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औरंगजेब का दिवाली पर 'सख्त' फैसला: क्या पटाखों पर बैन धार्मिक दमन था? जानें इतिहास का सच!

Mughal Emperor Aurangzeb: ये बात तो आपने सुना ही होगा कि औरंगजेब ने हिंदुओं के त्योहार दिवाली पर पटाखे और शराब पीने पर रोक लगा दिया था. मुगल शासक औरंगजेब ने यह बैन दिवाली के कुछ समय पहले लगाया था.

Mughal Emperor Aurangzeb: ये बात तो आपने सुना ही होगा कि औरंगजेब ने हिंदुओं के त्योहार दिवाली पर जुआ और शराब पीने पर रोक लगा दिया था. मुगल शासक औरंगजेब ने यह बैन द‍िवाली से कुछ समय पहले बिना किसी त्योहार का नाम लिए बगैर लगाया था. लेकिन समझा यही गया कि ये पाबंदी जानबूझकर द‍िवाली पर आतिशबाजी रोकने के लिए लगाया है.

हालांकि औरंगजेब  ने अपने  इस कदम से बहुसंख्यक हिंदुओं को नाराज कर दिया. 1667 में औरंगजेब के जरिए लगाए गए पटाखों पर पाबंदी से उसके शासनकाल के दौरान हिंदू त्योहारों पर निश्चित तौर पर बुरा असर पड़ा. जैसा आप सभी जानते हैं कि  द‍िवाली का त्योहार तो आतिशबाजी के बगैर अधूरा लगता है.

इस पाबंदी का असर औरंगजेब के पूरे साम्राज्य पर लागू हुआ. औरंगजेब का साफ आदेश था कि किसी भी तरह के त्योहारों पर पटाखों और आतिशबाज़ी का इस्तेमाल नहीं होगा. उसने ये आदेश स्थानीय अधिकारियों के जरिए लोगों तक पहुंचवाया. आदेश में पाबंदी की कोई समय सीमा तय नहीं की गई थी, कि यह पाबंदी कब खत्म होगा. जिससे इसकी अवधि को लेकर असमंजस बना रहा.

औरंगजेब ने जुए और शराब पर पाबंदी कब लगाया था
औरंगजेब ने जुए और शराब पर पाबंदी कब लगाया था, इसका कोई विशिष्ट वर्ष नहीं है, लेकिन उसने अपने शासनकाल (1658-1707) के दौरान इस्लामी शरीयत का पालन करते हुए इन पर प्रतिबंध लगाने के कई प्रयास किए और 1659 में इसने शरीयत के विरुद्ध समझे जाने वाले कानूनों को लागू किया. 

पटाखों पर बैन पहली बार और किस मुगल शासक ने लगाया था
मुगल शासक औरंगजेब ने पटाखों पर 8 अप्रैल 1667 ईस्वी में पाबंदी लगाया था. उन्होंने यह पाबंदी धार्मिक कारणों से नहीं बल्कि राज्य में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से लगाया था, क्योंकि औरंगजेब अपने सख्ती के लिए जाने जाते थे और यह उनके रूढ़िवादी शासन का एक हिस्सा था.

आतिशबाजी  के बैन से दिवाली पर असर
1667 में औरंगजेब के जरिए लगाए आतिशबाजी के पाबंदी से दिवाली पर गहरा असर पड़ा, क्योंकि इसे हिंदुओं के धार्मिक त्योहारों पर किए जा रहे दमन के रूप में देखा गया, जिनसे लोगों के लिए त्योहार का अनुभव बदला.

हालांकि, इससे दिवाली पर सीधे तौर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने के बजाय, यह दर्शाता है कि कैसे मुगल शासकों ने धार्मिक प्रथाओं पर अंकुश लगाने का प्रयास किया, जिससे हिंदुओं के लिए यह एक ऐतिहासिक अन्याय बना.

क्या दीवाली पर पटाखे बैन धार्मिक दमन के रूप में देखा गया?
औरंगजेब का एक सख्ती इस्लामी शासक था. जिसने गैर इस्लामी प्रथाओं को दबाने का प्रयास किया. दिवाली पर पटाखों पर पाबंदी लगाना भी उसके रवैये का एक हिस्सा माना गया, जिससे हिंदुओं के त्योहारों पर दमन किया जा रहा था.

पटाखे बैन से दीवाली पर खुशियों में कमी आई
पटाखे जलाने और शराब पीने की प्रथा दिवाली के उत्साह और खुशी के माहौल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. पाबंदी की वजह से लोगों की खुशी, उत्सव और अनुभव में कमी आई, खासकर उन लोगों के लिए जो त्योहार को पटाखे जलाकर मनाते थे. 

