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Bangladesh Kolakopa: ढाका के पास हिंदू जमींदारों की विरासत समेटें हैं ये हवेलियां, इतिहास के पन्नों में नहीं मिलेगा जिक्र

Hindu Haveli in Bangladesh: बांग्लादेश की राजधानी ढाका के सीमावर्ती गांव कोलाकोपा की 3 हवेलियां इस बात की गवाह हैं कि कभी वहां हिंदू जमींदारों की विरासत हुआ करती थी.

Hindu Haveli In Dhaka: कभी अखंड भारत का हिस्सा रहा बांग्लादेश तीन युद्ध के बाद अस्तित्व में आया है. पहला 1947 में जब देश का विभाजन हुआ था. तब वह पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था. इसके बाद 1964 में आंतरिक दंगे हुए जिसकी वजह से वहां पूरी तरह मुस्लिमों का वर्चस्व हो गया. इसके बाद 1971 का युद्ध हुआ जिसमें वह पाकिस्तान से अलग होकर पूरी तरह से स्वतंत्र बांग्लादेश बना. बावजूद इसके बांग्लादेश की राजधानी ढाका के सीमावर्ती गांव कोलाकोपा की तीन बड़ी हवेलियां इस बात की गवाह हैं कि कभी वहां धनाड्य हिंदुओं और जमींदारों की विरासत हुआ करती थी.

इतिहास के पन्नों में नहीं मिलेगा इनका जिक्र

वैसे तो बांग्लादेश में पर्यटन के लिहाज से काफी कुछ देखने को है. इसके बाद भी इस कोलाकोपा के बारे में न तो आपको कहीं किसी ट्रेवल ब्रोशर में कुछ देखने या पढ़ने को मिलेगा और न ही किसी इतिहासकार ने इसका जिक्र किया है. इन अद्भुत और कई रहस्यों को समेटे हवेलियों पर जब ट्रेवल ट्यूबर सलाउद्दीन की नजर पड़ी तो वह मंत्रमुग्ध हो गए. इसके बाद उन्होंने इसकी पूरी कहानी सामने लाने की कोशिश की.

कोलाकोपा की भव्यता का प्रतीक हैं ये हवेलियां

इन तीनों हवेलियों को अब जज बाड़ी (यानी जज का घर), उकील बाड़ी (वकील का घर) और आनंद कुटीर के नाम से लोग अब जानते हैं. हालांकि इनके मुख्य वारिसों को कोई नहीं जानता. यह पहचान इनके हालिया मालिकों के नाम पर मिली है. मजे की बात यह है कि इन हवेलियों में रहने वाले अब न कोई जज हैं और न वकील. कोलाकोपा गांव के शुरुआत में यह भव्य हवेलियां वहां की सुंदरता का प्रतीक हैं. यह बिल्कुल शांत होने के बाद भी इस गांव को संजीदा रखती हैं. वर्तमान के गांव वाले सिर्फ इतना ही जानते हैं कि यह गांव कभी हिंदू जमींदारों का था.

कुछ 1947 और कुछ 1971 में चले गए

कोलाकोपा में रहने वाले धनाड्य हिंदू और जमींदार में आधे से अधिक तो बंटवारे के समय 1947 में ही अपना घर-व्यापार छोड़कर चले गए. अन्य जो बचे थे वह 1971 की लड़ाई के बाद चले गए. यहां के अधिकांश कोलाकोपा के निवासियों को भी इस गांव की भव्यता और समृद्धता के बारे में जानकारी नहीं है. बांग्लादेश के पर्यटन की सूची से भी कोलाकोपा को बाहर ही रखा गया है.

सरकारी उपेक्षा की शिकार हैं ये हवेलियां

शानदार पिलर और छज्जों वाली इन विशालकाय इमारतों की सुंदरता को यहां के बगीचे-फव्वारे और मनमोहक बनाते हैं. बड़े हवादार कमरे अब अंधेरे में पड़े रहते हैं. लगातार सरकारी उपेक्षा के चलते अब इनकी खूबसूरती भी कम होने लगी है. कभी-कभी किसी सरकारी अधिकारी को यह आवंटित कर दी जाती हैं.

कोलाकोपा की खुशहाली की गवाह इचामती नदी

ट्रेवल ट्यूबर सलाउद्दीन के अनुसार यहां गांव के साथ बहने वाली  इचामती नदी इस गांव की समृद्धता की कहानी सुनाती है. निश्चित रूप से पुराने जमाने में यह स्थान एक प्रमुख एवं महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थान रहा होगा. यहां पर स्टीमर और बड़ी नौकाएं घाट पर खड़ी रहती होंगी. जिसके कारण यहां व्यापार काफी फला-फूला होगा. सलाउद्दीन का कहना है कि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या सोचता है, यह मेरा काम है.

