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DEPTH: जनता फटेहाल, नेता कैसे मालामाल ?

नई दिल्ली: आपने सोने में 15 साल निवेश किया होगा तो फायदा 13.66 प्रतिशत फीसदी हुआ. आपने शेयर बाजार में 15 साल निवेश किया होगा तो फायदा 13.97प्रतिशत फीसदी हुआ. लेकिन पांच साल सियासी कुर्सी पर निवेश करने पर मुनाफा 1015 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. सुनकर चौंक गए होंगे आप कि क्या राजनीति देश में सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली जगह है ? देश का कोई नेता तो आपको ये बात नहीं बताएगा. लेकिन मौजूदा केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कुछ दिनों पहले ये सच भी देश को बताया था. केंद्रीय इस्पात मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा कि बिजनेस में चाहे फेल हो जाओ..सरकारी नौकरी में फेल हो जाओ...अच्छे डॉक्टर ना बन सको..अच्छे टीचर ना बन सको...अच्छे वकील ना बन सको...तो राजनीति में प्रवेश कर लो...आजकल तो किसी को और कहीं से नजर ना आए...तो सबसे अच्छा धंधा राजनीति है. सियासत में दिन दूनी रात चौगुनी होने वाली बरक्कत पर किसी राजनेता का इससे साफ कबूलनामा कभी नहीं हो सकता. ये बयान पुराना था. लेकिन नई कहानी भी ऐसी ही है. उत्तराखंड में वोटिंग हुई है. जनता ने किन्हें वोट डाला है, जरा देखिए पांच साल में उनकी कमाई का पहाड़ कैसे खड़ा हुआ? उत्तराखंड में करीब 60 मौजूदा विधायकों ने दोबारा चुनाव लड़ा है. 5 साल में इन 60 विधायकों की संपत्ति औसत 1 करोड़ 77 लाख रुपए बढ़ी है. 5 साल में 60 विधायकों की संपत्ति 96प्रतिशत तक और बढ़ गई. चुनाव जीतते ही नेताओं की संपत्ति छप्परफाड़ कैसे बढ़ने लगती है. इसका सबूत भी हमारे पास है. नाम- शैलेंद्र मोहन सिंघल विधायक, जसपुर, उत्तराखंड पुराने कांग्रेसी, अब बीजेपी के टिकट पर उतरे 5 साल पहले इनकी संपत्ति 3 करोड़ थी. 5 साल में 35 करोड़ हो गई. संपत्ति में 1015प्रतिशत का इजाफा नेताजी को सियासत में हुआ. नेता कहीं के भी हों, राजनीति उन्हें पांच साल में मालामाल कर ही देती है. जिस उत्तर प्रदेश में 6 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीते हैं. उसी उत्तर प्रदेश में 403 में से 271 विधायक करोड़पति चुने जाते हैं. उन्हीं में से एक हैं कभी बीपीएल कार्ड धारक कहे जाने वाले गायत्री प्रजापति जो सियासत में उतरे तो प्रजा बेहाल रही लेकिन गायत्री करोड़पति बन गए. सियासत में पैर छूकर ही सबकुछ पाने वाले समाजवादी पार्टी के नेता और मंत्री गायत्री प्रजापति 2002 तक गरीबी रेखा से नीचे खुद को बताते थे. 2012 में पहली बार गायत्री प्रजापति विधायक बने और फिर खनन मंत्री भी. लेकिन 15 साल पहले बीपीएल कार्ड धारक गायत्री प्रजापति 10 साल में करोड़पति हो जाते हैं. 2009-10 में गायत्री प्रजापति कहते थे कि उनकी वार्षिक आय 3.71 लाख रुपए थी. 2011 में रामगोपाल यादव ने बताया कि गायत्री प्रजापति ने पार्टी को ही 25 लाख चंदा दिया है. हलफनामे के मुताबिक 2012 में गायत्री प्रजापति ने अपनी संपत्ति 1.72 करोड़ बताई. 5 साल बाद गायत्री प्रजापति की संपत्ति में 6 गुना इजाफा हो चुका है. और जब गायत्री प्रजापति से हमने पूछा कि आखिरी राजनीति में तिजोरी की कौन सी चाभी से वो साल दर साल मालामाल हुए तो प्रजापति भड़क गए. आखिर पांच साल में कैसे एक नेता करोड़ों रुपए की मिल्कियत खड़ी कर लेता है, जबकि आम आदमी पांच साल बाद भी अपनी EMI कम हुई कि नहीं यही देखता रहता है. ये जानने के लिए हम अनिल वर्मा से मिले. जो चुनावों पर गहरी नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के राष्ट्रीय संयोजक हैं. ADR के संयोजक अनिल वर्मा ने कहा कि कई नेता ऐसे होते हैं जो पॉवर में आने के बाद सरकार के कांट्रैक्ट्स (माइनिंग, रियल इस्टेट, एजुकेशनल इन्स्टिटूशंस) का फ़ायदा उठाकर अपनी सम्पत्ति खड़ी करते हैं. यानि राजनीति एक ऐसा बिजनेस बन जाता है, जहां पांच साल में कम से कम दोगुना फायदे की गारंटी तो है ही. लेकिन जब राजनीति को सिर्फ मुनाफा कमाने का व्यापार नेता समझने लगते