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SIR पर सुनवाई में EC ने कही ऐसी बात SC को आ गया गुस्सा, बोला- शक्तियां मिली हैं तो क्या खुली छूट...

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) ने चिंता जताते हुए कहा कि मतदाता सूची में संशोधन से उन व्यक्तियों के लिए गंभीर नागरिक परिणाम हो सकते हैं जिनके नाम उसमें शामिल नहीं हैं

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (21 जनवरी, 2026) को कहा कि वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण से उन लोगों के लिए गंभीर नागरिक परिणाम हो सकते हैं, जिनके नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जाते. कोर्ट ने यह भी कहा, 'चुनाव आयोग के पास व्यापक विवेकाधिकार हैं, लेकिन क्या वह इस तरह अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, जहां कोई नियंत्रण या न्यायिक समीक्षा न हो?'

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने ये टिप्पणियां बिहार सहित कई राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) करने के निर्वाचन आयोग के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह की अंतिम सुनवाई के दौरान कीं.

याचिकाकर्ताओं में शामिल एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफोर्म्स (ADR) ने कोर्ट में कहा कि एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग अपने नियमों का पालन नहीं कर रहा, अतिरिक्त दस्तावेज मांग रहा है, (जैसे फॉर्म 6 में 6 दस्तावेज निर्धारित हैं, लेकिन एसआईआर में 11) और इससे लाखों मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. 

बेंच ने निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी की ओर से दी गई विस्तृत दलीलों को सुना. बेंच इस सवाल पर विचार कर रही है कि क्या एसआईआर प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं से विचलित हो सकती है.

मुख्य न्यायाधीश ने चिंता जताते हुए कहा कि मतदाता सूची में संशोधन से उन व्यक्तियों के लिए गंभीर नागरिक परिणाम हो सकते हैं जिनके नाम उसमें शामिल नहीं हैंमुख्य न्यायाधीश ने मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन से जुड़ी जन प्रतिनिधि 1950 अधिनियम की धारा 21 का जिक्र करते हुए सवाल किया, 'अगर कोई बात लोगों के नागरिक अधिकारों को प्रभावित करती है, तो अपनाई जाने वाली प्रक्रिया उपधारा (2) के अनुसार क्यों नहीं होनी चाहिए?'

जस्टिस बागची ने भी इन्हीं चिंताओं को दोहराते हुए सवाल उठाया कि क्या निर्वाचन आयोग न्यायिक समीक्षा से परे असीमित शक्ति का प्रयोग कर सकता है. वैधानिक योजना का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि नियमों में से एक में यह प्रावधान है कि जब गहन पुनरीक्षण किया जाता है, तो मतदाता सूचियां नए सिरे से तैयार की जाती हैं. न्यायमूर्ति बागची ने सवाल किया कि क्या ऐसे सुरक्षा उपायों को पूरी तरह से दरकिनार किया जा सकता है.

जस्टिस बागची ने कहा, 'कोई भी शक्ति निरंकुश नहीं हो सकती.' एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने बचाव में अधिनियम की धारा 21 की उपधारा 3 का हवाला दिया, जिसमें लिखा है: 'उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, निर्वाचन आयोग किसी भी समय, दर्ज किए जाने वाले कारणों से, किसी निर्वाचन क्षेत्र या निर्वाचन क्षेत्र के किसी भाग के लिए मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण ऐसे तरीके से निर्देशित कर सकता है जैसा वह उचित समझे. बशर्ते कि इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी निर्वाचन क्षेत्र के लिए मतदाता सूची, ऐसे किसी निर्देश के जारी होने के समय लागू होने के अनुसार, निर्दिष्ट विशेष गहन पुनरीक्षण के पूरा होने तक लागू रहेगी.'

एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि 1950 अधिनियम की धारा 21(3) आयोग को विशेष पुनरीक्षण करने के लिए एक विशिष्ट और स्वतंत्र शक्ति प्रदान करती है, जो धारा 21(1) और 21(2) के तहत परिकल्पित नियमित या आवधिक संशोधनों से अलग है. उन्होंने कहा, 'मेरी दलील है कि धारा 21 की उपधारा (2) और (3) एक ही क्षेत्र में लागू नहीं होती हैं.'

मुख्य न्यायाधीश ने हालांकि एक तीखा सवाल किया कि क्या धारा 21(2) आयोग को नियमों से परे जाने में सक्षम बनाती है, तो क्या आयोग धारा 21(3) के तहत एसआईआर करते समय अपनी अधिसूचित प्रक्रियाओं से खुद को छूट दे सकता है. जस्टिस बागची ने धारा 21(2) और 21(3) के तहत जांच की प्रकृति पर विशेष रूप से दस्तावेजी आवश्यकताओं के आलोक में सवाल उठाया.

उन्होंने बताया कि जहां फॉर्म-छह में सात दस्तावेजों का प्रावधान है, वहीं एसआईआर प्रक्रिया में 11 दस्तावेजों की आवश्यकता होती है. उन्होंने सवाल किया क्या निर्वाचन आयोग निर्धारित सूची में कुछ जोड़ या घटा सकता है और फॉर्म-छह के दस्तावेजों को पूरी तरह से बाहर कर सकता है. एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि वैधानिक भाषा ने इस तरह के लचीलेपन की अनुमति दी और नियमों से विचलित होने का अधिकार धारा 21(3) में निहित है.

उन्होंने दोहराया कि आयोग मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकता और उसे अदालत को यह संतुष्ट करना होगा कि प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और पारदर्शी थी, संविधान के अनुच्छेद 326 को ध्यान में रखते हुए, जो वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है.

वर्तमान सुनवाई गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ओर से दायर एक प्रमुख याचिका सहित विभिन्न याचिकाओं पर हो रही है, जिनमें एसआईआर प्रक्रिया की वैधता और संवैधानिकता को चुनौती दी गई है.

 

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