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'आतंकवादी के लिए दया नहीं पर अजमल कसाब के लिए सहानुभूति...', SG तुषार मेहता ने किया पाक आतंकी की बेल का विरोध तो बोला सुप्रीम कोर्ट

याचिका पर सवाल उठाते हुए तुषार मेहता ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका कैसे दायर कर सकता है. वह आतंकी है और वापस भेजा भी गया तो देश उन्हें स्वीकार नहीं करता.

सुप्रीम कोर्ट ने 89 वर्षीय पाकिस्तानी नागरिक और हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी गुलाम नबी की जम्मू-कश्मीर की जेल से रिहाई और अपने देश लौटने के अनुरोध संबंधी याचिका पर विचार करने से मंगलवार (22 अक्टूबर, 2024) को इनकार कर दिया. गणतंत्र दिवस समारोह में 1995 के सिलसिलेवार बम धमाकों से संबंधित एक मामले में गुलाम नबी आजीवन कारावास की सजा काट रहा है. धमाकों में आठ लोगों की जान चली गई थी. सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आतंकी की याचिका का विरोध किया और कहा कि आतंकी के लिए दया नहीं दिखाई जा सकती. इस पर कोर्ट ने अजमल कसाब का जिक्र करते हुए कहा कि उसके लिए सहानुभूति दिखाई गई और फांसी का विरोध भी किया गया.

सुनवाई शुरू होते ही गुलाम नबी की ओर से पेश वकील वारिशा फरासत ने  जस्टिस भूषण रामाकृष्ण गवई और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच को बताया कि याचिकाकर्ता, जिसकी जेल की अवधि 1995 में शुरू हुई थी, तब से लगातार हिरासत में है. उन्होंने कहा कि जब 2009 में गुलाम नबी को बरी किया गया तो उसे रिहा करने के बजाय उस पर जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम लगा दिया गया और उसे फिर से हिरासत में ले लिया गया.

वकील ने पीठ से कहा, 'याचिकाकर्ता को निचली अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन उसे कभी रिहा नहीं किया गया. उसके मामले में उठाई गई मुख्य आपत्ति यह थी कि जम्मू-कश्मीर जेल नियमावली के अनुसार आतंकवादी वारदात के लिए कोई छूट उपलब्ध नहीं है.' केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि याचिकाकर्ता पाकिस्तानी नागरिक है जो बिना किसी दस्तावेज के भारत में घुसपैठ कर आया. तुषार मेहता ने कहा कि इस अदालत ने उसे जम्मू में बम विस्फोट करने और आठ निर्दोष लोगों की हत्या करने के लिए दोषी ठहराया.

याचिका पर सवाल उठाते हुए, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका कैसे दायर कर सकता है. उन्होंने कहा, 'वो आतंकी है. जब उन्हें वापस भेजा जाता है, तो उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया जाता. अजमक कसाब को उसके देश में कभी स्वीकार नहीं किया गया.' गुलाम नबी के वकील ने कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार इसलिए माफी स्वीकार नहीं कर रही है क्योंकि उसने आतंकी वारदात को अंजाम दिया. वकील ने कहा कि गुलाम नबी के पाकिस्तानी नागरिक होने का मुद्दा ही नहीं है.

तुषार मेहता ने दलील का विरोध करते हुए कहा कि आतंकवादी के प्रति दया नहीं दिखाई जा सकती. बेंच ने कहा, 'कसाब के लिए भी सहानुभूति दिखाई गई थी कि उसे फांसी नहीं होनी चाहिए. देश, राष्ट्र, नागरिक की सुरक्षा का कोई मूल्य नहीं?' एडवोकेट फरासत ने इसके बाद राजीव गांधी हत्याकांड का हवाला देते हुए कहा कि इस अदालत ने दोषियों को समय से पहले रिहा करने का निर्देश दिया, जबकि अपराध गंभीर और आतंकवादी प्रकृति का था.

पीठ ने कहा कि इस मामले में जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से कोई सिफारिश नहीं की गई है. इसके बाद वकील ने याचिका वापस ले ली और याचिका को वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया गया. पाकिस्तान के सियालकोट जिले के निवासी गुलाम नबी को 2009 में टाडा कोर्ट ने बरी कर दिया था. हालांकि, एक जुलाई 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उसे बरी किए जाने के फैसले को खारिज कर दिया. बाद में 30 सितंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई.

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