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Assembly Speaker: 2022 में सुर्खियों में रहा विधानसभा अध्यक्ष का पद, स्पीकर को हटाना है कितना मुश्किल, क्या कहता है संविधान

Maharashtra Rahul Narwekar: हाल में महाराष्ट्र के स्पीकर राहुल नार्वेकर को हटाने की मांग उठी. वहीं अगस्त में बिहार के स्पीकर विजय कुमार सिन्हा को हटाने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव लाया गया था.

Assembly Speaker: 2022 में देश की राजनीति में कई उथल-पुथल देखने को मिला. कई राज्यों में चुनाव के बाद सरकारें बदली, तो कुछ राज्यों में बिना चुनाव के ही सरकारें बदल गई. इन सबके बीच एक शब्द 'विधानसभा अध्यक्ष या असेंबली स्पीकर (Assembly Speaker)'भी सियासी सुर्खियां बटोरने में कामयाब रहा. 

अगस्त 2022 में बिहार के विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा (Vijay Kumar Sinha) को हटाने के लिए सदन में प्रस्ताव लाया गया था. फिर साल के आखिर में महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर (Rahul Narwekar) के खिलाफ विपक्ष की ओर अविश्वास प्रस्ताव ((No Confidence Motion) लाने की मंशा से ये सवाल उठने लगा कि क्या असेंबली स्पीकर को आसानी से हटाया जा सकता है. 

महाराष्ट्र में  स्पीकर को हटाने की मांग 

29 दिसंबर 2022 को विपक्षी गठबंधन महा विकास आघाड़ी (MVA) ने महाराष्ट्र विधानसभा सचिव राजेंद्र भागवत  को  चिट्ठी लिखकर विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की मांग की. विपक्षी गठबंधन महा विकास आघाड़ी (MVA) में शामिल कांग्रेस, उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी के कई विधायकों ने आरोप लगाया कि स्पीकर नार्वेकर ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान  विपक्षी सदस्यों को बोलने का मौका नहीं दिया. विपक्षी विधायकों ने राहुल नार्वेकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर  30 से ज्यादा एमएलए के हस्ताक्षर होने का भी दावा किया. बीजेपी विधायक राहुल नार्वेकर को जुलाई 2020 में विधानसभा अध्यक्ष चुना गया था. राहुल नार्वेकर ने  उद्धव ठाकरे गुट के शिवसेना उम्मीदवार राजन साल्वी को हराया था.  45 साल के नार्वेकर देश के सबसे युवा विधानसभा अध्यक्ष हैं. 

बिहार में सरकार चाहती थी हटाना

आम तौर पर विधानसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए विपक्ष की ओर से संकल्प लाया जाता है, लेकिन अगस्त 2022 में बिहार में सरकार की ओर से ऐसा प्रस्ताव लाया गया. बात चौंकने वाली है, लेकिन बिहार में सत्ता में बदलाव की वजह से ऐसा हुआ. 10 अगस्त 2022 को बिहार में  नई सरकार बनी. जेडीयू के नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ नाता तोड़कर आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर नई सरकार बनाई. उस वक्त बीजेपी नेता विजय कुमार सिन्हा विधानसभा अध्यक्ष थे. सरकार में बदलाव के बाद भी उन्होंने स्पीकर के पद से इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था. उसके बाद महाठबंधन सरकार की ओर से उन्हें हटाने के लिए सदन में प्रस्ताव लाया गया. हालांकि प्रस्ताव पर सदन में आगे की कार्यवाही से पहले ही 24 अगस्त को विजय कुमार सिन्हा ने विधानसभा अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया.  

आम तौर पर सत्तारूढ़ पार्टी से होते हैं स्पीकर 

दरअसल भारत की संसदीय प्रणाली में विधानसभा अध्यक्ष या स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर विपक्षी दल दबाव बनाने की कोशिश करते हैं. अगर सरकार के पास बहुमत है, तो इस तरह के अविश्वास प्रस्ताव या संकल्प का कोई ज्यादा महत्व नहीं रह जाता है. इसके पीछे वजह ये है कि असेंबली स्पीकर आमतौर पर सत्ताधारी दल के सदस्यों में से ही चुने जाते हैं. संविधान में विधानसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए एक खास प्रक्रिया की व्यवस्था की गई है. संविधान के प्रावधानों के आधार पर हर विधानसभा के कार्य नियमावली संचालन में स्पीकर को हटाने के नियमों को शामिल किया जाता है.  

विधानसभा अध्यक्ष संवैधानिक पद है

विधानसभा अध्यक्ष का पद एक संवैधानिक पद है. हमारे संविधान के भाग 6 में इस पद के बारे में विस्तार से प्रावधान किया गया है.  विधानसभा अध्यक्ष को Speaker of Legislative Assembly भी कहते हैं. ये पद लोकसभा अध्यक्ष या स्पीकर के तर्ज पर है. संविधान के भाग 6 में राज्य के विधानमंडल के अधिकारी टॉपिक के तहत विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को लेकर प्रावधान किए गए हैं. अनुच्छेद 178 से 181 के बीच में इनके चुनाव, पद से हटने या पद से हटाने के   बारे में जिक्र है. 

