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पोखरण टेस्ट: अमेरिकी खुफिया एजेंसी को चकमा देकर भारत ने कैसे पूरा किया न्यूक्लियर मिशन

पोखरण परीक्षण को 22 साल पूरे हो गए. भारत ने जब पांच बेहद शक्तिशाली परमाणु धमाके किए थे तब इसे चौतरफा दबाव का सामना करना पड़ा था.

भारतीय वैज्ञानकों और इंजीनियर्स द्वारा साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों के जश्न के तौर पर हर साल 11 मई को National Technology Day मनाया जाता है. इसी दिन साल 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पोखरण में न्यूक्लियर मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण कर दुनिया को चौंका दिया था. इस ऑपरेशन को पोखरण-2 नाम दिया गया था.

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की अगुआई में इस मिशन को इस तरह से पूरा किया गया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और उसके सैटेलाइटों को इसकी भनक तक नहीं लगी. इससे पहले इंदिरा गांधी की सरकार में साल 1974 में परमाणु परीक्षण किया गया था. इस ऑपरेशन 'स्माइलिंग बुद्धा' नाम दिया गया था. आपको बताते हैं कि 22 साल पहले कैसे भारत सरकार ने बड़े ही गोपनीय तरीके से पोखरण परमाणु परीक्षण को अंजाम दिया था..

अमेरिका की धमकी के बावजूद भारत ने किया न्यूक्लियर टेस्ट साल 1974 में पहले न्यूक्लियर बम का टेस्ट करने के बाद भारी वैश्विक दबाव के बावजूद भारत ने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम जारी रखा. 1995 में दोबारा परीक्षण के लिए नरसिम्हा राव सरकार ने हरी झंडी दी थी. लेकिन इस दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने भारत के न्यूक्लियर बम बनाने की गतिविधियों को अपने सेटेलाइट से पकड़ लिया. अमेरिका ने तब धमकी जारी की थी कि अगर भारत न्यूक्लियर प्रोग्राम जारी रखता है तो उसपर प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे.

इसी बीच 1996 में ही अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री बने और न्यूक्लियर टेस्ट कराए जाने का आदेश दिया. इस आदेश के महज दो दिनों बाद उनकी सरकार गिर गई. 1998 में वाजपेयी ने एक बार भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और फिर से सत्ता में आए. पीएम बनने के बाद वाजपेयी ने पोखरण- 2 की फिर अनुमति दी.

भारतीय वैज्ञानिकों ने अमेरिका को ऐसे दिया चकमा अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने पोखरण पर निगरानी रखने के लिए चार सैटेलाइट लगाए हुए थे. इसलिए वैज्ञानिकों ने पहले ये पता लगाया कि किस वक्त अमेरिकी खुफिया एजेंसी का सेटेलाइट भारत की निगरानी नहीं कर रहा होता है. मालूम हुआ कि रात में सैटेलाइट से पोखरण की गतिविधियों का पता लगाना मुश्किल था. तो ये तय किया गया कि सभी वैज्ञानिक रात में काम करेंगे.

परीक्षण वाले दिन सभी वैज्ञानिक सेना की वर्दी में पहनकर आए ताकि अमेरिका को लगे कि सेना के जवान ड्यूटी दे रहे हैं. अब्दुल कलाम भी सेना की वर्दी में वहां मौजूद थे. सभी एक-दूसरे से कोड भाषा में बात करते थे. परमाणु बमों को सेना के 4 ट्रकों से पोखरण लाया गया. इससे पहले मुंबई से भारतीय वायुसेना के प्लेन से जैसलमेर बेस लाया गया था.

जब परीक्षण का समय आया तब हवाएं आबादी वाले इलाके की ओर बह रही थीं. ऐसे में अगर परीक्षण किया जाता तो रेडिएशन फैल सकता था. हवाओं के शांत होने तक इंतजार किया गया. दोपहर में हवाओं का डायरेक्शन बदला. आखिरकार धमाका किया गया और धमाके से पूरे आसमान में धुएं का गुबार उठ गया. इस धमाके के साथ ही 11 मई का दिन अमर हो गया. आज हम हर साल ये दिन राष्ट्रीय तकनीक दिवस के तौर पर मनाते हैं.

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