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US Iran War: लंबी चली ईरान से जंग तो क्या होगा ट्रंप का एंडगेम, भारत पर कितना असर?

US Iran War: वियतनाम, अफगानिस्तान और इराक के बाद क्या ईरान भी अमेरिका के लिए ‘क्वैगमायर’ यानी युद्ध का दलदल बन सकता है? जानें इस जंग का इतिहास और भारत पर पड़ने वाले संभावित असर.

दुनियाभर की सेनाओं में अंग्रेजी का एक शब्द प्रचलित है क्वैगमायर. हिंदी में इसका मतलब होता है दलदल. जंग अक्सर एक ऐसा दलदल साबित होता है, जिसमें दुनिया की बड़ी से बड़ी और ताकतवर से ताकतवर सेना भी फंस जाती है.  लिहाजा अमेरिका भी इसका अपवाद नहीं है. अगर इतिहास की बात की जाए तो अमेरिका इकलौता ऐसा देश है, जिसे सबसे ज्यादा ऐसी परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ा है, जिसकी शुरुआत वियतनाम में छेड़ी गई जंग से होती है. उत्तरी और दक्षिणी वियतनाम के बीच चल रही जंग में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रहे लिंडन बी जॉनसन ने अपनी बादशाहत साबित करने के लिए दक्षिणी वियतनाम की जिम्मेदारी खुद के ऊपर ले ली और जंग में उतर गए. उम्मीद थी कि अमेरिका की ताकत के सामने उत्तरी वियतनाम टिक नहीं पाएगा और जंग जल्द खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 

रूस और फिर चीन के सपोर्ट से उत्तरी वियतनाम ने अमेरिकी सेना को नाकों चने चबवा दिए. दो-चार दिन की तैयारी कर जंग में उतरे अमेरिका के सैनिकों की लाशें बिछने लगीं. जंग खिंचती गई, अमेरिकी सैनिक मरते गए और जब करीब 58,000 अमेरिकी सैनिकों की लाशें बिछ गईं तो 20 साल के बाद अमेरिकी फौज को वियतनाम से भागना पड़ा. जिस मकसद से अमेरिका ने ये हमला किया था वो भी पूरा नहीं हुआ. अमेरिका के हटते ही दक्षिणी वियतनाम पर उत्तरी वियतनाम का कब्जा हो गया और अमेरिका की पूरी मेहनत पर पानी फिर गया.

अफगानिस्तान में अमेरिका का हाल

अफगानिस्तान में भी अमेरिका के साथ यही हुआ. ओसामा बिन लादेन के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद जब अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में दाखिल हुई तो इकलौता मकसद था तालिबान का खात्मा. यहां भी अमेरिका फंसा रहा. अरबों डॉलर खर्च किए. हजारों अमेरिकी सैनिक मारे गए. 2021 में जब अमेरिका 20 साल की लड़ाई के बाद अपना पूरा साजो सामान समेटकर अपने सैनिकों को लेकर खाली हाथ जंग से बाहर निकला तो कुछ ही दिनों के अंदर तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर अपना कब्जा कर लिया. आज की तारीख में भी अफगानिस्तान पर तालिबान की ही हुकूमत है.

इराक में अमेरिका के साथ क्या हुआ?

इराक भी अमेरिका के लिए क्वैगमायर ही तो था. सद्दाम हुसैन के खात्मे के लिए साल 2003 में इराक में उतरे अमेरिकी सैनिकों को वहां से निकलने में 8 साल का वक्त लग गया. सद्दाम हुसैन का भले ही खात्मा हो गया, 21 दिनों में ही अमेरिका ने शुरुआती जंग जीत ली, लेकिन उसके बाद इराक के गृहयुद्ध को रोकने की कोशिश में अमेरिकी सैनिक फंसते चले गए. करीब 165 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए. चार हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए और आखिरकार बिना कुछ हासिल किए 2011 में अमेरिकी सेना इराक से बाहर निकल गई, लेकिन उसके बाद आईएसआईएस जैसे खतरनाक आतंकी संगठन और उनके अलग-अलग समूह बनते गए जो आज भी अमेरिका के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक हैं.

ईरान के हमले से घबराया अमेरिका

अमेरिका के लिए ईरान एक और क्वैगमायर बनता जा रहा है. जहां अमेरिका ने सत्ता परिवर्तन के मकसद से हमला किया था कि बस अयातुल्ला अली खमेनेई को मार दें तो सत्ता बदल जाए और अमेरिका खुद को इस जंग से बाहर निकाल ले. हालांकि, लेकिन अभी तक ऐसा हो नहीं पाया है. अयातुल्ला अली खमेनेई को तो अमेरिका और इजरायल ने हमले के पहले ही दिन मार दिया था, लेकिन उसके बाद अमेरिका के साथ जो हो रहा है, वो अमेरिका और खास तौर से ट्रंप की सोच से कोसों दूर है. अली खामेनेई के मरने के बाद ईरान की काउंसिल ने अली खमेनेई के बेटे मुज्तबा को ईरान का सुप्रीम लीडर घोषित कर दिया है. अब अमेरिका तेहरान पर हमला कर रहा है और ईरान अमेरिका के सभी दोस्तों पर. पूरा मिडिल ईस्ट धुंआ-धुंआ हो रखा है. हजारों लोग मारे जा चुके हैं, लेकिन इस जंग के खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं.

