Explained: क्या भारत फिर से रूस के करीब आ रहा है? विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान के कूटनीतिक मायने समझें
इंजीनियरिंग, निर्माण, फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्रों में भारत के हजारों कुशल कामगारों के लिए रूस में रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं, जिससे दोनों देशों के रिश्ते और गहरे हो रहे हैं.

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के हालिया बयान ने वैश्विक कूटनीतिक हलकों में एक नई और व्यापक भू-राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है. अंतरराष्ट्रीय मंचों से लेकर संसदीय समितियों तक, अपने संबोधन में डॉ. जयशंकर ने मॉस्को के साथ भारत के गहरे, ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को रेखांकित किया. उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय चुनौतियों के समय रूस हमेशा एक आजमाया हुआ और विश्वसनीय साझेदार रहा है.
नई दिल्ली में रविवार (4 अक्टूबर, 2026) को आयोजित म्यूनिक सुरक्षा सम्मेलन (MSC) को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक बार फिर रूस की तारीफ की और भारत के साथ उसके संबंधों पर बयान दिया. उन्होंने कहा, ‘भारत और रूस के बीच ऐतिहासिक रूप से बहुत अच्छे संबंध रहे हैं और अपने अनुभवों से दोनों देश आज भी अपने रिश्तों को आकार देते हैं.''
विदेश मंत्री के इन बयानों के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या नई दिल्ली एक बार फिर से मॉस्को की ओर झुक रही है, या फिर यह भारत की सोची-समझी 'मल्टी-अलाइनमेंट' और रणनीतिक स्वायत्तता की व्यापक नीति का हिस्सा है. आइए, भारत-रूस संबंधों की वर्तमान स्थिति और एस. जयशंकर के बयानों के पीछे के रणनीतिक संदर्भों को विस्तार से समझते हैं.
बयानों के पीछे की रणनीति क्या
भारत का पक्ष रखते हुए विदेश मंत्री ने दोहराया कि भारत-रूस संबंधों की जड़ें अत्यधिक गहरी हैं. ये संबंध अब केवल पारंपरिक रक्षा खरीद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ऊर्जा, व्यापार, तकनीक और वैश्विक कूटनीति जैसे व्यापक क्षेत्रों में फैल चुके हैं.
डॉ. जयशंकर का यह बयान किसी भावुक या वैचारिक झुकाव का प्रतीक नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक यथार्थ को दर्शाता है. सुरक्षा और कूटनीतिक संकटों के दौरान रूस के ऐतिहासिक समर्थन का उल्लेख करते हुए जयशंकर ने मॉस्को को एक 'समय की कसौटी पर खरा उतरा' साझेदार बताया.
भारत अब केवल एक मूकदर्शक या निष्पक्ष समर्थक नहीं है. हाल के महीनों में भारत ने रूस और यूक्रेन, दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ सक्रिय संवाद बनाए रखा है ताकि बातचीत और कूटनीति के जरिए युद्ध को समाप्त किया जा सके.
नई दिल्ली का मानना है कि वैश्विक बहुध्रुवीयता और यूरेशियाई क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए रूस एक अनिवार्य ध्रुव है.
भारत-रूस संबंधों को गति देने वाले तीन मुख्य स्तंभ
भारत और रूस के बीच बढ़ते सहयोग को तीन प्रमुख व्यावहारिक स्तंभों के आधार पर समझा जा सकता है. पहला है ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित. रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से भारत की विदेश नीति का मुख्य केंद्र बिंदु अपने नागरिकों और घरेलू अर्थव्यवस्था को वैश्विक झटकों से बचाना रहा है. पश्चिमी देशों द्वारा मॉस्को पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद, भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात जारी रखा.
इससे भारतीय बाजार में ईंधन की कीमतें नियंत्रित रहीं और मुद्रास्फीति पर काबू पाने में मदद मिली. भारतीय खरीद ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में तेल की भारी कमी और कीमतों के अचानक उछाल को रोका. जयशंकर का स्पष्ट संदेश है कि भारत अपने ऊर्जा हितों के मामले में किसी भी बाह्य या पश्चिमी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा.
