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Sharad Yadav Death: जब शरद यादव को चंद्रशेखर ने लोकसभा में लगा दी थी डांट? जानें वो किस्सा

Sharad Yadav: शरद यादव मध्य प्रदेश में पैदा हुए लेकिन वह बिहार के बड़े नेता के तौर पर जाने गए. शरद यादव देश के पहले राजनेता थे, जिन्होंने तीन राज्यों से चुनाव लड़ा और कुल सात बार लोकसभा पहुंचे थे.

Sharad Yadav Death: एक इंजीनियर जो मध्यप्रदेश में पैदा हुआ, लेकिन उसकी शिनाख्त बिहार के बड़े नेता के तौर पर हुई. एक नेता, जो तीन-तीन राज्यों से चुनाव लड़ा और कुल सात बार लोकसभा पहुंचा, जो तीन बार राज्यसभा से सांसद रहा, जिसने वीपी सिंह पर दबाव डालकर मंडल कमीशन को लागू करवाया, जिसने बाबरी विध्वंस के बाद लोकसभा में बयान देते वाजपेयी पर टीका-टिप्पणी की तो चंद्रशेखर ने उसकी सात पीढ़ियों को देख लेने की धमकी दी, जिसने घोटाले का आरोप लगने के बाद भी बचाव के लिए कोई वकील नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि हां उसने पार्टी के लिए पैसे लिए हैं, जो लोकदल, जनता दल, जेडीयू और आरजेडी जैसी पार्टियां बदलने के बाद भी अपने अंतिम वक्त तक समाजवादी रहा, जो केंद्र में मंत्री रहने के बाद भी राजनीति के उस शिखर को नहीं छू पाया जिसका वो हकदार था. उस नेता का नाम है शरद यादव, जिन्होंने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में गुरुवार रात 10 बजे के आसपास आखिरी सांसें लीं.

ऐसे हुई थी राजनीति में शरद यादव की शुरुआत

शरद यादव ने अपनी राजनीति की शुरुआत जयप्रकाश नारायण (Jayaprakash Narayan) के आंदोलन से जुड़कर की थी. 1974 में जब जेपी का आंदोलन अपने ऊरूज पर था, मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) की जबलपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव होने थे. तब उस सीट से चार बार के सांसद रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सेठ गोविंद दास का निधन हुआ था. उस उपचुनाव के लिए जय प्रकाश नारायण ने खुद भारतीय लोकदल के प्रत्याशी के तौर पर शरद यादव के नाम का चुनाव किया और शरद यादव (Sharad Yadav) जीत गए. लेकिन इमरजेंसी के दौरान जब इंदिरा गांधी ने लोकसभा का कार्यकाल पांच से बढ़ाकर 6 साल किया तो दो सांसदों ने इस्तीफा दे दिया. 

मधु लिमये के साथ इस्तीफा देने वालों में दूसरे सांसद शरद यादव ही थे. आपातकाल के बाद भी जब 1977 में उस सीट से चुनाव हुए तो शरद यादव ने दोबारा वहां से जीत हासिल की. लेकिन इंदिरा गांधी के खिलाफ जनता पार्टी का प्रयोग असफल हो गया तो शरद यादव ने चौधरी चरण सिंह का हाथ थामा और चरण सिंह के अंतिम वक्त तक उनके ही साथ रहे. अमेठी से सांसद रहे संजय गांधी की मौत के बाद जब वहां उपचुनाव हुए तो कांग्रेस के प्रत्याशी राजीव गांधी थे. लेकिन चौधरी चरण सिंह ने अमेठी  (Amethi) में राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) का मुकाबला करने के लिए शरद यादव को उम्मीदवार बना दिया. 

