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(Source: ECI/ABP News)

Radha Krishna: त्याग और निस्वार्थता का प्रतीक है राधा-कृष्ण का प्रेम, जानें प्रेम की सही परिभाषा

Radha Krishna: प्रेम शरीर या आकर्षण रूपी न होकर आत्मीय और आध्यात्मिक से जुड़ा होना चाहिए. इसकी सीख राधा-कृष्ण के प्रेम से मिलती है. राधा कृष्ण के ऐसे ही प्रेम से हर प्रेमी युगल को सीख लेनी चाहिए.

राधा कृष्ण की प्रेम लीला के बारे में तो सभी लोग जानते हैं. लेकिन बात जब प्रेम करने की आती है तो यह अंतत: भौतिक रूप ले लेता है. राधा कृष्ण का प्रेम भौतिकता से परे आत्मीयता और आध्यात्मिकता का प्रतीक है. राधा-कृष्ण का प्रेम निस्वार्थ, समर्पण, भक्ति, दिव्यता, त्याग, विश्वास की भावना से जुड़ा है. इसलिए हर प्रेमी युगल को राधा-कृष्ण के प्रेम से जुड़ी ये बातें जरूर जाननी चाहिए.

'राधा कृष्ण' कहें या फिर 'राधे श्याम' दो नाम होकर भी एक हैं. ये नाम हमेशा एक साथ लिए जाते हैं... इससे अधिक भला शाश्वत प्रेम का प्रतीक और क्या हो सकता है. हिंदू धर्म में राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण देवी-देवता के रूप में पूजे जाते हैं. लेकिन इसी के साथ राधा-कृष्ण का प्रेम आज के आधुनिक समय के जोड़ों के लिए मिसाल कायम करता है. आज के प्रेमी युगलों को राधा कृष्ण के ऐसे ही निस्वार्थ प्रेम से सीख लेनी चाहिए.

अधूरी प्रेम कहानी भी बन सकती है मिसाल

प्रेमी युगलों का अंतिम लक्ष्य होता है ‘मिलन’ या ‘विवाह’. लेकिन राधा-कृष्ण का प्रेम यह सिखाता है कि अधूरी प्रेम कहानी भी मिसाल बन सकती है. राधा और कृष्ण का बचपन बरसाना और वृंदावन की गलियों में बीता. दोनों ने खेलकूद कर बचपन बिताया और प्रेम हो गया. सभी प्रेमी युगलों की तरह वे भी एक साथ सारा जीवन बिताना चाहते थे, लेकिन नियति में कुछ और ही लिखा था. कृष्ण राधा को वापस लौटने का वादा करके मथुरा चले गए और राजा बन गए. इसके बाद वे कभी लौटे ही नहीं.

आत्मा से कोई विवाह करता है क्या...

पुराणों मे राधा कृष्ण को अलग नहीं बताया जाता है. कृष्ण को शरीर और राधा को आत्मा कहा जाता है. कई प्रचलित कहानियों में ऐसा वर्णन मिलता है कि, एक बार राधा ने कृष्ण से पूछा कि वह उनसे विवाह क्यों नहीं कर सकते हैं. तब कृष्ण ने जवाब दिया कि- कोई अपनी आत्मा से विवाह करता है क्या...इससे स्पष्ट होता है कि राधा रानी आत्मा की तरह कृष्ण में हमेशा वास करती थीं.

प्रेम न सीरत देखे ना सूरत और न आयु

आजकल प्रेम में कई कंडीशन होते हैं. लेकिन राधा कृष्ण का प्रेम इस बात की सीख देता है कि, प्रेम बिना किसी कंडीशन के होता है. प्रेम में न सुंदरता मायने रखती है और न आयु. कहा जाता है कि राधा रानी आयु में श्रीकृष्ण से काफी बड़ी थी. यह भी कहा जाता है कि कृष्ण का रंग सांवला तो राधा का रंग दूध की तरह साफ था. लेकिन फिर भी दोनों एक-दूजे को भा गए.

प्रेम की पूर्णत: विवाह नहीं

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म श्रीहरि विष्णु के अवतार के रूप कंस को मारने, पांडवों को मार्ग दिखाने और महाभारत काल में अधर्म पर धर्म की जीत जैसे उद्देश्यों के लिए हुआ. आज कल लोग प्रेम में पड़ जाए तो अपना लक्ष्य, कर्तव्य और उद्देश्य तक भूल जाते हैं. लेकिन कृष्ण से यह सीख मिलती है कि, प्रेम की पूर्णत: विवाह नहीं है. क्योंकि प्रेम तो अपने आप में ही पूर्ण है. अगर प्रेम में विवाह तक न भी पहुंचा जाए तो अन्य कर्तव्यों या लक्ष्यों से विमुख नहीं होना चाहिए.

त्याग और बलिदान के लिए तैयार रहें

सच्चा प्रेम बिना किसी शर्त के होता है, जिसका अर्थ है त्याग, समर्पण और बलिदान. प्रेम केवल पाने का नाम नहीं बल्कि त्यागने का नाम भी है. राधा को पता था कि, कृष्ण उनसे विवाह नहीं करेंगे, इसके बावजूद भी वह उनसे प्रेम करती थीं, जोकि भौतिकता से कहीं अधिक और सांसारिक सीमाओं से परे था. युवा जोड़ों को भी राधा कृष्ण के ऐसे दिव्य प्रेम से यही सीख लेनी चाहिए.

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

Q. क्या राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था?
A. नहीं, शास्त्रों के अनुसार राधा कृष्ण का विवाह नहीं हुआ था. 

Q. कृष्ण ने आखिर राधा से क्यों नहीं किया विवाह?
A.
कृष्ण लोककल्याण और धर्म-कर्तव्यों को पूरा करने के लिए मथुरा चले गए. लेकिन राधा उनके आत्मा में सदैव बसी रही.

Q. राधा-कृष्ण प्रेम से क्या सीख मिलती है?
A.
राधा-कृष्ण का प्रेम निस्वार्थता, विश्वास, त्याग, आत्मीयता और पवित्रता की सीख देता है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

पल्लवी कुमारी (Pallawi Kumari)

धर्म-ज्योतिष विशेषज्ञ | डिजिटल मीडिया पत्रकार | कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट
पल्लवी कुमारी एक कुशल डिजिटल पत्रकार और कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें मीडिया उद्योग में 7 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC, नई दिल्ली) की पूर्व छात्रा पल्लवी, जटिल धार्मिक और ज्योतिषीय विषयों को शोध-आधारित, सरल और प्रभावी भाषा में प्रस्तुत करने में विशेषज्ञता रखती हैं.

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