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बाबा आमटे पुण्यतिथि: कुष्ठ रोगियों का सशक्तिकरण कर कायम की मिसाल, महात्मा गांधी कहते थे 'अभय साधक'

बाबा आमटे का कुष्ठ रोगियों के सशक्तिकरण में योगदान काफी उल्लेखनीय है. वे सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ महान स्वतंत्रता सेनानी भी थे. उन्होंने पर्यावरण संरक्षण आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई.

नई दिल्ली:  कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों को अपनी बीमारी के साथ-साथ लोगों के भेदभाव से भी लड़ना पड़ता है. कुष्ठ रोग को लेकर लोगों के मन में कई तरह की भ्रांतियां हैं. कई लोगों का मानना है कि यह बीमारी छुआछूत या वंशानुगत बीमारी है. जबकि ऐसा नहीं है, इस वक्त दुनियाभर में जितने कुष्ठ रोगी हैं उनमें से लगभग 60 फीसदी लोग भारत में ही है. एक आंकड़े के मुताबिक बिहार में ही सवा लाख से ज्यादा मरीजों का इलाज चल रहा है.

आज जब देशभर में कुष्ठरोगियों के प्रति नजरिए को बदलने की जरूररत है तो ऐसे में जिस व्यक्ति की याद आती है उनका नाम डॉ मुरलीधर देवीदास उर्फ बाबा आमटे है. बाबा आमटे का कुष्ठ रोगियों के सशक्तिकरण में योगदान काफी उल्लेखनीय है. वे सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ महान स्वतंत्रता सेनानी भी थे. उन्होंने पर्यावरण संरक्षण आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई. आइए आज उनके पुण्यतिथि के दिन जानते हैं कि आखिर उन्होंने कुष्ठ रोगियों के लिए क्या किया जिसकी वजह से उन्हें हर कोई सलाम करता है.

कुष्ठ रोगियों के सशक्तीकरण में योगदान

एकबार बाबा आमटे घर जा रहे थे, उस वक्त तेज बारिश हो रही थी. उन्होंने किसी के कराहने की आवाज सुनी. उनकी नजर जब उस व्यक्ति पर पड़ी तो उसकी दशा देखकर वह अंदर तक हिल गए. उनके मन में ख्याल आया कि अगर वह खुद इस व्यक्ति की जगह होते तो क्या होता. वह उस व्यक्ति को वह अपने घर ले गए. उन्होंने इसके बाद कुष्ठ रोग कैसे होता है और इसका उपचार कैसे होता है इसके बारे में पढ़ना शुरू किया. बाद में उन्होंने महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में आनंदवन नामक एक आश्रम की स्थापना की. इसमें कुष्ठ रोगियों का उपचार होता है. कुष्ठ रोगियों के लिए किए गए उनके काम की वजह से ही राष्ट्रपिता उन्हें 'अभय साधक' कहते थे. उन्होंने कुष्ठ रोगियों के उपचार के लिए अपनी जान तक की बाजी लगाने में संकोच नही किया. उन्होंने वरोरा में कुष्ठ रोगियों की चिकित्सा के लिए उन्होंने 11 केंद्र स्थापित किए. उन्होंने अपने शरीर का उपयोग कुष्ठ के प्रयोग के लिए करने की भी अनुमति भी दी.

महात्मा गांधी से थे प्रभावित, स्वतंत्रता आंदोलन के लिए छोड़ी वकालत

आमटे ने अपना पूरा जीवन समाज के दबे-कुचले तबकों को समर्पित कर दिया. वह महात्मा गांधी की बातों और उनके दर्शन से काफी प्रभावित हुए और वकालत के अपने सफल करियर को छोड़कर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए.

उनका जन्म महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगनघाट शहर में 26 दिसंबर 1914 को हुआ. उनके पिता का नाम देविदास आमटे और उनकी माता का नाम लक्ष्मीबाई आमटे था. उनका परिवार एक संपन्न परिवार था. उनके पिता ब्रिटिश गवर्नमेंट ऑफिसर थे, उनके ऊपर डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन और रेवेन्यु कलेक्शन की जिम्मेदारी थी.

बचपन से ही 'बाबा' पुकारा जाता था

बाबा आमटे के नाम में जो बाबा है वह उन्हें बचपन में ही मिला था. बचपन में ही मुरलीधर को अपना उपनाम बाबा दिया गया था. बताया जाता है कि बचपन में उनके माता-पिता उन्हें इस नाम से संबोधित करते थे.

भारत जोड़ो आंदोलन चलाया

1985 में बाबा आमटे ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत जोड़ो आंदोलन भी चलाया था. इस आंदोलन को चलाने के पीछे उनका मकसद देश में एकता की भावना को बढ़ावा देना और पर्यावरण के प्रति लोगों का जागरुक करना था.

कई महत्वपूर्ण सम्मान से किया गया सम्मानित

बाबा आमटे को कई महत्वपूर्ण सम्मान से भी सम्मानित किया गया. उन्हें 1971 में पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित किया गया. इसके अलावा कुष्ठ रोगियों के लिए काम करने के लिए उन्हें अमेरिका का डेमियन डट्टन पुरस्कार 1983 में दिया गया. इसके अलावा एशिया का नोबल पुरस्कार कहे जाने वाले रेमन मैगसेसे (फिलीपीन) से 1985 में और 1988 में घनश्यामदास बिड़ला अंतरराष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया. 94 साल की आयु में 9 फरवरी 2008 को आमटे ने अंतिम सांस ली. वे भारत के प्रमुख व सम्मानित समाजसेवी थे.

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