सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को करेगा सुनवाई
लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के दो दिन बाद, 26 सितंबर को सोनम वांगचुक को रासुका के तहत हिरासत में लिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे आंगमो की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत उनकी हिरासत के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई आठ जनवरी के लिए स्थगित कर दी. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी बी वराले की पीठ ने बुधवार को मामले की सुनवाई स्थगित कर दी. जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि पीठ गुरुवार को इस पर सुनवाई करेगी.
वांगचुक की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल पेश हुए. इस मामले की सुनवाई इससे पहले जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारी की पीठ ने की थी. याचिका में दावा किया गया है कि वांगचुक की हिरासत अवैध और मनमानी है, जो उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है.
केंद्र और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से 24 नवंबर को आंगमो की अर्जी पर जवाब देने के लिए समय देने का अनुरोध किए जाने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी थी. अदालत ने 29 अक्टूबर को आंगमो की संशोधित याचिका पर केंद्र और लद्दाख प्रशासन से जवाब मांगा.
लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के दो दिन बाद, 26 सितंबर को वांगचुक को रासुका के तहत हिरासत में लिया गया था. इन प्रदर्शनों में केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में चार लोगों की मौत हो गई थी और 90 लोग घायल हो गए थे. सरकार ने वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया था.
संशोधित याचिका के अनुसार, हिरासत आदेश 'पुरानी प्राथमिकी, अस्पष्ट आरोपों और अटकलबाजी भरे दावों' पर आधारित है तथा हिरासत के कथित आधारों से इसका कोई सीधा या प्रत्यक्ष संबंध नहीं है. याचिका में आरोप लगाया गया कि शक्तियों का ऐसा मनमाना प्रयोग सत्ता का घोर दुरुपयोग है, जो संवैधानिक स्वतंत्रता और उचित प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों पर प्रहार करता है इसलिए अदालत को इस हिरासत आदेश को रद्द करना चाहिए.
याचिका में कहा गया है कि यह पूरी तरह से हास्यास्पद है कि लद्दाख और पूरे भारत में जमीनी स्तर की शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण संरक्षण में वांगचुक के योगदान के लिए राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीन दशकों से अधिक समय तक मान्यता के बाद, उन्हें अचानक निशाना बनाया जाएगा. आंगमो ने कहा कि 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए वांगचुक के कार्यों या बयानों को किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है.
आंगमो ने बताया कि वांगचुक ने अपने सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से हिंसा की निंदा की और स्पष्ट रूप से कहा कि हिंसा लद्दाख की 'तपस्या' और पांच वर्षों से शांतिपूर्ण प्रयासों की विफलता का कारण बनेगी, और यह उनके जीवन का सबसे दुखद दिन था.
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Source: IOCL
























