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Lingayat: कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत कितना अहम, क्या है इतिहास और ताजा मामला

Lingayat Community: लिंगायत मठ के मुख्य पुजारी पर रेप के आरोप लगे हैं. इसी के बाद से लोगों के मन में लिंगायतों को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. यहां जान लीजिए जरूरी बातें.

Know About Lingayat Community: कर्नाटक की राजनीति (Karnataka Politics) में लिंगायत सम्प्रदाय का काफी प्रभाव माना जाता रहा है. ऐसा कहा जाता है कि लिंगायत समुदाय का मूड ही ये तय करता है कि प्रदेश में किसके हाथ में सत्ता की चाबी जाएगी. हालांकि, इस समय लिंगायत समुदाय एक और विषय के कारण चर्चा में बना हुआ है. कर्नाटक के सबसे ताकतवर लिंगायत स्वामियों में से एक डॉ. शिवमूर्ति मुरुगा शरणरु के खिलाफ दो नाबालिग लड़कियों के कथित यौन शोषण का मामला दर्ज किया गया है.

चलिए अब आपको लिंगायत समुदाय के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं, जिनकी वजह से कर्नाटक में सियासी पारा हाई होता जा रहा है. कर्नाटक में लिंगायत समुदाय को अगड़ी जातियों में शुमार किया जाता है, जो संपन्न भी हैं. इनका इतिहास 12वीं शताब्दी से शुरू होता है. 

दरअसल, 7वीं-8वीं शताब्दी से दक्षिण भारत में भक्ति मूवमेंट की शुरुआत हुई थी. भक्ति मूवमेंट भी अलग-अलग प्रकार की थी. एक वैष्णव और एक शैविक. मगर ये मूवमेंट क्या था? दक्षिण भारत में एक पहल शुरू हुई खुद को ब्राह्मणवाद से अलग हटाने की, लम्बे-चौड़े तीर्थों, जाति भेदभाव से निजात पाने की. कई पिछड़ी जातियां सोचने लगीं कि खुद को किस तरीके से पुनर्जीवित किया जाए, जहां लिंग, जाति का भेद न रहे. 

12वीं शताब्दी में बासवन्ना ने छेड़ा आंदोलन

12वीं शताब्दी में उसी भक्ति मूवमेंट से प्रेरित हुए समाज सुधारक बासवन्ना. बासवन्ना (Basavanna) उस समय रही कलचुरि राजवंश में एक कवि थे. उन्होंने हिंदुओं में जाति व्यवस्था में दमन और ऊंच-नीच को लेकर आंदोलन छेड़ा. बासवन्ना मूर्ति पूजा को बिल्कुत नहीं मानते थे. साथ ही वेदों में लिखी बातों को भी खारिज कर देते थे. इस कारण कई पिछड़ी जाति के लोगों ने लिंगायत धर्म अपनाया. 

हालांकि, इसमें भी एक दुविधा है. कई लोगों का मानना है कि कर्नाटक में पनपे शैव सम्प्रदाय का उपसम्प्रदाय- वीरशैव- लिंगायत उन्हीं का हिस्सा है या फिर वो लिंगायत का हिस्सा है या फिर दोनों एक ही हैं. दोनों एक नहीं है और ये दोनों ही सम्प्रदायों में कलेश का बड़ा मुद्दा है. जहां वीरशैव जाति और वेदों-उपनिषदों को मानते हैं वहीं लिंगायत धर्म इन्हें सिरे से खारिज कर देता है. साथ ही साथ लिंगायत धर्म के लोग मानते हैं कि इन्हीं चीज़ों के खिलाफ उनके धर्म का जन्म हुआ है. 

भगवान शिव की पूजा करते हैं दोनों समुदाय

वीरशैव तो शिवलिंग (Shivling) को पूजते हैं, वहीं लिंगायत धर्म के लोग इष्ट लिंग की पूजा करते हैं, जिसे आत्म चेतना का प्रतीक भी माना जाता है. भले ही दोनों सम्प्रदाय भगवान शिव (Lord Shiva) की पूजा करते हों, मगर इसका मतलब ये कतई नहीं कि दोनों एक ही हैं. जिस तरह से ब्राह्मण मानते हैं कि वो ब्रह्मा के कान से जन्मे हैं, वैष्णव मानते हैं कि वो शिव के लिंग से जन्मे हैं. वीरशैव, शैव सम्प्रदाय का ही उप-सम्प्रदाय है. ये दोनों ही धारणाएं सनातन धर्म की धारणाएं हैं. 

इससे अलग हट कर लिंगायत धर्म के लोग इन बातों में यकीन नहीं रखते. उनका मानना है कि कर्म ही पूजा है. बसवन्ना ने न केवल इनका विरोध किया, उन्होंने इसके लिए विकल्प भी पेश किए. इस तरह से ये दोनों अलग हैं. 

पिछले 8 दशकों से चल रही सियासत

लिंगायक सम्प्रदाय के ऊपर पिछले 8 दशकों से सियासत चल रही है. दरअसल, लिंगायत धर्म के लोगों को संविधान में अलग धर्म होने की मान्यता चाहिए. जब संविधान लिखा जा रहा था तो संविधान सभा में कुछ लोग लिंगायत समुदाय से भी थे, जिनकी मांग थी लिंगायत को एक धर्म माना जाए.

संविधान सभा में मौजूद लिंगायत सम्प्रदाय के लोगों ने सवाल किया कि अगर बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म, जो लिंगायत धर्म की तरह हिन्दू धर्म की मान्यताओं की खिलाफत से ही जन्मे हैं, इन धर्मों को अगर संवैधानिक तौर पर अलग धर्म होने और अल्पसंख्यक धर्म होने की मान्यता मिल सकती है, तो उन्हें क्यों नहीं.