विधानसभा का प्रमुख पीठासीन अधिकारी

विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा और विधानसभा सचिवालय का प्रमुख, पीठासीन अधिकारी होता है. विधान सभा अध्यक्ष के पास संविधान, प्रक्रिया, नियमों और स्थापित संसदीय परंपराओं के तहत व्यापक अधिकार होते हैं. विधान सभा के परिसर में उनका प्राधिकार सर्वोच्च है. इसका मतलब है कि विधानसभा परिसर में स्पीकर का फैसला अंतिम होता है. सभा की व्यवस्था बनाए रखना अध्यक्ष की जिम्मेदारी होती है और वे सभा में सदस्यों से नियमों का पालन सुनिश्चित कराते हैं. अध्यक्ष सभा के वाद-विवाद में भाग नहीं लेते. वे विधान सभा की कार्यवाही के दौरान अपनी व्यवस्थाएं या निर्णय देते हैं. सभा में अध्यक्ष और उनकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष सभा का संचालन करते हैं. और दोनों की अनुपस्थिति में सभापति तालिका का कोई एक सदस्य इस जिम्मेदारी को निभाते हैं.

अनुच्छेद 178 में अध्यक्ष का प्रावधान 

संविधान में राज्यों की विधान सभाओं के लिए एक अध्यक्ष की व्यवस्था की गई है. विधान सभा के अध्यक्ष, लोक सभा के अध्यक्ष जैसा ही पद है. संविधान के अनुच्छेद 178 में विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का प्रावधान किया गया है. विधानसभा का अध्यक्ष बनने के लिए विधानसभा का सदस्य यानी विधायक होना जरूरी है. 

क्या कहता है अनुच्छेद 178

"प्रत्येक राज्य की विधान सभा, यथाशक्य शीघ्र, अपने दो सदस्यों को अपना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी और जब-जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद रिक्त होता है तब-तब विधानसभा किसी अन्य सदस्य को, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष चुनेगी."
 
अनुच्छेद 179 में पद से हटाने के बारे में प्रावधान

संविधान में ही इस बात को स्पष्ट कर दिया गया है कि विधानसभा के अध्यक्ष को कैसे हटाया जा सकता है. इसके लिए अनुच्छेद 179 में प्रावधान किया गया है.
अनुच्छेद 179 - अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्‍त होना ( Vacation), पदत्‍याग (resignation) और पद से हटाया जाना (removal)
(a) यदि विधान सभा का सदस्य नहीं रहता है तो अपना पद रिक्त कर देगा
(b) उपाध्यक्ष को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख के जरिए पद त्याग
(c) विधानसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प से हटाया जा सकता है

14 दिन पहले देनी होती है सूचना

अनुच्छेद 179 के clause (c) में अध्यक्ष को हटाने के बारे में प्रावधान है.  विधानसभा अध्यक्ष को हटाने का संकल्प अनुच्छेद 179 के तहत ही लाया जाता है. हालांकि इसके लिए कोई भी संकल्प (resolution) तब तक विधानसभा में पेश नहीं किया जाएगा, जबतक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने की सूचना कम से कम 14 दिन पहले न दे दी गई हो. यानी स्पीकर को हटाने के लिए  किसी भी संकल्प की सूचना 14 दिन पहले देनी होगी. अगर ऐसे संकल्प पर विधानसभा में विचार किया जाता है तो ऐसे संकल्प को तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (a majority of all the then members of the Assembly) से पारित होना जरूरी है . 

ख़ास प्रक्रिया के तहत संकल्प पर विचार 

संविधान के अनुच्छेद 179 के अधीन विधानसभा अध्यक्ष को हटाने के संकल्प की सूचना लिखित रूप से विधानसभा सचिव को देनी होती है. सूचना देने के 14 दिन बाद ही इसे विधानसभा की कार्यवाही के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है. ऐसे किसी भी संकल्प को विचार के लिए तभी विधानसभा में मंजूर किया जाता है, जब इस तरह के प्रस्ताव पर सदन की कुल संख्या का दसवां हिस्सा इसके समर्थन में हो. इसे उदाहरण से समझें तो महाराष्ट्र विधानसभा में 288 सदस्य हैं. ऐसी स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष को हटाने से जुड़े संकल्प पर तभी विचार किया जाएगा जब उसके समर्थन में कम से कम 29 विधायक होंगे. इसलिए जो भी इस तरह का संकल्प विधानसभा सचिव को भेजता है, उसकी कोशिश होती है कि ऐसे संकल्प पर ज्यादा से ज्यादा विधायकों का हस्ताक्षर हो जाए. हालांकि ये विधानसभा में ही तय होता है कि संकल्प लाने के समर्थन में कितने विधायक हैं. 

