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एग्जिट पोल: कैसे लिखी जाती है चुनावी थ्रिलर की स्क्रिप्ट, क्या है इस बला का इतिहास, कितना सच-कितना भ्रम? पढ़ें विश्लेषण

ABP Explainer: 1980 में एग्जिट पोल पहली बार विवादों में आए. इस साल अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहे थे. मीडिया कंपनी NBC ने मतदान खत्म होने से 3 घंटे पहले ही एग्जिट पोल जारी कर दिए.

बिहार विधानसभा के दूसरे और आखिरी फेज के लिए 20 जिलों की 122 सीटों पर वोटिंग हुई. शाम 5 बजे तक रिकॉर्ड 67.14% मतदान हुआ है. अब सबकी नजरें एग्जिट पोल पर टिक गई हैं. एग्जिट पोल यानी चुनावी नतीजों का अंदाजा. इससे लोगों की तसल्ली और बैचेनी में इजाफा हो जाता है, कि कौन सी पार्टी जीतने वाली है. यह वोटिंग के बाद होने वाला सर्वे है, जो कभी चुनावी नतीजों जैसा होता है, तो कभी बिल्कुल उलट.

तो आइए ABP एक्सप्लेनर में समझते हैं कि एग्जिट पोल होते क्या हैं, इसकी शुरुआत कब हुई और इसका अनुमान कितना सच साबित होता है...

सवाल-1 एग्जिट पोल का मतलब क्या होता है?
जवाब- एग्जिट पोल यानी पोलिंग बूथ से निकलने वाले वोटर्स से बातचीत के आधार पर तैयार पोल. ये एक तरह का चुनावी सर्वे होता है. मतदान वाले दिन जब मतदाता वोट देकर पोलिंग बूथ से बाहर निकलता है तो उससे वोटिंग को लेकर सवाल पूछे जाते हैं. इसमें उनसे पूछा जाता है कि उन्होंने किसको वोट दिया है?

हजारों मतदाताओं के जवाब जुटाने के बाद एजेंसियां उसका एनालिसिस करती हैं, जिससे अंदाजा लग जाता है कि हवा किसकी तरफ है. गणना करके यह भी बताया जाता है कि किसको कितनी सीटें मिल सकती हैं. साथ ही उन मुद्दों, नेताओं और घोषणाओं के बारे में भी पता चलता है, जिन्होंने मतदाताओं को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है.

सवाल-2 पहला एग्जिट पोल कब हुआ था और इसकी शुरुआत कैसे हुई थी?
जवाब- टाइम मैगजीन के मुताबिक, साल 1967 में पहली बार दुनिया में बड़े स्तर पर कोई एग्जिट पोल किया गया था...

  • अमेरिका के पॉलिटिकल रिसर्चर वॉरेन मिटोफस्की ने केंटुकी राज्य में होने वाले गवर्नर चुनाव के दौरान पहली बार एग्जिट पोल किया गया था.
  • डच समाजशास्त्री मार्सेल वैन डैम ने इसी साल 15 फरवरी को नीदरलैंड्स के आम चुनाव के दौरान उम्मीदवारों को लेकर एक सर्वे किया था.

दोनों ही जगहों पर एक्सपर्ट्स यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि लोग आखिर किसे और क्यों वोट कर रहे हैं? इसके बाद वॉरेन और मार्सेल का ये तरीका मीडिया कंपनियां इस्तेमाल करने लगीं.

मीडिया कंपनियों की वजह से साल 1970 के दशक में अमेरिका और पश्चिमी देशों में तेजी से एग्जिट पोल का कल्चर बढ़ने लगा. मतदान से नतीजों के बीच लोगों की उत्सुकता को कैटर करने के लिए मीडिया एग्जिट पोल का सहारा लेता था.

सवाल-3 तो फिर भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत कब हुई?
जवाब- भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन (IIPU) के तत्कालीन प्रमुख एरिक डी कोस्टा ने की थी. 1980 के दशक में भारत में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर एग्जिट पोल को लेकर पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रणय रॉय और यूके के पॉलिटिकल एक्सपर्ट डेविट बटलर ने मिलकर काम किया.

