कलमा पढ़ने से लेकर नमाज और हज तक... इस्लाम के 5 अरकान पूरे करने में महिलाओं को कितनी छूट?
Women Rights In Islam: सबरीमाला केस में महिलाओं के मस्जिद में नमाज न पढ़ने की बात तो उठी हुई है, लेकिन अब सवाल इससे आगे बढ़ चुके हैं. इस्लाम के 5 स्तंभ को पूरा करने में महिलाओं को कितनी छूट मिली है?

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले में सुनवाई के दौरान मुस्लिम औरतों के मस्जिद में दाखिले और वहां नमाज अदा करने को लेकर बना मुद्दा अब अवामी बहस में है. पुणे की रहने वाली आफरीन पीरजादा ने अपनी अर्जी में मांग की कि उन्हें मस्जिद की अगली सफ (लाइन) में नमाज अदा करने के लिए जगह दी जाए. इस अपील के जवाब में मुस्लिम पक्ष के वकील ने अपनी दलील दी कि मस्जिद में कोई भी जगह किसी खास के लिए रिजर्व नहीं होती है. इस बीच एक सवाल यह भी उठता है कि इस्लाम के 5 बुनियादी स्तंभ (अरकान) की कसौटी पर पूरा उतरने के लिए महिलाओं को कितनी छूट दी गई है और क्यों?
1. शहादा (तौहीद): ईमान की गवाही
यह इस्लाम का पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है. इसमें सिर्फ इतना कहना होता है, 'अशहदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाह...' यानी 'मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के अलावा कोई माबूद नहीं और पैगंबर मुहम्मद अल्लाह के बंदे और आखिरी रसूल हैं.' दरअसल, किसी आम शख्स के मुसलमान होने की यही एक शर्त होती है, जिसका इकरार करने के बाद कोई शख्स मुसलमान हो जाता है.
महिलाओं और पुरुषों में यहां बिल्कुल कोई फर्क नहीं है. किसी भी उम्र की महिला या पुरुष जब यह इकरार कर लेती/लेता है तो वह मुसलमान हो जाती/जाता है. यह शर्त इतनी मौलिक है कि बाकी सारे स्तंभ और नियम इसके बाद आते हैं. महिलाओं को यहां कोई अतिरिक्त पाबंदी या छूट नहीं दी गई है. यह ईमान की नींव है और हर मुसलमान के लिए समान रूप से जरूरी है.
2. सलात (नमाज): पांच वक्त की नमाज
इस्लाम में हर बालिग मुसलमान पर दिन में पांच वक्त की नमाज फर्ज है. महिलाओं और पुरुषों के लिए सामान्य नियम एक जैसे हैं- वुजू, रकात, समय और किबला सब समान. लेकिन महिलाओं की शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष छूट दी गई है.
- महावारी (हैज) और प्रसव के बाद का खून (निफास): इन दोनों अवधियों में महिलाओं को नमाज न पढ़ने की पूरी छूट है. न सिर्फ छूट है, बल्कि इस दौरान नमाज पढ़ना भी मना है. बाद में इन नमाजों की कजा (बाद में पढ़ने) की भी जरूरत नहीं है.
- बीमारी या सफर: पुरुषों की तरह महिलाओं को भी बीमारी में बैठकर, लेटकर या इशारा करके नमाज पढ़ने की छूट है. सफर में कसर (रकात कम करना) दोनों के लिए समान है.
- बच्चों को छूट: बालिग होने से पहले बच्चों (लड़की-लड़के दोनों) पर नमाज फर्ज नहीं होती.
इस तरह महिलाओं को उनकी शारीरिक अवस्था के कारण व्यावहारिक रियायत दी गई है, लेकिन बाकी हालात में नमाज का फर्ज पुरुषों जितना ही सख्त है.
3. जकात: गरीबों को दान देना
जकात इस्लाम का तीसरा स्तंभ है, जो दौलतमंद मुसलमानों पर फर्ज है. जिसके पास एक साल तक निसाब (न्यूनतम सीमा) यानी लगभग 87.48 ग्राम सोना (या उसके बराबर चांदी/नकद/व्यापारिक माल) हो, उसे 2.5% जकात देनी होती है.
