Shattila Ekadashi Vrat Katha: षटतिला एकादशी व्रत में पढ़े ये कथा, धन और अन्न से भरा रहेगा घर
Shattila Ekadashi Vrat Katha in Hindi: षटतिला एकादशी 14 जनवरी 2026 को है. इस उपवास को करने से निरोगता प्राप्त होती है, वहीं अन्न, तिल आदि दान करने से धन-धान्य में वृद्धि होती है, पढ़ें षटतिला एकादशी की कथा

Shattila Ekadashi 2026: एक बार नारद मुनि ने भगवान श्रीहरि से षटतिला एकादशी का माहात्म्य पूछा 'हे नारद! मैं तुम्हें प्रत्यक्ष देखा सत्य वृत्तान्त सुनाता हूँ, कृपया ध्यानपूर्वक श्रवण करो - बहुत समय पहले मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी वह सदा व्रत-उपवास किया करती थी.
एक बार वह एक मास तक उपवास करती रही, इससे उसका शरीर बहुत दुर्बल हो गया. वह अत्यन्त बुद्धिमान थी. लेकिन उसने कभी भी देवताओं तथा ब्राह्मणों के निमित्त अन्नादि का दान नहीं किया. मैंने चिन्तन किया कि इस ब्राह्मणी ने उपवास आदि से अपना शरीर तो पवित्र कर लिया है तथा इसको वैकुण्ठ लोक भी प्राप्त हो जायेगा, लेकिन इसने कभी अन्नदान नहीं किया है, अन्न के बिना जीव की तृप्ति होना कठिन है.
भगवान विष्णु ब्राह्मण का रूप धरकर मृत्युलोक में गए और उस ब्राह्मणी से अन्न की भिक्षा मांगी. इस पर उस ब्राह्मणी ने एक मिट्टी का पिण्ड दे दिया. श्रीहरि उस पिण्ड को लेकर स्वर्ग लौट आए. कुछ समय व्यतीत होने पर वह ब्राह्मणी शरीर त्यागकर स्वर्ग आयी.
मिट्टी के पिण्ड के प्रभाव से उसे उस स्थान पर एक आम के वृक्ष सहित घर मिला, लेकिन उनसे उस घर को अन्य वस्तुओं से खाली पाया. ब्राह्मणी ने कहा 'हे प्रभु! मैंने अनेक व्रत आदि से आपका पूजन किया है, लेकिन इसके पश्चात् भी मेरा घर वस्तुओं से रिक्त है, इसका क्या कारण है?'
विष्णु जी ने कहा- अपने घर जाओ तथा जब देव-स्त्रियाँ तुम्हें देखने आयें, तब तुम उनसे षटतिला एकादशी व्रत का माहात्म्य एवं उसका विधान पूछना, जब तक वह न बतायें, तब तक द्वार नहीं खोलना.' प्रभु के ऐसे वचन सुन वह अपने घर गयी और जब देव-स्त्रियां आयीं तथा द्वार खोलने के लिये कहने लगीं, तब उस ब्राह्मणी ने कहा - 'यदि आप मुझे देखने आयी हैं तो पहले मुझे षटतिला एकादशी का माहात्म्य बतायें.'
तब उनमें से एक देव-स्त्री ने कहा 'यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो ध्यानपूर्वक श्रवण करो मैं तुमसे एकादशी व्रत एवं उसका माहात्म्य विधान सहित कहती हूँ' जब उस देव-स्त्री ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना दिया, तब उस ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिया.
देव-स्त्रियों ने ब्राह्मणी को सभी स्त्रियों से भिन्न पाया. उस ब्राह्मणी ने भी देव-स्त्रियों के कहे अनुसार षटतिला एकादशी का उपवास किया और उसके प्रभाव से उसका घर धन्य-धान्य से भर गया, अतः हे पार्थ! मनुष्यों को अज्ञान को त्यागकर षटतिला एकादशी का उपवास करना चाहिये. इस एकादशी व्रत के करने वाले को जन्म-जन्म की निरोगता प्राप्त हो जाती है. इस उपवास से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं."
इस कथा से यह भी सिद्ध होता है कि मनुष्य जो-जो और जैसा दान करता है, शरीर त्यागने के पश्चात् उसे फल भी वैसा ही प्राप्त होता है, अतः धार्मिक कृत्यों के साथ-साथ हमें दान आदि अवश्य करना चाहिए. शास्त्रों में वर्णित है कि बिना दान किए.
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