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Independence Day: चंद्रशेखर आजाद की 'बमतुल बुखारा' से घबराते थे अंग्रेज, जानिए कहां है अब वो पिस्तौल और क्या थी उसकी खासियतें

Chandra Shekhar Azad Pistol: चंद्रशेखर आजाद ने कभी भी अंग्रजों के हाथ ना आने की प्रतिज्ञा ली थी और आजीवन इस प्रतिज्ञा को निभाया.

Chandra Shekhar Azad Pistol Facts: भारत अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है, लेकिन ये आजादी ऐसे ही नहीं मिली. अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए कई क्रांतिकारियों ने कुर्बानी दी तब जाकर देश आजाद हुआ था. देश के इन्हीं महान सपूतों में एक थे चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad). अंग्रेज सरकार चंद्रशेखर आजाद से घबराती थी. चंद्रशेखर आजाद ने कभी भी अंग्रजों के हाथ ना आने की प्रतिज्ञा ली थी और आजीवन इस प्रतिज्ञा को निभाया.

इसके लिए उन्होंने अपनी जान तक न्योछावर कर दी, लेकिन अंग्रजों के हाथ नहीं आए. जब तक चंद्रशेखर आजाद जिंदा रहे उन्होंने अंग्रेजों को चैन से बैठने नहीं दिया. सिर्फ चंद्रशेखर आजाद ही नहीं बल्कि अंग्रेज तो उनकी पिस्तौल से भी परेशान थे. 

चंद्रशेखर आजाद की पिस्तौल 'बमतुल बुखारा'

कोल्ट कंपनी की अपनी इस पिस्टल को आजाद जी शान से 'बमतुल बुखारा' (Bamtul Bukhara) कहते थे. इस पिस्तौल से गोली चलने के बाद धुआं नहीं निकलता था. इसलिए अंग्रेज ये नहीं जान पाते थे कि गोलियां कहां से चल रही हैं. शहीद आजाद बड़ी आसानी से पेड़ों के पीछे छिपकर गोलियां चलाते थे और अंग्रेजों को पता ही नहीं चल पाता था कि गोलियां किस ओर से चल रही हैं. ये प्वाइंट 32 बोर की पिस्टल हैमरलेस सेमी ऑटोमेटिक थी. इस पिस्टल में आठ बुलेट की एक मैगजीन लगती है और इसकी मारक क्षमता 25 से 30 यार्ड है.  


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अंग्रेज कभी जिंदा नहीं पकड़ पाए

27 फरवरी 1931 को पुलिस ने चंद्रशेखर आजाद को एक पार्क में घेर लिया था. वे अपने संगठन के साथी के साथ मीटिंग कर रहे थे. तब उन्होंने अकेले अंग्रेजों के साथ लोहा लिया. इस दौरान उनकी दाहिनी जांघ पर गोली लग गई थी जिससे उनका बचना मुश्किल हो गया था. उनकी पिस्तौल में जब एक गोली बाकी रह गई थी तो उन्होंने कभी भी जीवित ना पकड़े जाने की प्रतिज्ञा का पालन करते हुए खुद को गोली मार ली थी.  

अंग्रेज अधिकारी पिस्तौल को ले गया था इंग्लैंड

चंद्रशेखर आजाद ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंतिम सांस ली थी. उनकी शहादत के बाद पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आजाद पार्क कर दिया गया. उनके शहीद होने के बाद एक पुलिस अधिकारी सर जॉन नॉट बावर उनकी पिस्तौल अपने साथ लेकर इंग्लैंड चले गए थे. लंदन में भारतीय उच्चायोग की लाख कोशिशों के बाद 1972 में चंद्रशेखर आजाद की पिस्तौल वापस भारत लौटी थी. 

इलाहाबाद म्यूजियम में रखी है अब ये पिस्तौल 

इस पिस्तौल को 27 फरवरी 1973 को लखनऊ के संग्रहालय में रखा गया था, लेकिन इलाहाबाद म्यूजियम (Allahabad Museum) बनने के बाद इस पिस्तौल को वहां ले जाया गया. इस पिस्तौल को इलाहाबाद म्यूजियम में बुलेटप्रूफ ग्लास के बॉक्स में सेंट्रल हॉल के बीच में रखा गया है. म्यूजियम में आने वाले हर व्यक्ति का ध्यान शहीद चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) की पिस्तौल बमतुल बुखारा की तरफ ही जाता है. 

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