कब हुई ईरान युद्ध की शुरुआत

जंग की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी. इसके बाद से अब तक अमेरिका ने ईरान के करीब 2 हजार से भी ज्यादा ठिकानों को बम गिराकर नेस्तनाबूद कर दिया है. अयातुल्ला अली खमेनेई समेत कई टॉप लीडर मार दिए हैं. परमाणु ठिकानों से लेकर ऑयल रिफाइनरी और नागरिक रिहायशी तक को अमेरिका ने धुंआ-धुंआ कर रखा है, लेकिन अमेरिका को कुछ खास हासिल नहीं हुआ है, बल्कि उल्टे नुकसान ही उठाना पड़ा है. जवाबी हमला तो ईरान ने भी किया ही है. भले ही ईरान की मिसाइल और ड्रोन अमेरिका को सीधे निशाना नहीं बना पाई हैं, लेकिन इजरायल और खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों का तो ईरान ने मिसाइल और ड्रोन मारकर नुकसान कर ही दिया है. अभी 1200 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इनमें ईरानी बच्चे भी हैं, जिनके स्कूल पर अमेरिका ने हमला किया था. अमेरिकी सैनिकों के ठिकानों पर भी ईरान ने मिसाइल दागी थीं. इस तबाही के बावजूद न तो ट्रंप को पता है कि इस जंग को खत्म कैसे किया जाए और न ही ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा को इस बात का एहसास है कि उन्हें चाहिए क्या.

युद्ध को लेकर ट्रंप का बयान

नतीजा जंग खिंचती जा रही है. ट्रंप कह रहे हैं कि ईरान से समझौता नहीं होगा और ईरान को बिना किसी शर्त के सरेंडर करना होगा. वो तो ईरान की जनता से ही अपील कर रहे हैं कि ईरान के लोग मुज्तबा का नेतृत्व स्वीकार न करें, लेकिन अभी ईरान में अमेरिका की सुनने वाला कोई नहीं है. ऐसे में अमेरिका फिर उसी दोराहे पर खड़ा हो गया है, जैसे वो इराक और अफगानिस्तान में हुआ था.

ईरान ने अमेरिका के इरादों पर फेरा पानी

इराक में अमेरिका ने घुसकर सद्दाम हुसैन को मार तो दिया, लेकिन सद्दाम के बाद कौन इसका जवाब अमेरिका के पास भी नहीं था. अफगानिस्तान में भी यही हाल हुआ. तालिबान के बाद कौन का जवाब अमेरिका के पास नहीं था तो वो जंग के दलदल में फंसता चला गया. अब ईरान में भी अली खामेनेई के बाद कौन का जवाब अमेरिका के पास नहीं है. कहने को तो ट्रंप ने 28 फरवरी के हमले के बाद ही कहा था कि जब हमारा काम खत्म हो जाएगा तो आप अपनी सरकार की बागडोर अपने हाथ में ले लेना. काम खत्म भी हुआ अमेरिका का. खमेनेई को मार दिया, लेकिन सत्ता नहीं बदली. बल्कि ईरान ने मुज्तबा को कमान देकर ट्रंप के इरादों पर पानी फेर दिया.

अमेरिका के पास क्या बचता है विकल्प?

अमेरिका के पास ले-देकर इकलौता विकल्प यही बचता है कि या तो वो खाली हाथ वापस लौट आए या फिर वो हवाई हमले में पूरा ईरान तबाह कर दे, जो मुमकिन नहीं है. या फिर वो अपनी सेना को ईरान की जमीन पर उतारे. क्योंकि उसके बिना आईआरजीसी को खत्म नहीं किया जा सकता. जब तक आईआरजीसी खत्म नहीं होगी, ईरान लड़ता रहेगा. मुजतबा ने भी कमान संभालने के बाद अपने इरादे जाहिर कर ही दिए हैं ईरान लड़ता रहेगा. असली मुश्किल यहीं से शुरू होती है, क्योंकि ईरान में जमीनी जंग अमेरिका के लिए बेहद महंगी और खतरनाक साबित हो सकती है. मुजतबा के नेतृत्व में ईरान की फौज अमेरिका सेना का मुकाबला करने के लिए तैयार बैठी है. बाकी तो ईरान की भौगोलिक परिस्थितियां इराक या अफगानिस्तान की तुलना में और भी जटिल हैं. अमेरिका अफगानिस्तान की गुफाओं में छिपे तालिबान को तो 20 साल में भी नहीं हरा पाया, फिर ईरान में तो जाग्रोस और अल्बोरज़ जैसे बड़े-बड़े पहाड़ हैं. इन्हीं पहाड़ों के अंदर ईरान ने अपनी मिसाइलें और परमाणु केंद्र छिपा रखे हैं, जहां जमीनी जंग लड़ना अमेरिका के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है.