महिलाओं और पुरुषों में यहां कोई फर्क नहीं रखा गया है. अगर किसी महिला के पास अपनी अलग संपत्ति हो और वह निसाब की सीमा पूरी करती हो तो उसे जकात देनी ही होगी. पुरुष की तरह महिला को भी अपनी जकात खुद तय करके देनी होती है. कोई छूट या अतिरिक्त पाबंदी नहीं है. बल्कि कई विद्वान कहते हैं कि महिलाओं की संपत्ति पर उनका पूरा अधिकार है, इसलिए जकात भी उनकी अपनी जिम्मेदारी है. यह स्तंभ समाज में आर्थिक न्याय लाने का माध्यम है और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता.
4. सौम (रोजा): रमजान के रोजे
रमजान में एक महीने तक रोजा रखना हर बालिग मुसलमान पर फर्ज है. महिलाओं और पुरुषों के लिए रोजे के नियम (सूर्योदय से सूर्यास्त तक खाना-पीना-संभोग से परहेज) एक जैसे हैं. लेकिन महिलाओं की खास शारीरिक स्थितियों को ध्यान में रखकर चार मुख्य छूट दी गई हैं:
- हैज और निफास: इन दिनों में रोजा रखना मना है. बाद में छूटे हुए रोजे कजा करके पूरे करने होते हैं.
- गर्भावस्था: अगर रोजा रखने से मां या बच्चे को नुकसान का खतरा हो तो रोजा छोड़ सकती है, लेकिन बाद में कजा जरूरी है.
- दूध पिलाने वाली मां: अगर बच्चे या मां की सेहत पर असर पड़ने का डर हो तो रोजा छोड़ सकती है, बाद में कजा करना होगा.
- सामान्य छूट: बीमारी, लंबा सफर, बुढ़ापा या कमजोरी जैसी स्थितियां पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान हैं.
इस तरह महिलाओं को उनकी मातृत्व और शारीरिक अवस्था के कारण रियायत दी गई है, लेकिन रोजे का मूल फर्ज बरकरार है.
5. हज: मक्का की यात्रा
जिस मुसलमान के पास आर्थिक सामर्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य और सुरक्षित यात्रा का साधन हो, उसके ऊपर जीवन में एक बार हज फर्ज है. महिलाओं और पुरुषों पर यह फर्ज समान रूप से है. कोई लिंग-आधारित पाबंदी नहीं है. हालांकि महिलाओं के लिए कुछ व्यावहारिक नियम हैं:
- महिला अकेली हज के लिए नहीं जा सकती; उसके साथ महरम (पति, पिता, भाई आदि) होना चाहिए.
- लेकिन अगर कोई महिला समूह में सुरक्षित यात्रा कर रही हो और महरम उपलब्ध न हो तो कई विद्वानों के अनुसार वह हज कर सकती है.
- हज के दौरान एहराम, तवाफ, सई आदि के नियम दोनों के लिए लगभग एक जैसे हैं, सिर्फ कुछ छोटे-मोटे अंतर (जैसे कपड़ों का स्टाइल) हैं.
- महिलाओं को हज करने का पूरा अधिकार है और यह उनके लिए भी आध्यात्मिक रूप से उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पुरुषों के लिए.
इस्लाम के पांचों स्तंभों में महिलाओं को मूल अधिकार समान दिए गए हैं. जहां शारीरिक या स्वास्थ्य संबंधी स्थिति होती है, वहां व्यावहारिक छूट दी गई है ताकि धर्म का बोझ आसान हो जाए. ये छूट महिलाओं के लिए सहानुभूति और न्याय का प्रमाण हैं, न कि कोई कमजोरी. हर स्तंभ का मकसद इंसान को अल्लाह के करीब लाना है और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया है.