हैं तो जेल भी जाना पड़ता है. आय से अधिक संपत्ति के मामले में जयललिता को जेल जाना पड़ा और अब उनकी सहयोगी और सीएम बनने का ख्वाब देख रही शशिकला भी कैदी नंबर 1711 बन गई हैं. जिन्होंने सियासत को मुनाफे की फैक्ट्री बना डाला था. नेताओं के मालामाल होने का मुद्दा आज यूपी के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उठा दिया. कन्नौज की रैली में नरेंद्र मोदी ने कहा कि समाजवादी लोगों के पास दो सौ से ज्यादा गाड़ियां हैं. लेकिन प्रधानमंत्री इस बात को शायद भूल गए कि यूपी में करोड़पतियों को टिकट देने में उन्हीं की पार्टी नंबर दो पर है. लखनऊ कैंट सीट पर देवरानी अपर्णा यादव के प्रचार के लिए जेठानी डिंपल यादव पहुंचीं थीं. डिंपल ने कहा मोदी सरकार के मंत्री दर्जन भर से ज्यादा हेलीकॉप्टर लेकर चुनाव में उतरे हैं. जनता का पैसा फूंक रहे हैं. डिंपल यादव की मोदी पर इस नाराजगी की वजह है. प्रधानमंत्री का कन्नौज में किया गया सियासी वार. पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि मेरे खाते में एक कार नहीं है, एक गाड़ी नहीं है, मेरे पास कोई गाड़ी नहीं, अभी पीएम हूं तो सरकार की गाड़ी में गुजारा कर लेता हूं, ये समाजवादी लोग, इनके घर में 200 से ज्यादा तो गाड़ियां रखते होंगे, ये कौन सा समाजवाद, ये लोगों के साथ धोखाधड़ी करने वाले लोग हैं. अब प्रधानमंत्री ने क्यों समाजवादियों की कार को मुद्दा बनाया है, उसकी वजह है मुलायम के दूसरे बेटे और अपर्णा यादव के पति प्रतीक यादव की पांच करोड़ वाली लैंबोर्गिनी कार. समाजवाद की राजनीति पर इसी कार के जरिए प्रहार हुआ तो प्रतीक सफाई देते हैं कि मैंने कार लोन पर ली है. तो आखिर समाजवादी परिवार में कितनी कारें हैं. मुलायम सिंह के परिवार के लोगों का हलफनामा हमने खंगाला तो पता चला कि अखिलेश यादव के पास पजेरो है. मुलायम सिंह के पास कैमरी टोयोटा है. रामगोपाल यादव के पास दो कार हैं. मारुजि सुजुकी एसएक्सफोर, टोयोटा इनोवा. अपर्णा यादव के पति प्रतीक के पास लैंबोर्गिनी, शिवपाल यादव के पास पजेरो, तेज प्रताप यादव के पास फॉर्च्यूनर, धर्मेंद्र यादव के पास एक कार और अनुराग यादव के पास हॉन्डा सिटी है. अब भले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करोड़ों की कार का मुद्दा उठाएं. लेकिन सच तो ये भी है कि यूपी में उनकी पार्टी करोड़पति नेताओं को टिकट देने में नंबर दो पर है. ADR की रिसर्च के मुताबिक पहले तीन चरण में बीजेपी के 208 प्रत्याशियों में से 172 करोड़पति हैं. तो पिछड़ों का झंडा उठाने वाली बीएसपी के पहले तीन चरण में 207 कैंडिडेट में 180 करोड़पति हैं. सियासत में नेताओं की संपत्ति बढ़ते जाने की एक बड़ी वजह है नेताओं का असली आय, संपत्ति और मिलने वाले पैसे का सही स्रोत ना बताना. जरूरत है कि ऐसा पारदर्शी सिस्टम बने जहां जनता की तरह ही नेताओं को भी अपनी एक एक पाई साफ साफ दिखानी पड़े. पांच साल में अकूत दौलत कोई बनाएं तो उसका स्रोत पूछा जाए. और जब ऐसा नहीं होगा. जनता फटेहाल ही रहेगी, नेता मालामाल बनते रहेंगे. देश में जब गरीब रह जाती है, नेता और अमीर होते जाते हैं. जो आम आदमी सवाल उठाने लगता है. IPSOS एजेंसी ने जब दुनिया के कई देशों में सर्वे कराया कि आखिर अमीर होते नेताओं के आगे आम आदमी क्या चाहता है. नतीजों में पता चला कि भारत में 71 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि देश में अमीर नेताओं और ताकतवार लोगों के पास कैद राजनीति आजाद होनी चाहिए. देश में 65 फीसदी लोगों ने राय रखी कि ऐसा करने की अगर जरूरत पड़े तो राजनीतिक नेतृत्व को नियम तोड़ने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए. 64 फीसदी लोगों ने सर्वे में बताया का सियासत में अमीर होने वाले लेता आम आदमी की बहुत कम फिक्र करते हैं. इसका सीधा सा मतलब यही है कि राजनीति को कारोबार बनाने वाले नेता जाग जाएं. ऐसे पारदर्शी नियम बनने चाहिए जहां राजनीति सिर्फ अमीर होने का जरिया ना रहे. बल्कि देश की आम जनता को मजबूत करने का रास्ता बने.
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