कूर्म जयंती 2026 में 15 मई, रविवार को मनाई जाएगी। वैशाख पूर्णिमा 30 अप्रैल की रात 9:12 बजे से शुरू होकर अगले दिन रात 10:52 बजे समाप्त होगी।
Kurma Jayanti 2026: कूर्म जयंती कल, पूजा मुहूर्त, विधि, कथा सब जानें
Kurma Jayanti 2026: कूर्म जयंती 1 मई 2026 को मनाई जाएगी. कूर्म अवतार क्यों लिया गया,हिंदू धर्म में इसका क्या महत्व है. इस दिन पूजा करने से क्या लाभ मिलते हैं जान लें.

Kurma Jayanti 2026: कूर्म जयंती 1 मई 2026 को है. कूर्म भगवान विष्णु का दूसरा और प्रसिद्ध अवतार है. ब्राह्म वैशाख मास की पूर्णिमा को कूर्म जयंती मनाई जाती है. साल 2026 में यह पर्व 15 मई, रविवार को पड़ रहा है. कूर्म का अर्थ है कछुआ, और यह भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक माना जाता है.
इस अवतार का संबंध गहराई और आत्मचिंतन से है. इस दिन कछुए के रूप में विष्णु जी की पूजा से मन शांत होता है, चिंता कम होती है और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है. कूर्म अवतार क्यों लिया, इसका महत्व, पूजा विधि सब जानें.
कूर्म जयंती मुहूर्त 2026
वैशाख पूर्णिमा की शुरुआत 30 अप्रैल 2026 को रात 9 बजकर 12 मिनट पर होगी और अगले दिन रात 10.52 मिनट पर इसका समापन होगा.
- कूर्म जयन्ती मुहूर्त - शाम 04:17 - शाम 06:56
कूर्म अवतार क्या है ?
कूर्म अवतार अर्थात भगवान विष्णु का वह रूप है, जिसमें उन्होंने कछुए का स्वरूप धारण किया. दशावतारों में इसकी स्थिति को लेकर अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न मत मिलते हैं. पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन हो रहा था, तब मंदराचल पर्वत को स्थिर रखने के लिए भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण किया और अपनी पीठ पर उस पर्वत को सहारा दिया.
कछुए से हुई मानव जीवन की शुरुआत
इस अवतार के लिए ज्यादातर ग्रंथों में ये भी माना जाता है कि कछुए से ही मनुष्य जीवन की शुरुआत हुई. यह अवतार बताता है कि सृष्टि की शुरुआत और जीवन का विकास जल से जुड़ा हुआ है. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों जीवन लक्ष्यों का संतुलन ही पूर्ण जीवन का आधार है.
कूर्म अवतार में छिपा है गूढ़ रहस्य
विष्णु जी के कूर्म अवतार धैर्य, द्दढ़ता और स्थिरता का गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है. जिस प्रकार एक कछूआ द्दढ़ता से अपना बोझ उठाता है उसी तरह भगवान विष्णु अपने इस रूप में यह दर्शता है कि सच्ची शक्ति स्थिरता और अटूट आस्था में निहित है.
कूर्म जयंती पूजा विधि
- इस दिन वैष्णवजन भगवान कूर्म के निमित्त एक दिवसीय उपवास का पालन करते हैं तथा कूर्मपुराण एवं श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं.
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदी, सरोवर या घर में स्नान करें.
- साफ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु का ध्यान करें.
- घर के मंदिर या किसी साफ स्थान पर भगवान विष्णु या कूर्म अवतार की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें.
- एक कलश में जल भरकर उसमें आम के पत्ते और नारियल रखें.
- पूजा स्थल पर दीपक, धूप, फूल, तुलसी दल और शुद्ध जल रखें.
- इसके बाद भगवान विष्णु का आह्वान करें और उन्हें जल, अक्षत, चंदन और पुष्प अर्पित करें.
- तुलसी दल चढ़ाना विशेष शुभ माना जाता है.