शरद यादव हार गए चुनाव

हालांकि शरद यादव वो चुनाव बुरी तरह से हार गए. 1984 के लोकसभा चुनाव में चरण सिंह ने शरद यादव को बदायूं से उम्मीदवार बना दिया. लेकिन शरद यादव वो चुनाव भी हार गए. कांग्रेस नेता सलीम इकबाल शेरवानी ने वहां से जीत दर्ज की. हालांकि चरण सिंह की नजदीकी का फायदा शरद यादव को मिला और वो वाया राज्यसभा संसद पहुंच गए. जब वीपी सिंह ने राजीव गांधी की कैबिनेट से इस्तीफा दिया और पूरे देश में घूम-घूमकर राजीव गांधी के खिलाफ माहौल बनाने लगे. बोफोर्स ऐसा मुद्दा था, जिसने राजीव गांधी की छवि को पूरी तरह से डेंट कर दिया.

2 अक्टूबर, 1988 को मद्रास में एक रैली हुई. इस रैली में कुल सात दलों के लोग शामिल थे, जिसका नेतृत्व कर रहे थे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एनटी रामाराव. जनमोर्चा, जनता पार्टी, कांग्रेस (सोशलिस्ट), असम गण परिषद, तेलगु देशम, डीएमके और लोकदल (बहुगुणा), इन सात पार्टियों ने एक साथ एक मोर्चे के तहत आने का ऐलान किया और इसको नाम दिया गया राष्ट्रीय मोर्चा. इसके बाद 11 अक्टूबर, 1988 को जेपी की जयंती थी. जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) के विलय से एक नई पार्टी बनी जिसका नाम रखा गया जनता दल.

शरद यादव ने लड़ा बदायूं से फिर चुनाव

शरद यादव जनता दल के साथ आ गए. 1989 में शरद यादव ने जनता दल के उम्मीदवार के तौर पर बदायूं से फिर चुनाव लड़ा और कांग्रेस विरोधी लहर में जीत दर्ज की. लेकिन यही जीत और वीपी सिंह का यही साथ शरद यादव के करियर की सबसे बड़ी बाधा भी बन गया. हुआ ये कि जनता दल को कुल 143 सीटें मिलीं. कांग्रेस 198 पर सिमट गई. इसके बाद बीजेपी और लेफ्ट ने जनता दल का समर्थन कर दिया और एक राष्ट्रीय मोर्चा बना. अब चुनाव बाद प्रधानमंत्री चुना जाना था. 

इस कड़ी में सबसे पहला नाम था विश्वनाथ प्रताप सिंह का, जिन्होंने बोफोर्स की बदौलत राजीव गांधी की सल्तनत को चुनौती दी थी. दूसरे दावेदार थे चंद्रशेखर, जिनकी जनता पार्टी का जनता दल में विलय हुआ था. जनता दल का सबसे बड़ा घटक दल जनता पार्टी ही थी और चंद्रशेखर इसके अध्यक्ष रहे थे, तो उनकी भी दावेदारी स्वाभाविक थी. तीसरे दावेदार हरियाणा के मुख्यमंत्री और अपने लोगों में ताऊ के नाम से मशहूर चौधरी देवीलाल भी थे. ऐन वक्त पर 1 दिसंबर को जब पार्टी की बैठक हुई तो चौधरी देवीलाल ने वीपी सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया.

'शरद को आगे नहीं बढ़ने देना है'

शरद यादव भी वीपी सिंह के साथ रहे. और इसकी वजह से चंद्रशेखर (Chandra Shekhar) के मन में एक गांठ पड़ गई कि अब तो शरद यादव को आगे नहीं बढ़ने देना है. लेकिन अब वीपी (Vishwanath Pratap Singh) प्रधानमंत्री थे और शरद यादव उनकी कैबिनेट में मंत्री. लेकिन जिस देवीलाल ने वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित किया था प्रधानमंत्री पद के लिए, उन्हीं देवीलाल से वीपी सिंह की अनबन हो गई. और अपनी सरकार में उपप्रधानमंत्री रहे देवीलाल को वीपी सिंह ने सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

