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वोट के नाम पर जुमले चलते हैं विकास के नाम पर घुटने छिलते हैं

नई दिल्ली: सड़क पर एक शख्स दंडवत होते हुए आगे बढ़ रहा है. मीडियो के दर्जनों कैमरों की नजर है. और एक बार लेटकर ये शख्स आगे बढ़ता है. उसके बाद हाथ बढ़ाकर निशाना लगाता है. फिर उसी निशान से अगली बार दोबारा सड़क पर लेटकर आगे बढ़ने लगता है. वोट के नाम पर जुमले चलते हैं विकास के नाम पर घुटने छिलते हैं वोट के नाम पर जुमले चलते हैं विकास के नाम पर घुटने छिलते हैं वोट के नाम पर जुमले चलते हैं विकास के नाम पर घुटने छिलते हैं वोट के नाम पर जुमले चलते हैं विकास के नाम पर घुटने छिलते हैंसिर्फ गमछा बांधे और आधी बनियान पहने हुए इस शख्स के पेट पर एक फाइल बंधी है. लेकिन क्यों बंधी हुई है ? ये शख्स पसीना पसीना हो चुका है. घुटने देखिए छिल चुके हैं. खून रिस रहा है. लेकिन इस शख्स की कोशिश कमजोर नहीं होती. वो फिर आगे बढ़ता है. कौन है ये शख्स....क्यों मीडिया के कैमरे और रिपोर्टर सड़क पर यूं लेटकर आगे बढ़ते शख्स की कहानी रिपोर्ट कर रहे हैं ? ये कोई पूजा का विधि विधान नहीं हैं. ये कोई मनौती पूरी करने के बाद भगवान को शुक्रिया करने का तरीका नहीं है. ये तो जनता के लिए एक मन्नत पूरी करने के लिए खुद को भगवान मान लेने वाली सरकारों के खिलाफ एक विधायक की पहल है. आज आज सिस्टम के सत्यमेव जयते के आगे दंडवत हो चुका है. इनका नाम है- विनय बिहारी तिवारी बिहार में लौरिया सीट से बीजेपी विधायक हैं. एक विधायक को क्यों बिहार विधानसभा तक सिर्फ गमछा बांधकर बनियान पहनकर अपने घुटने छिलवाकर आना पड़ा. बहुत ध्यान से आप भी जानिए. बीजेपी विधायक विनय बिहारी ने कहा कि हमारे यहां कि एक सड़क है जो यूपी और बिहार को जोड़ती है, चार विधानसभा, दो लोकसभा क्षेत्र से गुजरती है, इस सड़क को स्टेट हाइवे बनाने की घोषणा की गई थी. जिस सड़क के लिए विनय बिहारी तिवारी अपना खून बहा रहे हैं. वो सड़क एक निर्दलीय और बीजेपी के तीन विधायक, और बीजेपी के ही दो सांसदों के इलाके से भी गुजरती है. लेकिन क्या कभी आपने और किसी नेता को जनता के लिए इतनी कोशिश करते देखा. जनता के हित में जिस सड़क के लिए आज बीजेपी विधायक विनय बिहारी तिवारी सिर्फ तन ढंकने लायक कपड़ों में घुटना छिलवाते हुए विधानसभा तक पहुंचे, उस सड़क पर स्टेट हाइवे बनाने का ऐलान खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पांच साल पहले किया था. बेतिया के मनुआ पुल से वाया नवलपुर रतवलपर जाने वाली वो सड़क है, जिसे ठीक कराने के लिए विधायक विनय बिहारी की ये हालत हो गई है. 