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खुशवंत सिंह: एक ऐसा लेखक, जो जैसा था, वो हमेशा वैसा ही रहा

Khushwant Singh ने अपनी पेशेवर जिंदगी में एक पत्रकार के रूप में भी बहुत ख्याति अर्जित की. खुशवंत सिंह 1951 में आकाशवाणी से जुड़े थे और उन्होंने 1951 से 1953 तक सरकार के पत्र 'योजना' का संपादन किया.

Khushwant Singh Biography: खुशवंत सिंह का जन्म 2 फरवरी, 1915 को पाकिस्तान पंजाब के खुशाब के हदाली जिले में हुआ था. उन्होंने सेंट स्टीफन कॉलेज (दिल्ली) और किंग्स कॉलेज (लंदन) में अध्ययन किया. वह एक प्रबल राजनीतिक आलोचक रहे और 1980 से 1986 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे. निजी जीवन की बात करें तो उन्होंने साल 1939 में कवल मलिक के साथ शादी की थी. उनके बेटे का नाम राहुल सिंह और बेटी का नाम माला है.

खुशवंत सिंह की एक खास बात ये भी रही कि वो जितने लोकप्रिय भारत में थे उतने ही पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी थे. सिंह की किताब 'ट्रेन टू पाकिस्तान' (Train To Pakistan Book) बेहद लोकप्रिय हुई. इस बुक पर फिल्म भी बन चुकी है. खुशवंत को अपने जीवन में तमाम पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण ने भी नवाजा गया. कहा जाता है कि खुशवंत सिंह ने अपनी पूरी जिंदगी एक जिन्दादिल इंसान की तरह पूरी कर्मठता के साथ जी थी.

खुशवंत सिंह का करियर

खुशवंत सिंह ने अपनी पेशेवर जिंदगी में एक पत्रकार के रूप में भी बहुत ख्याति अर्जित की. खुशवंत सिंह 1951 में आकाशवाणी से जुड़े थे और उन्होंने 1951 से 1953 तक भारत सरकार के पत्र 'योजना' का संपादन किया. इसी के साथ, वे 1980 तक मुंबई से प्रकाशित प्रसिद्ध अंग्रेजी साप्ताहिक 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया' और 'न्यू डेल्ही' के संपादक रहे.

जाति व्यवस्था के खिलाफ थे खुशवंत सिंह

इसके बाद, 1983 तक उन्होंने दिल्ली के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक 'हिन्दुस्तान टाइम्स' का संपादन भी किया. कहा जाता है कि हर सप्ताह आने वाले उनके कॉलम का पाठक बेसब्री से इंतजार किया करते थे. एक व्यक्ति और एक लेखक के रूप में खुशवंत सिंह जाति व्यवस्था के बेहद खिलाफ थे. उनकी रचनाएं राजनीतिक टिप्पणी और समकालीन व्यंग्य से लेकर सिख धार्मिक ग्रंथों और उर्दू कविता के उत्कृष्ट अनुवाद तक हैं.

खुशवंत सिंह को इन तीनों चीजों से बेहद प्यार था

खुशवंत सिंह के बारे में एक बेहद खास बात रही है. उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव तक लिखना नहीं छोड़ा था. खुशवंत सिंह 99 साल की उम्र में भी सुबह 4 बजे उठकर लिखना पसंद करते थे. सिंह नेचर लवर थे और अक्सर लिखने के लिए घंटों तक बगीचों में बैठते थे. कहा जाता है कि सिंह को तीन चीजों से बेहद प्यारा था. पहला दिल्ली, दूसरा लेखन और तीसरा खूबसूरत महिलाएं. बता दें कि 20 मार्च, 2014 को खुशवंत सिंह इस दुनिया को अलविदा कह गए थे.

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