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Women's Day: एसिड अटैक फ़ाइटरों के हौसले की कहानियां

एसिड अटैक कैसे एक महिला की जिंदगी को तबाह कर देता है इसकी आपबीती सुनकर हर किसी की आंखें नम होने लगती है. ये ऐसा दर्द है जिससे पार पाना आसान नहीं होता है.

नई दिल्ली: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर दिल्ली के कॉन्स्टिटूशनल क्लब में पांच एसिड अटैक फ़ाइटर्स महिलाओं को सम्मानित किया गया. दरअसल ये वो महिलाएं हैं जिन्होंने एसिड अटैक के बाद अपने जीवन की एक बेहद कठिन लड़ाई लड़ी और फिर भी रुकी नहीं और अब देश में एसिड अटैक के ख़िलाफ़ एक मुहिम चला रही हैं. एबीपी न्यूज़ ने भी इन महिलाओं की कहानी देश के सामने लाने के लिए इन फ़ाइटरों से ख़ास बात-चीत की.
हुस्ना राय की आँखों से आँसू बहते रहे  
यूपी के मुज़फ़्फ़रनगर की एसिड अटैक फ़ाईटर से जब हम बात कर रहे थे उनकी आँखों से धारोंधार आँसू बह रहे थे. उन्होंने बताया, ''जैसा हमारे साथ हुआ, किसी के साथ न हो. सोलह साल से आज तक चेहरा छुपा के जी रहे हैं. किसी शादी विवाह में नहीं जा सकते. लोग तंज करते हैं.''
गीता के काले चश्मे के भीतर से गाल पर बहते रहे आँसू  
मेरठ की रहने वाली गीता राजपूत के काले चश्मे के भीतर से लगातार आँसू बह रहे थे. लेकिन वो हिम्मत के साथ अपनी कहानी बयाँ कर रही हैं. बीस साल पहले सन दो हज़ार में शादीशुदा गीता की किराना की दुकान पर आने वाले एक शख़्स ने गीता से प्रेम करने के लिए दबाव बनाना शुरू किया. गीता के बार बार मना करने पर उस दरिंदे ने गीता के चेहरे पर एसिड फेंक दिया. और तब से गीता की ज़िंदगी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा.
गीता राजपूत ने कहा, “मेरे पिता और भाई नहीं थे इसलिए मेरी शादी तेरह साल में ही कर दी गई थी. जब मुझ पर अटैक हुआ तब मैं शादी के बाद भी दसवीं की पढ़ाई कर रही थी और दुकान भी चला रही थी. अटैक के बाद मेरी पढ़ाई भी छूट गई. मेरी एफआईआर भी नहीं ली गई. अपराधी को कोई सजा नहीं हुई. ''
गीता ने महिला दिवस पर ये संदेश भी दिया- “हम चाहते हैं कि एसिड अटैक से पीड़ित महिलाएँ घर से बाहर निकलें और अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ें. हमारे जैसी महिलाओं की  मुसीबतें कम हों, रोज़गार मिले, सरकार कुछ करे. ऐसी महिलाओं को घर से बाहर के समाज में लाना और व्यस्त करना सबसे ज़रूरी है.''
क्या होता है एसिड अटैक का मतलब ये मधु से मिलकर अधिक समझ में आया   
आगरा की मधु गर्ग के चेहरे पर 1997 में एक दरिंदे ने तेज़ाब फेंक दिया था. पिता का देहांत हो चुका था. माँ गाँव की बेहद सीधी महिला थीं. प्रेम के लिए दबाव बनाने वाले को जब मधु से इंकार मिला तो उसने मधु पर अपनी तेज़ाबी नफ़रत उड़ेल दी. यही नहीं उसने बाद में मधु और उसकी माँ को धमकी दी कि अगर उन्होंने एफआईआर के लिए थाने जाना बंद नहीं किया तो वह मधु के छोटे भाई की हत्या कर देगा. किसी का भी सहारा न होने के कारण मधु की माँ ने एफआईआर नहीं करवाई.
मधु ने आपबीती बताते हुए कहा ''मेरी मँगनी टूट गई. लम्बे समय तक मेरी शादी भी नहीं हुई. शादी के बाद ससुराल में बहुत अपमान सहना पड़ा. जॉब के लिए कहा गया कि आप काली होतीं तो भी जॉब मिल जाती लेकिन ऐसी जली हुई शक़्ल पे जॉब नहीं दे सकते. मेरे मन में ख़ुदकुशी का ख़याल आने लगा. लेकिन मेरे बच्चे हो गए थे. फिर मैंने संघर्ष करने की ठान ली. पति कभी सपोर्ट में नहीं खड़े हुए.''
रुक्कैया की कहानी   
आगरा की रुक्कैया की बहन के देवर ने रुक्कैया पर बुरी नज़र थी. रुक्कैया जब उसकी शिकायत बहन से की तो उस दरिंदे ने रुक्कैया पर तेज़ाब फेंक दिया. एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए रुक्कैया बोलीं ''मेरे ऊपर 2002 में अटैक हुआ था. उसको सजा इसलिए नहीं हुई क्योंकि वो मेरी बहन का देवर था. और बहन के ससुराल वाले बहन को भी परेशान करने लगे.''
किसान ट्रस्ट ने दी एक-एक लाख रूपए की सम्मान राशि  
राष्ट्रीय लोक दल के किसान ट्रस्ट ने इन महिलाओं को एक-एक लाख रूपए की सम्मान राशि भी दी. ट्रस्ट के अध्यक्ष जयंत चौधरी ने हमसे ख़ास बात-चीत में कहा ''इन पाँच महिलाओं की तो एफआईआर भी बहुत प्रयास के बाद ली गई, प्रमाण पत्र के लिए भी बहुत दफ़्तर-दफ़्तर दौड़ना पड़ा और सजा तो मिलती नहीं अपराधियों को. समाज में संदेश देने के लिए हमनें अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक दौड़ का आयोजन किया था लेकिन करोना वायरस के कारण इसे स्थगित करना पड़ा. दरअसल हम समाज को ये सोचने के लिए मजबूर करना चाहते हैं कि अब क़ानून हो जाने के बावजूद एसिड अटैक देश में क्यों नहीं रुक रहे.''
क्या कहता है क़ानून  
क़ानून के मुताबिक़ बिना पहचानपत्र दिखाए कोई एसिड नहीं ख़रीद सकता. एसिड की आम बिक्री प्रतिबंधित है. क़ानून के मुताबिक़ हर एसडीएम को हर पंद्रह दिन में एसिड बिक्री की दुकानों के स्टाक की रिपोर्ट लेनी चाहिए. अगर सरकारी तंत्र में अपनी ज़िम्मेदारी निभाई होती तो इन महिलाओं पर एसिड अटैक न हो पाता.
एसिड अटैक से पूरी तरह नर्क में बदल जाती है ज़िंदगी
एसिड अटैक के बाद इन महिलाओं की ज़िंदगी पहले जैसी नहीं रह जाती. सब कुछ ख़त्म सा हो जाता है. इन्हें बहुत हिम्मत, सहारे और समर्थन की ज़रूरत होती है. उत्तराखंड सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई और एसिड अटैक सरवाइवर महिलाओं को पेंशन देना शुरू किया है. जयंत चौधरी ने कहा कि हम चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश में भी ऐसी पेंशन शुरू हो. इनको नौकरियाँ दी जानी चाहिए. फ़िल्हाल तो मुफ़्त इलाज भी नहीं मिल पा रहा. अपराधियों को सजा भी सिर्फ़ तीन प्रतिशत केस में ही मिल पाती है.
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