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हज के लिए जाने वाले मुसलमान क्यों चढ़ते हैं इस 'रहमत के पहाड़' अराफात पर? जानिए अराफात का रहस्य

Hajj: हज इस्लामिक तीर्थयात्रा है, जिसमें अराफात का दिन अहम है. कहा जाता है अराफात कि दुआएं खास मानी जाती हैं और विश्वास किया जाता है कि इस दिन अल्लाह हर दुआ को सुनते हैं और गुनाहों को माफ कर देते हैं.

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Muslims Hajj: इस्लाम धर्म में हज मक्का, सऊदी अरब की एक वार्षिक तीर्थयात्रा है, जो सभी सक्षम मुसलमानों के लिए जीवन में कम से कम एक बार करना अनिवार्य है. हज का सबसे अहम और भावनात्मक पड़ाव है “अराफात का दिन” और उससे जुड़ा “जबल अर-रहमा” यानी रहमत का पहाड़.

यह वह स्थान है जहां लाखों हाजी इकट्ठा होकर आंसुओं के साथ अल्लाह से रहमत, माफी और दुआएं मांगते हैं. अराफात का यह मैदान और पहाड़ इस्लामी इतिहास, आस्था और अध्यात्म के गहराई से जुड़ा है.

अराफात, सऊदी अरब के मक्का शहर से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यह वह स्थान है जहां हज के दौरान 9वीं जिलहिज्जा (इस्लामी कैलेंडर का अंतिम महीना) को दुनियाभर से आए लाखों मुस्लिम हाजी इकट्ठा होते हैं. इस दिन को “यौम-ए-अराफा” कहा जाता है.

ख़ुत्बा-ए-हज्जतुल विदा
इस्लामी परंपरा के अनुसार पैगंबर हजरत मोहम्मद ने अपनी विदाई हज के दौरान यहीं खड़े होकर एक ऐतिहासिक खुतबा दिया था. इसी उपदेश को “ख़ुत्बा-ए-हज्जतुल विदा” कहा जाता है, जिसमें उन्होंने इंसाफ, समानता, स्त्री अधिकार और भाईचारे का संदेश दिया. इस दिन का कुरान में भी विशेष महत्व दिया गया है.


अराफात के मैदान के बीच में स्थित एक छोटी सी पहाड़ी को रहमत का पहाड़ कहा जाता है. मान्यता है कि इसी स्थान पर हजरत आदम और हजरत हव्वा को जन्नत से निकालने के बाद पुनर्मिलन हुआ था और यहीं पर उन्होंने अल्लाह से माफी मांगी थी, जिसे कबूल कर लिया गया. इसी कारण इसे “रहमत (दया/माफी) का स्थान” माना जाता है.

यहां क्यों रोते हैं हाजी?
अराफात का दिन ही हज की सबसे अहम दिन मानी जाती है. हदीस के अनुसार, “हज है ही अराफा” अगर कोई बंदा अराफात नहीं जाता है, तो उसका हज पूरा नहीं माना जाता है.

इस दिन हाजी सफेद कपड़ों में बिना भेदभाव किए एक साथ मैदान में खड़े होकर अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं. यहां की रूहानी फिजा, अल्लाह के करीब होने का एहसास, और आत्मनिरीक्षण का भाव लोगों को भावुक कर देता है.

कुछ हाजी इस पल को जीवन का सबसे पवित्र अनुभव बताते हैं. अराफात में बिताया गया हर पल मुसलमानों के लिए बेहद खास होता है. यहां की दुआएं विशेष मानी जाती हैं और विश्वास किया जाता है कि इस दिन अल्लाह हर दुआ को सुनते हैं, और गुनाहों को माफ कर देते हैं.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले के फेनहारा गांव की रहने वाली निशात अंजुम उन तमाम युवाओं की तरह है, जो छोटे शहरों और गांवों से निकलकर बड़े सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करना चाहते हैं. 25 मई 2005 के दिन इस दुनिया में अपना पहला कदम रखने वाली निशात के पिता अब्दुल वाजिद बिजनेसमैन हैं और गांव में ही मेडिकल हॉल चलाते हैं. मां शाहेदा खातून हाउसवाइफ हैं. तीन भाइयों अब्दुल बासित, अब्दुल अली, अब्दुल गनी और दो बहनों माहेरुख अंजुम व आतिया अंजुम को निशात अपनी ताकत मानती हैं. 