2011 में विश्वास यात्रा निकाल रहे नीतीश कुमार की गाड़ी इसी सड़क के गड्ढे में फंसी थी. तभी नीतीश ने सड़क बनवाने का ऐलान किया था. दरअसल विनय तिवारी जिस 40 किमी लंबी सड़क की लड़ाई लड़ रहे हैं. उसमें 7 किलोमीटर का एक महासेतु हैं. बाकी बचे 33 किलोमीटर में 22 किलोमीटर का काम ग्रामीण कार्य विभाग का है. बाकी 11 किलोमीटर का काम जल संसाधन विभाग का है. स्टेट हाइवे बनाने के लिए दोनों विभाग से एनओसी जरूरी होता. विनय बिहारी तिवारी ने किसी तरह एनओसी दिलाया तो सड़क निर्माण विभाग ने एनओसी को स्वीकार नहीं किया. इसी कारण सेंट्रल रोड फंड से पैसा रिलीज नहीं हो रहा. विनय बिहारी ने जनता के लिए अपनी इस लड़ाई में सिर्फ राज्य सरकार से बैर मोल नहीं लिया. बल्कि उन्होंने अपनी ही पार्टी के केंद्रीय सड़क मंत्री नितिन गडकरी तक से दुख साझा किया था. वो तारीख थी 26 अक्टूबर. 26 अक्टूबर को ही पिछले साल विधायक विनय बिहारी तिवारी ने अपना पायजामा नीतीश कुमार को भेज दिया था. ये लिखते हुए कि ये पायजामा मेरा नहीं बल्कि सरकार के सुशासन का है. विनय बिहारी ने अपना कुर्ता केंद्रीय सड़क मंत्री नितिन गडकरी को इस चिट्ठी के साथ भेज दिया था कि ये कुर्ता मेरा नहीं पार्टी के मान-सम्मान प्रतिष्ठा का है. विनय बिहारी अब कहते हैं सड़क नहीं बनी तो मरते दम तक ऐसा ही रहूंगा. एक विधायक 5 महीने से बिना कपड़ों के लिए इसलिए रह रहे हैं, ताकि जनता को सड़क की सुविधा दिला सकें. क्यों नहीं सरकार की नींद टूटती. बीजेपी नेता सुशील मोदी इसके पीछे सियासी वजह बताते हैं. क्या विरोधी पार्टी का विधायक होगा तो उसके इलाके में सरकार सड़क नहीं बनवाएगी. अब ये जानना जरूरी था. इसके लिए हम सीधे बिहार के सड़क मंत्री तेजस्वी यादव के पास पहुंचे. उन्होंने दावा किया कि समाधान हो गया है. बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने कहा कि समाधान हो गया है, उसके बाद भी इसकी क्या जरूरत है? बिहार में सड़क मंत्री तेजस्वी यादव भले दावा करें कि अब वो सड़क बनेगी, जिसके लिए विधायक विनय बिहारी सड़क पर लेट गए हैं. लेकिन सवाल तो ये है कि ऐसी हालत पैदा क्यों होने दी गई ? क्या हर विधायक को अपने घुटने छिलवाने होंगे, तभी जनता के लिए विकास हो पाएगा ? और देश में क्या और भी विनय बिहारी जैसे जनप्रतिनिधि बन पाएंगे. विकास के लिए विधायक विनय बिहारी के घुटने छिल गए. उन्होंने अब भी पूरे कपड़े नहीं पहने हैं. क्योंकि राज्य सरकार की तरफ से सिर्फ आश्वासन मिला है. और विधायक विनय बिहारी चाहते हैं कि जब तक उनके इलाके में सड़क बनाने का काम शुरू नहीं हो जाता. वो विकास के लिए अपनी इस लड़ाई को जारी रखेंगे. देश में विनय बिहारी जैसे कितने जनप्रतिनिधि होंगे जो सड़क की लड़ाई लड़ने के लिए घुटनातोड़ सत्याग्रह करेंगे ? 80 फीसदी नेता तो विधायक सांसद बनते ही महंगी गाड़ियों, ब्रैंडेड कपड़े और एसी कमरे में ही पाए जाते हैं. जो जनता के लिए मिली निधि भी खर्च करना भूल जाते हैं. जनता के हित में खुद को सड़क पर लाने वाले विनय बिहारी यूपी के चुनावी माहौल में एक मिसाल हैं. क्योंकि उत्तर प्रदेश में तो वोट के लिए जुमले चल रहे हैं. विकास के लिए घुटने नहीं छिल रहे. देश के एक विधायक विनय बिहारी तिवारी जिस वक्त अपने घुटने छिलवाकर जनता के लिए सड़क की लड़ाई इस अंदाज में लड़ रहे थे. तब उत्तर