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Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी पर क्या सच में सो जाते हैं विष्णु जी ?

Devshayani Ekadashi 2026: 25 जुलाई को देवशनयी एकादशी है, फिर सभी मांगलिक कार्य बंद हो जाएंगे, क्योंकि देव सो जाते है. क्या है देवताओं के सोने का रहस्य,क्या सच में देवगण सो जाते हैं जानें.

Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी 25 जुलाई 2026 को है. आपने अक्सर बुजुर्गों से या अपने आसपास लोगों से सुना होगा कि देवशयनी एकादशी के बाद देव सो जाते हैं, मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए, लेकिन क्या कभी सोचा है सृष्टि का पालन करने वाले देवता चातुर्मास में सो जाते हैं, विष्णु जी सोने के लिए क्षीरसागर में क्यों जाते हैं. यहां देवताओं के सोने का अर्थ क्या है आइए विस्तार से समझते हैं.

देवशयनी एकादशी क्या सच में सो जाते हैं देव

आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी पर देवता सो जाते हैं और  चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर जागते हैं. स्कंद पुराण के अनुसार यहां देवों के सोने का अर्थ शाब्दिक रूप से नींद में चले जाना नहीं है बल्कि योगनिद्रा से है.

योगनिद्रा अर्थात संसार की बाहरी गतिविधियों को त्यागकर ध्यान, जप, तप की अवस्था में जाना. भगवान विष्णु को इस समय योगनिद्रा में रहते हैं, जो एक प्रकार की गहरी समाधि है, न कि साधारण नींद. सनातन धर्म के शास्त्रों के अनुसार भगवान सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और चेतन हैं इसलिए उनका मनुष्यों की तरह सो जाना उचित नहीं माना जाता.

गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं 'या निशा सर्वभूतानाम् तस्यां जागर्ति संयमी' अर्थात् जब सबके लिए रात्रि होती है, योगी तब भी जागता रहता है. ऐसे में सोचिए जो व्यक्ति को निद्रा से जगा दे वो ईश्वर कैसे सो सकते हैं. आध्यत्मिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो देवशयन कभी होता ही नहीं.

योगनिद्रा में क्यों जाते हैं विष्णु जी

भगवान विष्णु की योगनिद्रा ये संकेत देती है कि अब सृष्टि का एक विशेष काल शुरू हो रहा है. इस समय वर्षा ऋतु शुरु हो चुकी होती है. सामान्य जन-जीवन बारिश के कारण थोड़ा अस्त-व्यस्त हो जाता है. इसलिए इसमें मनुष्य को बाहरी उत्सवों और मांगलिक कार्यों की बजाय आत्मचिंतन, तप, जप, व्रत, संयम और भक्ति पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. इसी कारण देवशयनी एकादशी के बाद से विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है.

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान विष्णु की योगनिद्रा को उनकी दिव्य शक्ति और योगमाया से संबंधित अवस्था के रूप में बताया गया है.

विष्णु जी क्षीरसागर में ही क्यों योगनिद्रा धारण करते हैं

शास्त्रों में क्षीरसागर यानी दूध का समुद्र को सात समुद्रों में सबसे पवित्र और दिव्य माना गया है. क्षीर यानी दूध  पवित्रता, और अमृततत्त्व का प्रतीक है.भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं, इसलिए उनका निवास भी ऐसे स्थान पर बताया गया है जो शुद्धता और जीवनदायन का प्रतीक हो. भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा धारण करते हैं. इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है.

देवशयनी एकादशी से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. क्या देवशयनी एकादशी पर देवता सच में सो जाते हैं?
उत्तर. नहीं शास्त्रों के अनुसार यहां सोने का अर्थ योगनिद्रा है, सामान्य नींद नहीं.

Q2. देवशयनी एकादशी 2026 में कब है ?
उत्तर. देवशयनी एकादशी 25 जुलाई 2026 को है. 

Q3. देवशयनी एकादशी के बाद मांगलिक कार्य क्यों नहीं किए जाते?
उत्तर. चातुर्मास को साधना और भक्ति का काल माना गया है, इसलिए इस दौरान विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्य स्थगित रखने की परंपरा है.

