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'संसाधन की कमी से लेकर युवा पीढ़ी को जोड़ने तक', नए महासचिव एमए बेबी के सामने है ये पांच चुनौतियां

कमजोर हो चुकी सीपीएम को नई ऊर्जा देने की जिम्मेदारी अब एमए बेबी के कंधों पर है. विचारधारा, नेतृत्व और संसाधनों की तंगी के बीच पार्टी को संभालना है.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) के शीर्ष पद पर बड़ा बदलाव हुआ है. तमिलनाडु के मदुरै में आयोजित पार्टी की 24वीं कांग्रेस में केरल के वरिष्ठ नेता मरियम अलेक्जेंडर बेबी उर्फ एमए बेबी को नया महासचिव चुना गया है. एमए बेबी अब सीताराम येचुरी की जगह लेंगे और पार्टी की बागडोर ऐसे समय में संभालेंगे जब पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर है.

एमए बेबी कोई नया नाम नहीं हैं. बल्कि वो लंबे समय से पार्टी की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में एक्टिवली भूमिका निभा चुके है. बेबी न सिर्फ केरल में एक स्थापित नेता हैं बल्कि उन्हें विचारधारा और संगठनात्मक समझ के लिए भी जाना जाता है. पार्टी के भीतर उनकी छवि एक सुलझे हुए, जमीनी नेता की है जो संवाद और संगठन को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन बेबी का यह कार्यकाल आसान नहीं होने वाला. ऐसे समय में जब पार्टी का जनाधार सिमटता जा रहा है और संसाधन सीमित हैं, उन्हें कई मोर्चों पर एक साथ जूझना होगा. 

इस रिपोर्ट में विस्तार से जानते हैं वो पांच सबसे बड़ी चुनौतियां जिनका सामना एमए बेबी को महासचिव बनने के बाद करना पड़ सकता है.

नई पीढ़ी को जोड़ना

कभी युवाओं को आंदोलनों से जोड़ने वाली साम्यवादी विचारधारा अब लोगों को उतना आकर्षित नहीं कर पा रही है. कुछ विश्वविद्यालयों को छोड़ दें तो छात्र राजनीति में पार्टी की उपस्थिति कमजोर हुई है. एमए बेबी को यह देखना होगा कि कैसे पार्टी अपनी विचारधारा को युवाओं की भाषा में दोबारा ढाल सके और उन्हें आंदोलन, राजनीति और संगठन से जोड़े. 

वित्तीय संकट और संसाधनों की कमी 

CPI(M) उन गिनी-चुनी पार्टियों में है जो चुनावी बॉन्ड नहीं लेती. इसके चलते पार्टी को चुनावी फंडिंग और रोज़मर्रा के खर्चों के लिए भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. केवल केरल में सत्ता में होने के कारण पार्टी का संसाधनों पर पूरा नियंत्रण नहीं है. राज्यों में पार्टी कार्यालयों और कार्यक्रमों के लिए फंड जुटाना एमए बेबी के लिए सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती बनकर उभरेगा.

जननेताओं की नई पौध तैयार करना 

हरकिशन सिंह सुरजीत और ज्योति बसु जैसे बड़े नेताओं के जाने के बाद पार्टी में करिश्माई जननेताओं की कमी महसूस की जा रही है. अब नेतृत्व को स्थानीय स्तर से उभारने की ज़रूरत है. बेबी को बूथ से लेकर राज्य स्तर तक ऐसे नेताओं को आगे लाना होगा जो जमीन से जुड़े हों और जनता के बीच पकड़ रखते हों.

आंदोलन और चुनावी राजनीति के बीच की खाई पाटना

सीपीएम आज भी सड़कों पर आंदोलनों में दिखाई देती है, लेकिन वह आंदोलन चुनावी समर्थन में तब्दील नहीं हो पाता. यह विरोधाभास पार्टी के लिए लंबे समय से एक उलझन बना हुआ है. एमए बेबी के लिए यह जरूरी होगा कि आंदोलन और चुनावी रणनीति के बीच संतुलन स्थापित किया जाए ताकि पार्टी का प्रभाव सिर्फ प्रदर्शन तक सीमित न रहे.

विचारधारा में लचीलापन

आज का भारत वैश्वीकरण और तकनीकी बदलावों के दौर में है. ऐसे में शुद्ध वैचारिक रुख़ अपनाना पार्टी को जनता से दूर कर सकता है. एमए बेबी को साम्यवाद और समकालीन मुद्दों के बीच एक ऐसा संतुलन बनाना होगा जो न सिर्फ पार्टी के मूल सिद्धांतों को जीवित रखे बल्कि उसे प्रासंगिक भी बनाए. 

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