प्रदेश की जनता से पांच साल उनका भाग्यविधाता बनने के लिए हर पार्टी का नेता जुमलेबाजी का जाल बिछा रहा था. जिसमें आज गधा युद्ध का अगला राउंड हुआ. अखिलेश यादव ने जब गुजरात के घुड़खरों को गधा बताते हुए मोदी पर निशाना साधा था तो 4.30 मिनट इसी पर खर्च कर डाले थे. अब मोदी ने गधे के जवाब में गधा चैप्टर खोला तो 7 मिनट 20 सेकंड खर्च कर डाले. जनता से जुड़े मुद्दों जैसे गन्ना किसान, कर्ज माफी, अपराध, सस्ती दवा पर जहां मोदी सिर्फ 6 मिनट 14 सेकंड बोलें. वहीं गधे का जवाब देने के लिए 7 मिनट 20 सेकंड का भाषण खर्च कर डाला. यूपी के चुनाव में पहले चरण में विकास की बातें हो रही थीं. दूसरे चरण में स्कैम का मतलब समाजवादी, कांग्रेस, अखिलेश, माया बताया जाने लगा. तीसरे चऱण में श्मशान-कब्रिस्तान, चौथे चरण में गधा और कसाब की एंट्री होने लगी. और इन सबके बीच में विकास का चिड़िया उड़ नेताओं ने आपस में मिलकर खेल लिया. तो क्या नेता समझते हैं जनता विकास नहीं जुमलों पर वोट देगी ? यानी जुमलों के बदले जुमले पर भी नेता हवा हवाई बातें कर रहे हैं. जनता को कसाब, गधा, श्मशान-कब्रिस्तान नहीं चाहिए. वो तो पूछती है कि बताओ हमें सुरक्षा, विकास, रोजगार कैसे देंगे नेताजी ? क्यों हर नेता में विनय बिहारी जैसी शिद्दत नहीं दिखती. जनता के चुने हुए नुमाइंदे जनता के लिए ही उदासीन हो जाते हैं, ऐसा सिर्फ राज्यों में नहीं है. बल्कि देश की संसद में ही हैं. एक आंकड़ा देखकर इस बात को समझिए. जुलाई 2016 तक के रिकॉर्ड के मुताबिक लोकसभा-राज्यसभा से सांसद निधि 40534 करोड़ रुपए रिलीज हुई. लेकिन देश के सांसद वो सांसद निधि भी पूरी नहीं खर्च पाए. जुलाई 2016 तक सांसदों की 4937 करोड़ की सांसद निधि बची ही रह गई. देश में अपनी सांसद निधि खर्च करने में यूपी के सांसद ही सबसे पीछे हैं. दूसरे नंबर पर सांसद निधि खर्च करने में पीछे रहने का बिहार का है. महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर हैं. जहां सांसद अपने सांसद निधि पूरी खर्च करने में फेल हैं. चौथे नंबर पर पश्चिम बंगाल है. यानी जितना बड़ा जो राज्य, जिस राज्य में सबसे ज्यादा विकास की जरूरत, उसी राज्य में जनता के लिए मिली सांसद निधि खर्च करने में भी सांसदों को छींक आने लगती है. जबकि सांसदों को जनता के हित में काम करने के लिए पांच करोड़ रुपए दिए जाते हैं. आपने देखा होगा कि संसद से राज्यों की विधानसभाओं तक अपनी तनख्वाह बढ़ाने के लिए नेता एक हो जाते हैं. पक्ष विपक्ष भूल जाते हैं. और भूल जाते हैं विकास के वादे भी. वर्ना 70 साल बाद भी आज नेता हमें सिर्फ त्योहार पर बिजली देने का वादा करके अहसान नहीं जता रहे होते. वोट लेकर विकास भूल जाने वाले हर नेता को बिहार की एक छोटी विधानसभा लौरिया के विधायक विनय बिहारी तिवारी आइऩा दिखा रहे हैं. बता रहे हैं कि जनता के लिए घुटने भी छिलवाने पड़ते हैं. तब जनता सम्मान से देखती है.

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