मुगल बादशाह औरंगजेब जीवन के आखिरी दिनों में किन बातों से दुखी था? जानकर चौंक जाएंगे
मुगल बादशाह औरंगजेब ने 50 साल तक शासन किया, दक्षिण में विजय प्राप्त की, लेकिन अंतिम दिनों में अकेलेपन और निराशा का सामना किया. 1707 में उसका निधन हुआ.

मुगल बादशाह औरंगजेब अपने वंश के सबसे ताकतवर और लंबे समय तक शासन करने वाले शासकों में से एक था. उसके शासनकाल में मुगल साम्राज्य अपने चरम पर पहुंचा और उसकी सेना दुनिया की सबसे मजबूत सेनाओं में गिनी जाने लगी.
उत्तर भारत पहले ही मुगलों के शासन में था, लेकिन औरंगजेब की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा दक्षिण भारत और मराठों पर विजय हासिल करना थी. उसने अपने जीवन के अंतिम दो दशक दक्षिण में बिताए और कई राज्यों पर विजय प्राप्त की. इसके फलस्वरूप मुगल साम्राज्य का क्षेत्र लगभग साढ़े बारह लाख वर्ग मील तक फैल गया.
औरंगजेब ने अपने साम्राज्य को धीरे-धीरे बिखरते देखा
हालांकि, जीवन के अंतिम दिनों में औरंगजेब ने अपने साम्राज्य को धीरे-धीरे बिखरते हुए देखा. इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार के अनुसार, वृद्धावस्था में औरंगजेब अकेलेपन और निराशा का शिकार हो गया था. उसके अधिकांश साथी और विश्वासी साथी उसके साथ नहीं थे, और दरबार भ्रष्ट अधिकारियों और चापलूसों से भर गया था.
अपने बेटों से नाराज था औरंगजेब
औरंगजेब अपने पुत्रों से भी बेहद नाराज था, क्योंकि उसे किसी में भी शासन संभालने की क्षमता नहीं दिखी. उसने अपने बेटे मुअज्जम को लिखा था कि “एक नालायक बेटे से बेहतर है एक बेटी होना.” उसने समय में तीन बेटे जीवित थे, जबकि दो बेटे और कई परिवारजन पहले ही चल बसे थे.
1702 में उसकी बेटी जेबुन्निसा, 1704 में पुत्र अकबर, और 1705 में बहू जैनजेब का निधन हो गया. उसके भाई-बहनों में गौहर आरा अकेली जिंदा बची थीं, लेकिन उनका भी देहांत हो गया. अपनों के खो जाने का दुख औरंगजेब के लिए गहरा था.
लगभग 50 वर्षों के शासन के बाद, औरंगजेब का देहांत 3 मार्च 1707 को दक्षिण भारत के अहमदनगर में हुआ. उसे दौलताबाद में दफन किया गया, और उसकी कब्र औरंगाबाद जिले के खुल्दाबाद में स्थित है.
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Source: IOCL





