फेनहारा के ब्रिलिएंट पब्लिक स्कूल से 8वीं तक की पढ़ाई करने के बाद निशात ने 2020 में हाजी फरजंद हाई स्कूल फेनहारा से मैट्रिक किया तो 2022 में भगवान सिंह कॉलेज मधुबन से इंटरमीडिएट किया. सिर्फ पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी की दुनिया में भी निशात का मन रमता है. 2022 ही उन्होंने कौशल विभाग फेनहारा से कंप्यूटर कोर्स किया. फिलहाल, लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर से बैचलर ऑफ मास कम्यूनिकेशन कर रही हैं, जिसका फाइनल रिजल्ट जल्द आने वाला है. निशात अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं और जिंदगी में कुछ बड़ा करने का मकसद रखती हैं. 

पढ़ाई की शौकीन निशात अपनी जिंदगी में रंग भरने के लिए भी तमाम काम करती हैं. युवा होने के बावजूद ईश्वर से जुड़ाव रखती हैं और रोजाना नमाज पढ़ती हैं. खबरों की दुनिया में बने रहना उन्हें अच्छा लगता है. यही वजह है कि वह रोजाना अखबार, न्यूज वेबसाइट्स और टीवी चैनलों से देश-दुनिया की जानकारी हासिल करती हैं. इसके अलावा उन्हें रील्स देखना, गाने सुनना और खाना बनाना बेहद पसंद है. 

निशात की सबसे अच्छी दोस्त सादिया सिद्दिकी हैं, जिनके साथ वह अपने सुख-दुख बांटती हैं. फेवरेट क्रिकेटर्स की बात हो तो निशात की लिस्ट में विराट कोहली, ऋषभ पंत और अभिषेक शर्मा का नाम लिखा है. वहीं, प्रियंका चोपड़ा और अक्षय कुमार उन्हें काफी पसंद हैं. अगर फिल्म की बात करें तो तारे जमीं पर उन्हें इमोशनली छूती है.

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Frequently Asked Questions

हज क्या है और यह कब किया जाता है?

हज इस्लाम धर्म में मक्का, सऊदी अरब की एक वार्षिक तीर्थयात्रा है। यह सभी सक्षम मुसलमानों के लिए जीवन में कम से कम एक बार करना अनिवार्य है।

अराफात का दिन और रहमत का पहाड़ क्या है?

अराफात का दिन हज का सबसे अहम पड़ाव है, जहां हाजी रहमत के पहाड़ के पास इकट्ठा होकर अल्लाह से माफी मांगते हैं। यह इस्लामी इतिहास और आस्था से गहरा जुड़ा है।

अराफात का मैदान कहाँ स्थित है और यहाँ क्या होता है?

अराफात का मैदान मक्का शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां 9वीं जिलहिज्जा को दुनियाभर से आए लाखों हाजी इकट्ठा होते हैं, जिसे यौम-ए-अराफा कहा जाता है।

रहमत के पहाड़ से जुड़ी क्या मान्यता है?

मान्यता है कि इसी स्थान पर हजरत आदम और हजरत हव्वा का पुनर्मिलन हुआ था और उन्होंने अल्लाह से माफी मांगी थी, जिसे कबूल किया गया। इसलिए यह दया और माफी का स्थान माना जाता है।

हज के दौरान अराफात में हाजी रोते हुए गुनाहों की माफी क्यों मांगते हैं?

अराफात का दिन सबसे महत्वपूर्ण है और हदीस के अनुसार हज अराफा के बिना पूरा नहीं होता। यहां की रूहानी फिजा, अल्लाह के करीब होने का एहसास और आत्मनिरीक्षण लोगों को भावुक कर देता है।

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