अमेरिका का युद्ध इतिहास

अमेरिका को अफगानिस्तान में सिर्फ तालिबान से लड़ना था या इराक में सिर्फ सद्दाम से लड़ना था, लेकिन ईरान में तो अमेरिका को ईरान की फौज, आईआरजीसी के अलावा हिजबुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया से भी लड़ना होगा. बाकी अमेरिका ने इस हमले के बाद ईरान की उस जनता को भी एकजुट कर दिया है, जो कभी अली खमेनेई के खिलाफ सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रही थी. अली खामेनेई के मारे जाने के बाद मुज्तबा ने उन प्रदर्शनकारियों को भी इस्लाम की दुहाई देकर, ईरान की दुहाई देकर अपने पाले में कर लिया है, जिससे मुज्तबा को अब खुलकर खेलने का, जंग लड़ने का मौका मिल गया है.

अब रहा सवाल कि ये जंग और लंबी हुई तो पूरी दुनिया पर और खास तौर से भारत पर इसका असर क्या होगा. इस मसले को दो हिस्सों में ठीक से समझने की जरूरत है. पहला हिस्सा ये कि जंग लंबी खिंची तो ईरान क्या-क्या कर सकता है और दूसरा ये कि ईरान अगर वो फैसले करता है तो उसका असर क्या होगा तो पहले बात करते हैं कि ईरान क्या क्या कर सकता है.

  • ईरान होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से बंद कर सकता है.
  • ईरान बाब अल-मंडेब स्ट्रेट को भी बंद कर सकता है.
  • अगर जंग और लंबी हुई तो ईरान ओमान की खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बना सकता है.
  • अब ईरान के इस ऐक्शन का रिएक्शन क्या होगा, इसको भी विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं.


बंद हुआ होर्मुज स्ट्रेट तो क्या असर होगा?

होर्मुज स्ट्रेट वो रास्ता है, जिसके जरिए दुनिया के 20 फीसदी तेल और 18 फीसदी गैस की सप्लाई होती है. पूरी दुनिया में तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ेगा ये तो तय है. इसका सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से कच्चे तेल की कीमत 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल पहुंच सकती है. अगर ऐसा हुआ तो भारत में भी पेट्रोल-डीजल का दाम 150 से 200 रुपये प्रति लीटर पहुंचने की आशंका है. बाकी दुनिया की 20% लिक्विड नेचुरल गैस इसी रास्ते से आती है. आंशिक बंदी की वजह से ही कतर जैसे बड़े गैस निर्यातकों ने 'फोर्स मेज्योर' घोषित कर दिया है, जिससे बिजली और गैस की कीमतें यूरोप और एशिया में दोगुनी हो गई हैं. रही बात भारत की तो भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% LPG खाड़ी देशों से इसी रास्ते के जरिए मंगवाता है. भारत के पास कच्चे तेल का तो अभी भंडार है, लेकिन LPG का इतना बड़ा स्टॉक नहीं है. इससे गैस सिलेंडर की किल्लत और कीमत दोनों और भी बढ़ सकती है. असर तो अभी से दिखना शुरू हो ही गया है. बाकी दुनिया के एक-तिहाई यूरिया का कारोबार इसी रास्ते से होता है. अगर रास्ता बंद हुआ तो भारत के किसानों को खाद की कमी हो जाएगी और कीमतें इतनी बढ़ेंगी कि कोई सोच भी नहीं सकता. बाकी भारत का रोजाना का लगभग 27 लाख बैरल कच्चा तेल इसी रास्ते से आता है. रास्ता बंद होने पर तेल भंडार भी घटेगा तो फिर कीमतें बढ़ने से कोई रोक नहीं पाएगा.

बंद हुआ बाब अल-मंडेब स्ट्रेट तो क्या होगा?

लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाला एक रास्ता है बाब अल-मंडेब स्ट्रेट. भले ही ये ईरान के पास नहीं है, लेकिन यहां पर हुकूमत ईरान के प्रॉक्सी हूतियों की है. अगर ईरान के कहने पर हूतियों ने बाब अल-मंडेब को रोका तो स्वेज नहर तक जाने वाला रास्ता भी रुक जाएगा. पूरी दुनिया का लगभग 12 से 15 फीसदी समुद्री कारोबार इसी रास्ते से होता है. 30 फीसदी कंटेनर ट्रैफिक इसी रास्ते पर है. रास्ते के बंद होने का मतलब ये होगा कि एशिया और यूरोप के बीच का सबसे छोटा रास्ता खत्म हो जाएगा. इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हमारा देश भारत हो सकता है. क्योंकि भारत का 240 अरब डॉलर से ज्यादा का निर्यात इसी रास्ते से यूरोप और अमेरिका जाता है. रास्ता बंद होने पर जहाजों को अफ्रीका के नीचे केप ऑफ गुड होप से घूम कर जाना होगा. इसकी वजह से जहाजों को 15 से 20 दिन अतिरिक्त लगेंगे. समय ज्यादा लगेगा तो लागत 50-60 फीसदी तक बढ़ जाएगी. इससे भारत के उत्पाद दुनिया के बाजार में महंगे होंगे और हमारा एक्सपोर्ट रुक जाएगा. बाकी भारत में आने वाले जरूरी कलपुर्जे, रसायन और मशीनरी की सप्लाई रुक जाएगी, जिससे घरेलू मैन्युफैक्चरिंग धीमी पड़ सकती है. अगर ईरान होर्मुज और बाब अल-मंडेब दोनों को प्रभावित करने में सफल रहता है तो खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब और UAE के पास अपना तेल बाहर भेजने का कोई सुरक्षित समुद्री रास्ता नहीं बचेगा.

गल्फ ऑफ ओमान बंद हुआ तो क्या होगा

होर्मुज स्ट्रेट से बाहर निकलते ही ओमान की खाड़ी शुरू हो जाती है. ईरान की नेवी गल्फ ऑफ ओमान तक पहुंच गई है. ईरान के पास अभी इतनी ताकत है कि वो अपने मदर शिप्स जैसे शाहिद बघेरी और समुद्री बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल करके इस रास्ते से आने-जाने वाले जहाजों को निशाना बना सकता है. और अगर ऐसा हुआ तो ये स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से भी बड़ी और खतरनाक स्थिति होगी. क्योंकि ओमान की खाड़ी के बंद होने का मतलब है कि सऊदी, UAE, कुवैत से तेल कहीं बाहर जा ही नहीं पाएगा. ओमान ने अपने डुकम और सोहार जैसे बंदरगाहों को होर्मुज के विकल्प के रूप में विकसित किया था ताकि जंग के हालात में तेल यहां से भेजा जा सके. अब जब गल्फ ऑफ ओमान भी बंद हुआ तो फिर भारत के लिए बड़ी मुश्किल होगी क्योंकि भारत अपनी गैस का एक बड़ा हिस्सा कतर और UAE से ओमान की खाड़ी के रास्ते ही मांगता है.

ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई

हालांकि, ये सब तब होगा, जब ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के पास जंग लड़ने के अलावा दूसरा कोई विकल्प न हो और उसे अमेरिका का और भी तगड़ा हमला झेलना पड़े. अभी तक आशंका इसी बात की है कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका पीछे हटने को तैयार नहीं है तो वो और भी ताकत से ईरान पर हमला करेगा. मुज्तबा के आने के बाद से ईरान भी किसी भी सूरत में सरेंडर को तैयार नहीं है तो उसके रिएक्शन भी और ताकतवर होंगे, जिसमें वो उन सभी विकल्पों को आजमाने की कोशिश करेगा, जिसकी मैंने पहले भी बात की थी. जो भी होगा, वो दुनिया में तबाही ही लाएगा, क्योंकि ट्रंप के ऐक्शन और ईरान के रिएक्शन के बाद चीन और रूस भी हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रह पाएंगे. आखिर तेल उन्हें भी चाहिए, गैस उन्हें भी चाहिए, दुनियाभर से कारोबार उन्हें भी करना है. अगर इसमें अमेरिका का हमला बाधक बनता है तो अभी तक पर्दे के पीछे से ईरान का समर्थन कर रहे पुतिन और शी जिनपिंग खुलकर सामने आ सकते हैं. फिर तो इतिहास इसे शायद तीसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत के  तौर पर ही याद करेगा, जिसका अंजाम कितना भयानक होगा ये सोचकर भी तपती गर्मी में सिहरन दौड़ जाती है.

अविनाश राय एबीपी लाइव में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. अविनाश ने पत्रकारिता में आईआईएमसी से डिप्लोमा किया है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएट हैं. अविनाश फिलहाल एबीपी लाइव में ओरिजिनल वीडियो प्रोड्यूसर हैं. राजनीति में अविनाश की रुचि है और इन मुद्दों पर डिजिटल प्लेटफार्म के लिए वीडियो कंटेंट लिखते और प्रोड्यूस करते रहते हैं.

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