1996 में सरकारी चैनल दूरदर्शन ने CSDS के साथ मिलकर पहली बार एग्जिट पोल जारी किए. इसमें बीजेपी को 190-200 सीटें दिखाईं और कांग्रेस को 140-150 सीटें दीं. चुनावी नतीजे इस अंदाजे के आसपास रहे. बीजेपी को 161 सीटें मिलीं और सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस को 140 सीटें मिली थीं. इसके बाद सभी सैटेलाइट चैनलों ने एग्जिट पोल जारी करना शुरू कर दिया. कुछ समय बाद एग्जिट पोल मतदान के बाद होने वाला सबसे लोकप्रिय टीवी शो बन गया.

सवाल 4- एग्जिट पोल चुनाव खत्म होने के बाद ही क्यों जारी होते हैं?
जवाबः 1980 में एग्जिट पोल पहली बार विवादों में आए. इस साल अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहे थे. मीडिया कंपनी NBC ने मतदान खत्म होने से 3 घंटे पहले ही एग्जिट पोल जारी कर दिए. इस पोल में बताया गया कि जिमी कार्टर को हराकर रोनाल्ड रीगन चुनाव जीत रहे हैं. इसको लेकर जिमी के समर्थकों ने जोरदार विरोध किया. इस सर्वे ने मतदाताओं को कितना प्रभावित किया है, ये पता लगाने के लिए जांच कराई गई. इसके बाद मतदान खत्म होने से अब तक एग्जिट पोल जारी होने पर अमेरिका में पाबंदी लगा दी गई. बाद में यही लर्निंग दुनिया के दूसरे देशों ने भी अपनाई.

वहीं, भारत में कोई भी सरकारी संस्था एग्जिट पोल नहीं करवाती है. करीब 15 प्राइवेट एजेंसियां अलग-अलग मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर एग्जिट पोल जारी करती हैं. इनमें से कुछ संस्थाओं के नाम- चाणक्य, सी वोटर, माय एक्सिस, जन की बात, नील्सन आदि हैं.

सवाल 5- कौन-से फैक्टर्स तय करते हैं कि एग्जिट पोल कितना सटीक होगा?
जवाब: एग्जिट पोल कितना एक्यूरेट है, ये 3 मुख्य फैक्टर पर निर्भर करता है.

1. सैंपल साइज: जिस एग्जिट पोल का सैंपल साइज जितना बड़ा होता है, उसे उतना ही ज्यादा एक्यूरेट माना जाता है. मतलब ये हुआ कि सर्वे में जितना ज्यादा से ज्यादा लोगों से संपर्क किया जाए, उतना ज्यादा अच्छा है.

2. सर्वे में पूछे जाने वाले सवाल: सैंपल सर्वे में पूछा गया सवाल जितना न्यूट्रल होगा, एग्जिट पोल का रिजल्ट भी उतना ही सटीक होगा.

3. सर्वे की रेंज: सर्वे का दायरा जितना बड़ा होगा, रिजल्ट एक्यूरेट होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी.

पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बिना किसी दल की ओर झुकाव वाले चुनिंदा सवालों के जरिए ही एग्जिट पोल का सही रिजल्ट पता हो सकता है. सर्वे में पूछे गए सवाल, शब्द और समय भी इसके परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं.

सवाल 6- एग्जिट पोल का अनुमान कितना सच साबित होता है?
जवाब- भारत जैसे देश में इलेक्शन रिजल्ट को लेकर भविष्यवाणी करना बेहद कठिन है.  साल 1998 से 2019 तक कुल 6 लोकसभा चुनाव हुए. इनमें से 4 मौकों पर एग्जिट पोल के अनुमान कभी पूरी तरह गलत और कभी आंशिक गलत साबित हुए.

हालांकि, बिहार में एग्जिट पोल का रिपोर्ट कार्ड बहुत खराब रहा है. पिछले दो चुनावों में तो ये लगभग पूरी तरह फेल हो गए. 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में एग्जिट पोल ने महागठबंधन को 118-138 सीटें दिखाईं और NDA को 91-117 सीटें दीं, लेकिन नतीजे बिल्कुल उलट आए. NDA को कुल 125 सीटें मिलीं, जबकि महागठबंधन को 110 सीटें मिलीं. NDA ने राज्य में सरकार बनाई.

इसी तरह 2015 विधानसभा चुनाव में एग्जिट पोल ने NDA को 145 सीटें और महागठबंधन को 83 सीटें दीं. लेकिन नतीजों में महागठबंधन को 178 सीटें और NDA को सिर्फ 58 मिलीं. उस समय एग्जिट पोल के नतीजे बहुत बुरी तरह से गलत साबित हुए थे.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें 8 साल से ज्यादा का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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