मैं जहां भी हिंदू विरासत के निशान देखता हूं. उन्हें सबके सामने लाने की कोशिश करता हूं. सलाउद्दीन अपने ट्रेवल शो में हिंदू इतिहास के दस्तावेजों को दिखाते और दर्शाते हैं. कोलाकोपा भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है. यह बताता है कि जो आज बांग्लादेश है. वहां कभी हिंदू जमींदारों का शासन हुआ करता था.     

इन हवेलियों का नकारात्मक पहलू

वहीं दूसरी ओर इतिहासकार अविषेक बिस्वास ने इन हवेलियों के नकारात्मक पहलू के बारे में बताया है. उन्होंने इन हवेलियों को शोषण और रक्तपात की प्रतीक माना है. मौखिक इतिहासकार ने दलित विभाजन से जुड़ी कहानियों पर डॉक्ट्ररेट की हुई है. उनका मानना है कि यह हवेलियां दुनियां के इस हिस्से में रक्तपात का कारण रहीं हैं.

भूली-बिसरी यादों की तरह हैं ये हवेलियां. ये देखने में जितनी खूबसूरत हैं. उतनी विभत्स हैं इनकी कहानियां. यह स्थानीय प्रजा के साथ किए गए अन्याय एवं भेदभाव की गवाह हैं. मुस्लिम और निचली जाति के गरीब हिंदुओं को इनकी अमानवियता का  शिकार होना पड़ा. उनके साथ घृणा और अछूत जैसा व्यवहार होता था.

कुछ जमींदारों की हुई थी भयानक मौत

इतिहासकार बिस्वास की माने तो 1947 के विभाजन के बाद 1964 में हुई सांप्रदायिक हिंसा ने यहां की पूरी तस्वीर ही बदल डाली थी. इसके बाद 1971 के मुक्ति संग्राम ने एक नई दिशा ले ली थी. इस दौरान मुसलमान बहुसंख्यक हो गए. हिंदू जमींदारों को अपने घर-व्यापार छोड़कर भागना पड़ा. इनमें से कुछ को खौफनाक मौत का सामना भी करना पड़ा था. ये हवेलियां आज भी हिंसा के इतिहास की गवाह हैं.

वहीं स्थानीय गांव के निवासी का मानना है कि हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वहां पहले कौन रहता था. आज यहां उनका कोई निशान नहीं है. जब वह लोग अपना गांव भूल गए तो हम उन्हें क्यों याद रखें. यह कहना हवेली के पीछे 150 साल पुरानी सुनार की दुकान में काम करने वाले कारीगर रंजीत पाल का है. यह दुकान हिंदू सुनार उत्तम नाग की है. रंजीत पाल को भी नहीं पता कि यह गांव पहले हिंदू जमींदारों का था.

कोलाकोपा का राबिनहुड

बांग्लादेश की राजधानी ढाका के शुरुआती गांव कोलाकोपा की इन तीन हवेलियों की कहानियों के बीच एक महत्वपूर्ण कहानी और भी है. जिसका हीरो एक हिंदू ही थी. यह कहानी रंजीत पाल ने ही बताई है. बकौल रंजीत उसका नाम खेलाराम था और लोग उसे सोने के दिल वाला डाकू पुकारते थे. मगर वह गरीबों के लिए मसीहा था. यानी वह कोलाकोपा का एक तरह से वह राबिनहुड था. खेलाराम अमीरों से माल लूटता था और उसे गरीबों में बांट देता था.

डाकू बेटे ने अपनी मां के लिए ये कर डाला

वह अपनी मां का सच्चा बेटा था. उसके बारे में कहा जाता है कि एक बार उसकी मां ने उससे मिल्कशेक पीने की इच्छा जताई. उसने अपने घर में बड़े से टैंक में दूध भर दिया और उसमें आम डाल दिए. उसने ऐसा इसलिए किया कि उसकी मां को अब कभी इस चीज की कमी न पड़े. अभी यहां एक वीरान घर पड़ा है. कहते हैं वह उसी खेलाराम का है. लेकिन उसमें वह टैंक नहीं मिला जिसमें उसने अपनी मां के लिए दूध और आम डाले थे.

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