीं. कुल सीटें नहीं बदलीं, लेकिन वोटर कंपोजिशन बदल दिया. पहले मुसलमान बहुमत वाली 31-35 विधानसभा सीटें थीं, अब घटकर 20-23 सीटें रह गईं.

  • बारपेटा और धुबरी लोकसभा: बारपेटा से तीन मुसलमान-बहुल विधानसभा सेगमेंट (चेंगा, बाघबर और मांडिया) धुबरी में ट्रांसफर किए गए. इससे मुसलमानों का प्रतिशत घटा (क्रैकिंग) और धुबरी में बढ़ा (पैकिंग). बारपेटा विधानसभा को SC आरक्षित बना दिया गया. मुसलमान उम्मीदवार अब वहां नहीं लड़ सकते.
  • हैलाकांडी जिला (बराक वैली): 3 सीटें घटकर 2 रह गईं. अलगापुर-काटलीचेरा को मिलाकर नई बड़ी सीट (80% मुस्लिम) बनाई, हैलाकांडी को हिंदू-बहुल बनाया (स्टैकिंग).
  • बराक वैली कुल: पहले 15 मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें थीं जो अब 13 बचीं.

क्या 2026-29 का प्रस्तावित राष्ट्रीय परिसीमन मुसलमानों पर असर डाल सकता है?

अभी बिल पास नहीं हुआ. सरकार का प्लान है कि 2011 जनगणना के आधार पर हर राज्य को मौजूदा सीटों पर 50% बढ़ोतरी की जाए, लेकिन अगर शुद्ध जनसंख्या आधार पर हुआ तो उत्तर भारत को ज्यादा फायदा होगा और दक्षिण को कम. मुस्लिम-बहुल इलाकों में अगर असम जैसी क्रैकिंग-पैकिंग हुई तो प्रतिनिधित्व और घट सकता है. अभी कोई राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन नहीं, लेकिन एक्सपर्ट्स चिंता जता रहे हैं कि मुसलमान-बहुल पॉकेट्स को पैक किया जा सकता है. SC/ST सब-कोटा रहेगा, मुसलमानों के लिए अलग आरक्षण नहीं होगा.


Delimitation Bill: परिसीमन से छंट जाएंगे मुसलमान! क्यों 72 सालों में सिर्फ 541 मुस्लिम सांसद लोकसभा पहुंचे? पढ़ें इनसाइड स्टोरी

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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