1904 में हंगल मठ के मुख्य पुजारी ने 'अखिल भारतीय वीरशैव महासभा' की स्थापना की थी और खुद को लिंगायतों और वीरशैवों का मुखिया बता दिया था. 36 साल बाद 1940 में इसी महासभा को बाहर आ कर बोलना पड़ा कि लिंगायत वीरशैव का हिस्सा नहीं हैं. तो जब लिंगायत धर्म को संवैधानिक तौर पर अल्पसंख्यक धर्म मानने की बात आई तब सबसे बड़ा विवाद ये था कि क्या ये लोग वीरशैव का ही उप-सम्प्रदाय हैं? 

दोनों समुदाय अलग कैसे हैं?

यहां एक बात और जान लीजिए. आखिर ये दोनों अलग समुदाय कैसे हैं. वीरशैव खुद सनातन धर्म का ही हिस्सा है. ये शिव भक्त हैं और वेद उपनिषद मानते हैं, जाति मानते हैं. अगर लिंगायत भी वीरशैव हैं तो ये लोग भी सनातन धर्म का हिस्सा हुए. संविधान लिखने वालों का कहना था कि फिर इन्हें एक अलग धर्म की क्या ज़रूरत. हां अब ये बहस का मुद्दा नहीं हो सकता, क्योंकि अब ये साफ है कि लिंगायत और वीरशैव अलग अलग हैं. 

बताया जाता है कि इन दोनों में विवाद इसलिए था, क्योंकि लिंगायत और वीरशैव का साहित्य और बसवन्ना के वचन, ये सब समय के साथ-साथ आपस में मिल गए और बाकी दक्षिण भारतीय राज्यों में यहां-वहां गुम हो गए थे. इसके बाद दिग्गज शोधकर्ता जैसे एम.एम कलबुर्गी, वीरण्णा राजुर और टी.आर चंद्रशेखर ने इनके वचनों पर रिसर्च की तब पता चला कि ये दोनों ही अलग-अलग मान्यताएं और धर्म हैं. लिंगायत धर्म के लोग खुद को हिन्दू नहीं मानते.

इनसे जुड़ी राजनीति और उसका महत्व

कर्नाटक में हर पार्टी इन्हें रिझाना चाहती है. प्रदेश में इनकी आबादी 18 फीसदी के करीब है. 1956 में कर्नाटक में भाषा के आधार पर पुनर्गठन हुआ था. लिंगायत धर्म की शक्ति हम ऐसे आंक सकते हैं कि 1956 से लेकर अब तक कुल 20 मुख्यमंत्री हुए हैं और उनमें से 8 मुख्यमंत्री लिंगायत समुदाय से ही बने. इस वक्त किसी को भी पूरी तरीके से ये मालूम नहीं है कि लिंगायतों की आबादी कितनी है. हालांकि, आधिकारिक जाति जनगणना के आखिरी आंकड़े 1931 में ही आए थे. 2011 में कांग्रेस के समय जाति जनगणना हुई तो थी मगर इस डाटा को राजनीतिक वजहों के चलते कभी बहार नहीं लाया गया. कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने 2015 में राज्य की जाति जनगणना कराई थी, लेकिन इस डाटा को भी बाहर नहीं लाया गया. हालांकि इसकी कुछ रिपोर्ट लीक जरूर हुई थी.

वहीं अब माना जाता है कि कर्नाटक की कुल आबादी में लिंगायतों की संख्या 18 फीसदी है, जो 110 विधानसभा सीटों पर सीधा असर डालते हैं. कर्नाटक के अलावा पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इस समुदाय की अच्छी आबादी है.  

कर्नाटक विधानसभा का समीकरण

कर्नाटक राजनीतिक लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है. राज्य में 224 विधानसभा और 28 लोकसभा की सीटें हैं. मौजूदा विधानसभा में बीजेपी के पास 121, कांग्रेस के पास 69 और जेडीएस के पास 30 विधायक हैं. वहीं लोकसभा की 28 सीटों में से 25 बीजेपी, एक-एक कांग्रेस, जेडीएस और निर्दलीय के पास है.

सिद्धारमैया ने कर दिया ये वादा

2014 की जनगणना के हिसाब से कर्नाटक की कुल आबादी 6.41 करोड़ है. अगर लिंगायतों की आबादी 17-18% है, तो कुछ नहीं तो 90-100 सीटों पर इनके मूड का असर साफ देखने को मिलेगा. कांग्रेस नेता व पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया (Siddaramaiah) वोक्कालिंगा से ताल्लुक रखते हैं. लिंगायतों को रिझाने के लिए वो कह रहे हैं कि अगर हमारा साथ दिया तो हम आपको एक अलग धर्म और अल्पसंख्यक होने की मान्यता दिलवा देंगे. अभी बीजेपी के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत सम्प्रदाय से आते हैं, लेकिन वो भी ऐसा वादा नहीं कर पाए हैं. 

मुख्य पुजारी पर रेप का आरोप, पार्टियों ने साधी चुप्पी

लिंगायतों की कर्नाटक की राजनीति पर मजबूत पकड़ है. सभी पार्टियां इनको रिझाने में लगी रहती हैं. अभी तक के इतिहास को देखा जाए, तो ऐसा कहा जाता है कि ये समुदाय एकजुट होकर ही वोट करता है. हालिया विवाद में सभी ने देखा कि कैसे एक लिंगायत मठ के मुख्य पुजारी पर पॉक्सो एक्ट और आईपीसी के तहत आरोप दर्ज किए गए हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि किसी भी पार्टी का नेता इस पर कोई बयान नहीं देना चाहता.

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