सरकार गिराने के लिए देवीलाल ने किया रैली का आयोजन

देवीलाल (Devi Lal) ने तय किया कि वो सरकार गिरा देंगे. और इसके लिए उन्होंने 9 अगस्त 1990 को दिल्ली के बोट क्लब में एक रैली की योजना बनाई. वहीं वीपी सिंह और शरद यादव को ये भी पता था कि इलाहाबाद में हुई धर्म संसद में बीजेपी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी अपनी रथयात्रा की तैयारी कर चुके हैं, जो गुजरात के सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक जाएगी. शरद यादव ऐसे नेता थे, जिन्हें वीपी सिंह अपने साथ रखना चाहते थे और ताऊ देवीलाल अपने साथ. ऐसे में शरद यादव ने वीपी सिंह के साथ रहना चुना, लेकिन उसकी एक शर्त थी. और शर्त ये थी कि अगर वीपी सिंह मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करते हैं तो शरद यादव साथ बने रहेंगे नहीं तो वो देवीलाल के साथ चले जाएंगे. 

इसके अलावा तब के जनता दल में लालू यादव से लेकर मुलायम सिंह यादव जैसे पिछड़ी जातियों के बड़े नेता थे, जो मंडल कमीशन लागू करवाना चाहते थे लेकिन खुलकर कभी इस बात को रख नहीं पाते थे. शरद यादव के पास मौका था कि वो मंडल कमीशन लागू करवा कर खुद पिछड़ी जातियों के सबसे बड़े नेताओं में शुमार हो जाएं और इसके लिए उन्होंने वीपी सिंह पर दबाव डाला. वीपी सिंह ने तब कहा कि वो 15 अगस्त को लाल किले से मंडल कमीशन लागू करने का ऐलान करेंगे. लेकिन शरद यादव ने कहा कि 9 अगस्त को चौधरी देवीलाल की रैली वीपी का इतना नुकसान कर देगी कि उसकी भरपाई मुश्किल है.

शरद यादव को नहीं मिला पूरा क्रेडिट

पीएम वीपी को बात समझ में आ गई. आनन-फानन में 7 अगस्त को कैबिनेट की बैठक बुलाई गई और मंडल कमीशन की सिफारिश को लागू कर दिया गया. इस मंडल कमीशन के लागू होने के बाद इसका श्रेय तमाम लोगों ने लिया. मुलायम से लेकर लालू यादव और राम विलास पासवान तक ने कहा कि उनके कहने पर वीपी सिंह ने लागू किया था मंडल कमीशन, लेकिन हकीकत ये है कि शरद यादव का दबाव मंडल कमीशन लागू करने की सबसे बड़ी वजहों में से एक था.

खुद शरद यादव इस बारे में कहते थे कि उन्होंने वीपी सिंह की गर्दन पकड़कर मंडल कमीशन लागू करवाया था. हालांकि शरद यादव को इसका पूरा क्रेडिट नहीं मिला, क्योंकि बिहार और उत्तर प्रदेश जो इस कमीशन की सिफारिशों की वजह से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, वहां दो अन्य यादव नेता मुख्यमंत्री थे. 

यूपी में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव. और इन दोनों को मुख्यमंत्री बनाने में सबसे बड़ा हाथ चंद्रशेखर का था, जिन्होंने वीपी सिंह और शरद यादव दोनों की राजनीतिक जमीन कमजोर करने के लिए मुलायम-लालू को आगे बढ़ाया था. ऐसे में शरद यादव उस मुकाम पर नहीं पहुंच पाए, जिसके वो हकदार थे. रही-सही कसर पूरी हो गई 1991 के लोकसभा चुनाव में. 1991 के लोकसभा चुनाव में शरद यादव बदायूं से लोकसभा का चुनाव हार गए. और इसका ठीकरा फोड़ा गया चंद्रशेखर और मुलायम पर.

कहा गया कि चंद्रशेखर के कहने पर मुलायम ने बदायूं के डीएम से कहकर वोटिंग से एक दिन पहले लाठीचार्ज करवा दिया, जिससे शरद यादव के वोटर छिटक गए और वो हार गए. हालांकि शरद यादव ने बिहार के मधेपुरा से भी चुनाव लड़ा था और वहां से वो जीतकर संसद पहुंचे थे.