Q4. चातुर्मास में विवाह क्यों नहीं होते ?
उत्तर. चातुर्मास में ऋतु परिवर्तन होता है. वर्षा ऋतु के कारण जन जीवन अस्त-वस्त हो जाता है,शास्त्रीय दृष्टि से विवाह न होने का कारण चातुर्मास का आध्यात्मिक महत्व और इस अवधि में शुभ मुहूर्तों नहीं निकाले जाते.

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Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

जागृति सोनी बरसले (Jagriti Soni Bursle)

धर्म, ज्योतिष और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं पर शोध आधारित लेखन करने वाली डिजिटल पत्रकार

जागृति सोनी बर्सले धर्म, ज्योतिष, वास्तु और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े विषयों की अनुभवी डिजिटल पत्रकार और लेखिका हैं. उन्हें डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 10 वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में वह ABP Live (Abplive.com) में बतौर कंसल्टेंट कार्यरत हैं, जहां वह व्रत-त्योहार जैसे नवरात्रि, करवा चौथ, दिवाली, होली, एकादशी, प्रदोष व्रत, हरियाली तीज आदि, धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय घटनाओं, शुभ मुहूर्त, वास्तु और फेंगशुई, पंचांग जैसे विषयों पर शोध आधारित और प्रमाणिक लेख लिखती हैं.

विशेषज्ञता (Expertise)

जागृति सोनी बर्सले विशेष रूप से इन विषयों पर लेखन करती हैं:

  • व्रत-त्योहार और भारतीय धार्मिक परंपराएं
  • वैदिक ज्योतिष और ग्रह-नक्षत्र आधारित घटनाएं
  • शुभ मुहूर्त और धार्मिक विधि-विधान
  • वास्तु शास्त्र और फेंगशुई
  • आध्यात्मिक मान्यताएं और सांस्कृतिक परंपराएं

उनके लेखों में धार्मिक विषयों को केवल आस्था के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि शास्त्रीय स्रोतों और प्रमाणिक ग्रंथों के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है.

शिक्षा और पृष्ठभूमि

जागृति सोनी बर्सले ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से की है.

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर डॉट कॉम से की, जहां डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने धर्म, समाज और संस्कृति से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर लेख लिखे.

डिजिटल मीडिया में काम करते हुए उन्होंने टेक्स्ट और वीडियो दोनों फॉर्मेट में काम किया है और वीडियो सेक्शन में सीनियर प्रोड्यूसर के रूप में भी लंबे समय तक योगदान दिया है. इस अनुभव ने उन्हें आधुनिक डिजिटल पत्रकारिता के विभिन्न फॉर्मेट को समझने और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने की क्षमता दी है.

शास्त्रीय अध्ययन और शोध

जागृति सोनी बर्सले की विशेष रुचि धर्म और ज्योतिष के शास्त्रीय अध्ययन में है.

उन्हें प्राचीन धार्मिक ग्रंथों जैसे:

  • धर्म सिंधु
  • मुहूर्त चिंतामणि

का अच्छा ज्ञान है. इन ग्रंथों के आधार पर वह व्रत-त्योहार, पूजा-विधि, ज्योतिषीय घटनाओं और मुहूर्त से जुड़े विषयों को सरल, प्रमाणिक और शोधपरक तरीके से पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास करती हैं.

योगदान

जागृति सोनी बर्सले एक फ्रीलांस लेखक के रूप में भी कई मंचों पर आध्यात्म, भारतीय संस्कृति और ज्योतिष से जुड़े विषयों पर लेख लिख चुकी हैं.

उनका उद्देश्य धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा में विश्वसनीय जानकारी के साथ प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक इन विषयों को समझ सकें और सही जानकारी प्राप्त कर सकें.

व्यक्तिगत रुचियां

अध्यात्म और भारतीय परंपराओं के अध्ययन के प्रति उनकी गहरी रुचि है. खाली समय में उन्हें आध्यात्मिक और ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ना पसंद है. यह अध्ययन उनके लेखन को और अधिक गहन, तथ्यपूर्ण और संदर्भ आधारित बनाता है.

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