आर्थिक विविधीकरण और कुशल कार्यबल का प्रवाह
दोनों देशों के बीच का रिश्ता अब केवल 'क्रेता-विक्रेता' के रक्षा मॉडल से आगे निकलकर एक विविध आर्थिक साझेदारी में बदल रहा है. भारत-यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (EAEU) फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे पर तेजी से काम हो रहा है.
इंजीनियरिंग, निर्माण, फार्मास्यूटिकल्स और विनिर्माण क्षेत्रों में भारत के हजारों कुशल कामगारों के लिए रूस में रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं, जिससे दोनों देशों के सामाजिक-आर्थिक रिश्ते और गहरे हो रहे हैं.
यूरेशियाई संतुलन और 'चीन कारक'
भारत की रणनीतिक सोच का एक बड़ा आधार यूरेशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखना है. नई दिल्ली अच्छी तरह समझती है कि यदि पश्चिमी देश रूस को पूरी तरह से अलग-थलग कर देंगे, तो मॉस्को मजबूरीवश चीन (बीजिंग) के अत्यधिक करीब चला जाएगा. रूस का चीन पर पूरी तरह निर्भर होना भारत की उत्तरी सीमाओं और सामरिक सुरक्षा हितों के लिए अत्यंत खतरनाक साबित हो सकता है. इसलिए, मॉस्को के साथ मजबूत संबंध बनाए रखकर भारत यूरेशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करता है.
रणनीतिक स्वायत्तता बनाम निकटता
जयशंकर के बयानों को केवल "रूस की ओर वापसी" या "विदेश नीति में बदलाव" के रूप में देखना भारत की कूटनीति की मूल भावना को गलत समझना होगा. भारत किसी एक गुट में शामिल होने के बजाय 'मल्टी-अलाइनमेंट' पर काम कर रहा है. भारत दुनिया को 'मित्र बनाम शत्रु' के रूप में नहीं देखता. जहां एक ओर नई दिल्ली QUAD, इंडो-पैसिफिक पहलों और अत्याधुनिक तकनीकों के लेन-देन के जरिए अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रही है, वहीं दूसरी ओर वह BRICS और SCO जैसे मंचों के जरिए रूस के साथ भी घनिष्ठता बनाए हुए है.
किसी एक युद्ध-गुट का हिस्सा बनने से इनकार करने के कारण ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हैं जो मॉस्को, कीव, वाशिंगटन और यूरोपीय राजधानियों के बीच समान विश्वसनीयता के साथ संवाद स्थापित कर सकते हैं.
द्विपक्षीय साझेदारी में मौजूद प्रमुख चुनौतियां
सकारात्मक और ऐतिहासिक पहलुओं के बावजूद, भारत-रूस संबंधों के समक्ष कुछ गंभीर और व्यावहारिक बाधाएं भी हैं. रूसी तेल के भारी आयात के कारण भारत का द्विपक्षीय व्यापार घाटा बहुत बढ़ गया है. इसे संतुलित करने के लिए भारत को रूस में फार्मास्यूटिकल्स, कृषि और मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों का निर्यात तेजी से बढ़ाना होगा.
पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए 'सेकेंडरी प्रतिबंधों' के कारण सीमा-पार बैंकिंग लेन-देन और भारतीय रक्षा बलों के लिए रूसी स्पेयर-पार्ट्स की समय पर आपूर्ति में लगातार जटिलता आ रही है.
रूसी सेना में सहायक भूमिकाओं में धोखे से भर्ती किए गए भारतीय नागरिकों का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील रहा है. उन्हें सुरक्षित छुड़ाने और स्वदेश वापस लाने के लिए भारत सरकार को उच्चतम स्तर पर संवेदनशील हस्तक्षेप करना पड़ा है.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि भारत की विदेश नीति किसी वैश्विक दबाव या वैचारिक पूर्वाग्रह से संचालित नहीं होती. भारत का रूस के करीब होना किसी दूसरे देश के खिलाफ नहीं, बल्कि भारत के अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और यूरेशियाई क्षेत्र में स्थिरता की आवश्यकता से प्रेरित है.
भारत 'रूस या पश्चिम' के पुराने शीतयुद्ध कालीन विकल्प को खारिज करते हुए, 'रूस और पश्चिम दोनों' के साथ अपने-अपने प्राथमिकताओं के आधार पर संबंध मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.





