'अटल बिहारी वाजपेयी बयान को बोलने दीजिए'

6 दिसंबर, 1992 को जब बाबरी मस्जिद गिरी तो उस वक्त संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था. 7 दिसंबर को संसद में जब अटल बिहारी वाजपेयी बयान देने के लिए उठे तो सदन में मौजूद शरद यादव और राम विलास पासवान ने खूब टीका टिप्पणी की. तब चंद्रशेखर उठे और उन्होंने शरद यादव-राम विलास पासवान को डांटने के अंदाज में कहा कि वाजपेयी जी को बोलने दीजिए. शरद यादव चंद्रशेखर को अध्यक्ष जी कहते थे. और भी जनता दल के तमाम नेता चंद्रशेखर को अध्यक्ष जी ही कहते थे.

तो शरद यादव ने कहा कि अध्यक्ष जी आप इस मुद्दे पर मत बोलिए. आप बीच में मत पड़िए. चंद्रशेखर और शरद यादव के बीच बात इतनी बिगड़ी कि चंद्रशेखर ने कहा कि यही बात लोकसभा के बाहर बोलकर दिखाओ तो तुम्हारी पीढ़ियां गुंडागर्दी भूल जाएंगी. बाद में लोकसभा से बाहर निकलकर शरद यादव ने चंद्रशेखर से माफी भी मांग ली थी. 

हालांकि आज की राजनीति में ऐसा होना बहुत मुश्किल है. और ये बहुत मुश्किल है कहना कि हां, मुझे पार्टी चलाने के लिए कोई पांच लाख रुपये दे गया था तो वो मैंने रख लिए थे. दरअसल जैन हवाला कांड में जब शरद यादव का भी नाम आया तो उन्होंने अपने बचाव के लिए कोई वकील नहीं रखा.

शरद यादव ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि हां मुझे कोई पार्टी फंड के नाम पर पांच लाख देकर गया था तो वो पैसे मैंने रख लिए थे और आज भी सु्प्रीम कोर्ट के गेट पर भी मुझे कोई पार्टी फंड के नाम पर पैसे देगा तो मैं रख लूंगा. ये बेबाकी थी शरद यादव की, जिन्होंने घोटाले का आरोप लगने के बाद भी मुखर होकर उसे स्वीकार किया, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस घोटाले को ही खारिज कर दिया.

जनता दल के अध्यक्ष बने शरद यादव

चारा घोटाले में जब बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव बुरी तरह घिर गए. तब उन्हें लगा कि अब इस्तीफे के अलावा कोई विकल्प नहीं है. तो लालू ने फिर जनता दल के सामने प्रस्ताव रखा कि भले ही उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी चली जाए, लेकिन अध्यक्ष उन्हें ही रहने दिया जाए लेकिन शरद यादव नहीं माने. और 1997 के लिए हुए जनता दल के अध्यक्ष के चुनाव में शरद यादव अध्यक्ष चुन लिए गए. शरद यादव को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा.

शरद यादव ने ली अपनी आखिरी सांस

1998 के लोकसभा चुनाव में मधेपुरा से लालू यादव ने उन्हें चुनाव में मात दे दी. हालांकि 1999 में शरद यादव ने लालू यादव को मधेपुरा से हरा दिया और खुद फिर से सांसद बन गए. इसके बाद वो वाजपेयी सरकार में मंत्री बने. जेडीयू और बीजेपी साथ आई तो वो एनडीए के संयोजक बन गए और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी. 2017 में जब नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग होकर बीजेपी के साथ गए तो शरद यादव ने इसका विरोध किया. और नतीजा ये हुआ कि उन्हें जेडीयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

उन्होंने अपनी पार्टी भी बनाई लोकतांत्रिक जनता दल, जिसका बाद में आरजेडी के साथ विलय कर दिया. 2019 में मधेपुरा से लोकसभा का चुनाव हारने के बाद शरद यादव राजनीतिक अवसान की तरफ चले गए और 12 जनवरी, 2023 को उन्होंने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में अपनी आखिरी सांस ली.

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