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें.
- विष्णु सहस्रनाम या कूर्म अवतार से संबंधित कथा का पाठ करें.
- कूर्म पुराण का पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है.
- भगवान को फल, मिठाई, खीर या सात्विक भोजन का भोग लगाएं.
- घी का दीपक जलाकर विष्णु जी की आरती करें.
- इस दिन जल से भरा घड़ा, अन्न, वस्त्र या जरूरतमंदों को दान करना शुभ माना गया है.
- ब्राह्मणों या गरीबों को भोजन कराने से विशेष पुण्य मिलता है.
- दिनभर यथाशक्ति व्रत रखें और सात्विक आहार लें.
- रात्रि जागरण करें और अगले दिन पूजा के बाद व्रत का पारण करें.
कूर्म जयंती पूजा मंत्र
- ॐ कच्छपेसाय विद्महे महाबलाय धीमहि. तन्नो कूर्मः प्रचोदयात्॥
- ॐ कूर्माय नमः.
कूर्म अवतार कथा
पद्मपुराण में प्राप्त कूर्म अवतार से सम्बन्धित कथा के अनुसार, एक समय महर्षि दुर्वासा ने देवराज इन्द्र को पारिजात पुष्पों की एक सुन्दर माला भेंट की, किन्तु अभिमानवश इन्द्र ने वह माला ऐरावत के मस्तक पर डाल दी तथा ऐरावत ने वह माला अपनी सूँड से भूमि पर डाल दी. इन्द्र के इस कृत्य से ऋषि दुर्वासा को अपमानित अनुभव हुआ. अतः अपने अपमान से कुपित होकर महर्षि दुर्वासा ने देवताओं को शाप दे दिया कि तुम्हारा समस्त वैभव नष्ट हो जायेगा एवं देवता श्री हीन हो जायेंगे.
महर्षि दुर्वासा के शाप के प्रभाव से देवी लक्ष्मी समुद्र में विलीन हो गयीं. देवी लक्ष्मी के लुप्त होते ही देवलोक, असुरलोक आदि समस्त लोकों का वैभव खत्म हो गया और देवता शक्तिहीन हो गये. इसके बाद सभी देवताओं सहित इन्द्र, भगवान विष्णु के समक्ष पहुंच
भगवान विष्णु ने देवताओं एवं दैत्यों को देवी लक्ष्मी को पुनः प्राप्त करने के लिए समुद्रमन्थन करने का सुझाव दिया समुद्र मन्थन के लिए ज्यों ही मन्दराचल पर्वत को लाया गया, वह उस अथाह जल में डूबने लगा. उस समय भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार धारण कर मन्दराचल पर्वत को अपनी पृष्ठ पर धारण किया और समुद्र मन्थन सम्पन्न किया. समुद्र मन्थन से मिले चौदह रत्नों में देवी लक्ष्मी भी प्रकट हुईं उन्होंने भगवान विष्णु का वरण कर देवताओं को उनका वैभव पुनः प्रदान किया.
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Frequently Asked Questions
कूर्म जयंती 2026 में कब मनाई जाएगी?
कूर्म अवतार का क्या महत्व है?
कूर्म अवतार भगवान विष्णु का वह रूप है जिसमें उन्होंने कछुए का स्वरूप धारण किया। यह अवतार धैर्य, दृढ़ता और स्थिरता का संदेश देता है।
कूर्म जयंती के दिन पूजा कैसे की जाती है?
इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, विष्णु सहस्त्रनाम या कूर्म पुराण का पाठ करते हैं और भगवान विष्णु की आरती करते हैं। दान-पुण्य करना भी शुभ माना जाता है।
कूर्म अवतार की कथा क्या है?
पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान मंदराचल पर्वत को स्थिर रखने के लिए भगवान विष्णु ने कूर्म का रूप धारण किया और पर्वत को अपनी पीठ पर सहारा दिया।
