जब सदन में होता है हटाने पर विचार

जब विधानसभा की किसी बैठक में अध्यक्ष (Speaker) को हटाने के किसी संकल्प पर विचार किया जा रहा हो, तब अध्यक्ष पीठासीन नहीं होगा. यानी सदन की कार्यवाही का संचालन वो शख्स नहीं करेगा. संविधान के अनुच्छेद 181 में ये स्पष्ट कर दिया गया है. हालांकि उस दौरान अध्यक्ष को बोलने और उसकी कार्यवाहियों (proceedings) में भाग लेने का अधिकार होगा. उसे आम सदस्य की तरह वोट करने का भी अधिकार होगा. हालांकि मत बराबर होने की स्थिति में वोट देने का अधिकार नहीं होगा. इस तरह के संकल्प पर जब सदन में कार्यवाही चल रही होती है, तो उस वक्त अध्यक्ष की बजाय विधानसभा के उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) के पीठासीन अधिकारी होते हैं और वे ही सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं.
 
विधानसभा अध्यक्ष को लेकर दिलचस्प तथ्य

विधानसभा अध्यक्ष के  बारे में एक दिलचस्प पहलू ये है कि अगर विधानसभा भंग हो जाती है, तब भी वो अपने पद पर बने रहते हैं. अध्यक्ष विधानसभा भंग होने के साथ-साथ अपने पद से नहीं हटते हैं. वे तब तक अपने पद पर बने रहते हैं, जब तक अगले विधान सभा का पहला अधिवेशन (first meeting) शुरू नहीं हो जाता. इस बारे में संविधान के अनुच्छेद 179 में ही प्रावधान है.  

जिम्मेदारियों से भरा है स्पीकर का पद 

अध्यक्ष या स्पीकर  विधानसभा की सभी बैठकें संचालित करने के लिए उत्तरदायी हैं और जब अध्यक्ष अनुपस्थित होते हैं तो उनकी अनुपस्थित में उपाध्यक्ष सदन की अध्यक्षता करते हैं. अध्यक्ष विधान सभा में बहस और चर्चाओं का संचालन करते हैं और एक निष्पक्ष निर्णय लेते हैं. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों विधानसभा के सदस्यों के बहुमत से चुने जाते हैं. हम कह सकते हैं कि विधानसभा के अध्यक्ष का लगभग वही कार्य है जो कार्य लोकसभा अध्यक्ष का होता है. सदन में अनुशासन बनाए रखना, सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित करना, सदस्यों को बोलने की अनुमति प्रदान करने की जिम्मेदारी विधान सभा अध्यक्ष की है. विधान सभा अध्यक्ष सामान्य स्थिति में मत नहीं दे सकते, लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष में समान मत आने पर निर्णायक मत देने का अधिकार है.विधान सभा से संबंधित नियम और उसकी व्यवस्था की शक्ति विधान सभा अध्यक्ष को होती है. 

विवादों में रहने की क्या है वजह?

संवैधानिक पद होते हुए भी अक्सर विधानसभा अध्यक्ष का पद विवादों में रहता है.  इसके पीछे की मुख्य वजह ये हैं कि इस पद पर व्यावहारिक के साथ ही आम तौर से सत्ताधारी दल का कोई सदस्य ही चुना जाता है. ऐसे में कई बार विपक्ष की शिकायत रहती है कि सदन में बोलने का मौका देने में चेयर से उनकी अनदेखी की जाती है. विवाद का एक बड़ा मुद्दा रहा है विधायकों की सदस्यता के मसले पर फैसला. संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल दल-बदल कानून के तहत जब किसी विधायक की सदस्यता का मसला उठता है तो विधानसभा अध्यक्ष का फैसला अंतिम होता है. 

अदालत में भी पहुंचा है कई बार मुद्दा

विधायकों की अयोग्यता पर स्पीकर के फैसले को विपक्षी दल सत्तारूढ़ पार्टियों के पक्ष में होने का आरोप लगाते रहते हैं.  कई बार ऐसे मामले अदालतों में भी पहुंचे हैं.  52वें संविधान संशोधन एक्ट के जरिए संविधान की दसवीं अनुसूची को जोड़ा गया. इसे ही दलबदल कानून (Anti-defection law) के नाम से जाना जाता है.  दसवीं अनुसूची में निहित शक्तियों के तहत ही विधान सभा अध्यक्ष किसी सदस्य की सदस्यता पर फैसला लेते हैं. इस कानून के तहत अध्यक्ष का फैसला आखिरी हुआ करता था. लेकिन बार-बार अदालतों में ऐसे मामले पहुंचने के बाद  1991 में सुप्रीम कोर्ट ने 10वीं अनुसूची के सातवें पैराग्राफ को अवैध करार कर दिया. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फैसले की कानूनी समीक्षा हो सकती है.

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