नागरिकता कानून संशोधन विधेयक: पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल के किले में सेंध लगाने पर बीजेपी की नजर
बीजेपी की नजर नागरिकता कानून के बहाने बंगाल के सियासी गढ़ में सेंध लगाने की है क्योंकि यह विधेयक बांग्लादेशी हिंदुओं को सीधे सीधे संरक्षण का संदेश देता है. इससे बंगाल में ध्रुवीकरण की राजनीति में बीजेपी को बढ़त लेने की नई चाबी हासिल होती है.

नई दिल्ली: आम चुनावों की परीक्षा से पहले केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार इन दिनों अपने चुनावी गणित का जोड़-घटाव दुरुस्त करने में लगी है. आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के आरक्षण से लेकर नागरिकता संशोधन विधेयक इसी चुनावी गणित अभ्यास की कड़ी है. पड़ोसी मुल्कों के सताए अल्पसंख्यकों के लिए नागरिकता का दरवाजा खोलने के बहाने सरकार ने पूर्वोत्तर की 24 लोकसभा सीटों के लिए सियासी समीकरण भी बैठाने का प्रयास के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के किले में सेंध पर नज़र है.
लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक पर चर्चा की शुरुआत दार्जिलिंग से बीजेपी के सांसद एसएस अहलूवालिया ने की और भाषण बंगाली में दिया. यह अपने आप में बहुत कुछ कहता है, क्योंकि 2019 के चुनावी गणित में बीजेपी के लिए 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल का किला खास अहम है जहां फिलहाल तृणमूल कांग्रेस का झंडा लहरा रहा है. इसके अलावा 14 लोकसभा सीटों वाले असम की सियासत में भी बीजेपी ने यह संदेश दे दिया है कि बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए दरवाजे खुले हैं और मुस्लिम शर्णार्थियों के लिए नहीं. इतना ही नहीं इस विधेयक ने असम में चल रही एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की कवायद पर भी सवाल खड़ा कर दिया है जो अवैध बांग्लादेशियों की पहचान करने के लिए शुरू की गई थी.
असम समेत पूर्वोत्तर की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और कांग्रेस इस विधेयक का विरोध अपने राजनीतिक समीकरणों के आधार पर कर रहे हैं. चुनावी गणित का ही असर है कि बीजेपी के पुराने सहयोगी असम गण परिषद ने एनडीए गठबंधन छोड़ने का एलान नागरिकता संशोधन कानून लोकसभा में रखे जाने के साथ ही कर दिया था. असमिया पहचान की राजनीति पर AGP का जन्म ही इस मुद्दे की राजनीति से हुआ था. मगर इस मुद्दे पर जहां विरोध भी बंटा हुआ है. असम गण परिषद जहां बांग्लादेश को इस दायरे से बाहर रखने पर ज़ोर दे रहा है. वहीं, कांग्रेस शर्णार्थियों की सुविधा के लिए बन रहे इस विधेयक को धर्म के दायरे में न बांधने की मांग कर रही है. कांग्रेस सांसद भवनेश्वर कलीता इस विधेयक पर एतराज़ दर्ज कराते हुए कहते हैं कि इस मुद्दे के विरोध पट असम ही नहीं पूरा पूर्वोत्तर जल रहा है. क्योंकि बांग्लादेश से आए अवैध शर्णार्थियों को नागरिकता देने के लिए दिसम्बर 2014 तक तारीख बढ़ा दी जाती है तो एनआरसी का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है. यह पूरे पूर्वोत्तर का मामला है जहां बांग्लादेश से आए शरणार्थी स्थानीय और बाहरी की राजनीति में अहम धुरी हैं.
पूर्वोत्तर के हालात पर राज्यसभा में दिए सन्देश में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस बात पर ज़ोर दिया कि नागरिकता संशोधन विधेयक पूरे देश के लिए है. यह पूरे देश में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से आए धर्म के आधार पर प्रताड़ित अल्पसंख्यक शर्णार्थियों को सुविधा देने का प्रावधान करता है. इसे पूर्वोत्तर से जोड़कर देखना मुनासिब नहीं है.
गृहमंत्री ने बताया कि असम अकॉर्ड की भावना को बनाए रखने और उसके प्रावधानों के संरक्षण के लिए ही सरकार ने नई उच्च स्तरीय समिति बनाई है. हालांकि गृहमंत्री के जवाब से फौरी तौर पर राज्यसभा में हंगामा ज़रूर थम गया मगर विरोध कर रहे सियासी दल इस विधेयक को लाने के तरीके और इसकी मंशा पर सवाल उठाते रहे.
बहरहाल नागरिकता संशोधन विधेयक पर संयुक्त संसदीय समिति में भी इस सवाल पर विचार हुआ था कि अगर बांग्लादेश को इसके दायरे से बाहर कर दिया जाए तो? सदन में पेश समिति की रिपोर्ट के मुताबिक गृह मंत्रालय ने जवाब में कहा कि पासपोर्ट नियम और विदेशी अधिनियम के तहत सितंबर 2015 में जारी अधिसूचना में यह पहले ही सुनिश्चित किया जा चुका है कि बांग्लादेश से आए चिह्नित अल्पसंख्यक (हिन्दू, सिख, जैन, पारसी आदि) भारत में रह सकते हैं और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी और वो भारत में रह सकते हैं और उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होगी.
ज़ाहिर तौर पर बीजेपी की नजर नागरिकता कानून के बहाने बंगाल के सियासी गढ़ में सेंध लगाने की है क्योंकि यह विधेयक बांग्लादेशी हिंदुओं को सीधे सीधे संरक्षण का संदेश देता है. इससे बंगाल में ध्रुवीकरण की राजनीति में बीजेपी को बढ़त लेने की नई चाबी हासिल होती है. वहीं असम समेत कई पूर्वोत्तर के राज्यों की राजनीति में में असर डालने वाली हिन्दू आबादी को भी संदेश दिया है.
संसद में पेश नागरिकता कानून संशोधन विधेयक पर बनी संयुक्त समिति में अपनी नाराज़गी दर्ज कराने वाले तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस जैसे दल रिपोर्ट के साथ साथ सदन में भी अपनी मत जतया चुके हैं. राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस नेता सुखेंदु शेखर रॉय कहते हैं कि राज्यसभा में भी लोकसभा की तरह टीएमसी इस विधेयक पर अपना मत देगी. वहीं एतराज़ दर्ज कराने वाली कांग्रेस पार्टी जहां पड़ोसी मुल्कों के सताए लोगों को शरण दिए जाने का तो समर्थन करती है मगर धर्म के आधार पर विभेद पर एतराज़ जताती है. साथ ही एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के आधार पर नागरिकता देने के लिए दिसम्बर 2014 तक समय सीमा बढ़े जाने का विरोध करती है. बीजेपी के लिए बंगाल खासा अहम है जहां वो सेंध लगाकर अपनी सीटों का गणित जमाए रखना चाहती है. इसके अलावा उत्तरपूर्व के सबसे बड़े सूबे और 14 लोकसभा सीटों वाले असम में भी उसकी कोशिश बांग्लादेश से आए तीस लाख हिंदुओं के लिए नागरिकता का दरवाजा खोलने के सहारे मतों के समीकरण सुधारने की होगी. स्वाभाविक है कि चुनावी परीक्षा पास है और ऐसे में सत्ता बचने के लिए बीजेपी की कुछ सफलता कुंजियों की सख्त जरूरत है.