जुए, शराब और पटाखे बैन थे, तब हिंदूओं ने दिवाली कैसे मनाया
जब मुगल शासक औरंगजेब ने जुए, शराब और पटाखे  पर पाबंदी लगाया था, तो हिंदुओं ने दिवाली पारंपरिक तरीके से मनाई, जैसे दीये, जलाना, रंगोली बनाना, मिठाइयां बांटकर और एक दूसरे को उपहार देकर बहुत ही अच्छे से दिवाली मनाया. हालांकि ऐसा कहा भी जाता है कि औरंगजेब के पाबंदी  के बाद भी कुछ समुदायों ने गुप्त रूप से पटाखों का इस्तेमाल किया था.

दिवाली पर ही हुए जुए और शराब पर पाबंदी
यह सच नहीं है कि मुगल शासक औरंगजेब ने सिर्फ दिवाली पर जुए और शराब पर पाबंदी लगाया था. बल्कि, उन्होंने अपनी आतिशबाजी पर भी पाबंद लगाया था जो धार्मिक नहीं था. शराब के व्यापार और सेवन पर पाबंदी लगाई गई थी, जो इस्लामी कानून के अनुसार हराम था.  

कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि औरंगजेब के जरिए आतिशबाजी पर पाबंदी लगाने का कोई धार्मिक कारण नहीं था. उनके शासनकाल में होली जैसे त्योहारों पर भी आतिशबाजी का चलन था. जबकि कुछ इतिहासकारों का मत हैं कि औरंगजेब ने निजी प्रथाओं पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाई थी. 

जुए और शराब पर पाबंदी कब खत्म हुआ
 ये पाबंदी औरंगजेब के शासनकाल के दौरान चलता रहा. 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद, उसके उत्तराधिकारियों ने इस तरह के पाबंदियों पर उस स्तर की सख्ती नहीं बरती . उसके बाद मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हो गया.

हालांकि इसके बाद ही मुगल साम्राज्य ना केवल कमजोर हुआ बल्कि उसके सामंतों ने उसे तोड़कर अपने  इलाकों पर कब्जा करना शुरू कर दिया. यह समझा जाता है कि जैसे-जैसे राजनीतिक सत्ता बदली और स्थानीय रीति-रिवाजों ने प्रमुखता हासिल की, तब जुए और शराब  पर प्रतिबंध धीरे-धीरे कम हो गए.

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बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले के फेनहारा गांव की रहने वाली निशात अंजुम उन तमाम युवाओं की तरह है, जो छोटे शहरों और गांवों से निकलकर बड़े सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करना चाहते हैं. 25 मई 2005 के दिन इस दुनिया में अपना पहला कदम रखने वाली निशात के पिता अब्दुल वाजिद बिजनेसमैन हैं और गांव में ही मेडिकल हॉल चलाते हैं. मां शाहेदा खातून हाउसवाइफ हैं. तीन भाइयों अब्दुल बासित, अब्दुल अली, अब्दुल गनी और दो बहनों माहेरुख अंजुम व आतिया अंजुम को निशात अपनी ताकत मानती हैं. 

फेनहारा के ब्रिलिएंट पब्लिक स्कूल से 8वीं तक की पढ़ाई करने के बाद निशात ने 2020 में हाजी फरजंद हाई स्कूल फेनहारा से मैट्रिक किया तो 2022 में भगवान सिंह कॉलेज मधुबन से इंटरमीडिएट किया. सिर्फ पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी की दुनिया में भी निशात का मन रमता है. 2022 ही उन्होंने कौशल विभाग फेनहारा से कंप्यूटर कोर्स किया. फिलहाल, लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर से बैचलर ऑफ मास कम्यूनिकेशन कर रही हैं, जिसका फाइनल रिजल्ट जल्द आने वाला है. निशात अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं और जिंदगी में कुछ बड़ा करने का मकसद रखती हैं. 

पढ़ाई की शौकीन निशात अपनी जिंदगी में रंग भरने के लिए भी तमाम काम करती हैं. युवा होने के बावजूद ईश्वर से जुड़ाव रखती हैं और रोजाना नमाज पढ़ती हैं. खबरों की दुनिया में बने रहना उन्हें अच्छा लगता है. यही वजह है कि वह रोजाना अखबार, न्यूज वेबसाइट्स और टीवी चैनलों से देश-दुनिया की जानकारी हासिल करती हैं. इसके अलावा उन्हें रील्स देखना, गाने सुनना और खाना बनाना बेहद पसंद है. 

निशात की सबसे अच्छी दोस्त सादिया सिद्दिकी हैं, जिनके साथ वह अपने सुख-दुख बांटती हैं. फेवरेट क्रिकेटर्स की बात हो तो निशात की लिस्ट में विराट कोहली, ऋषभ पंत और अभिषेक शर्मा का नाम लिखा है. वहीं, प्रियंका चोपड़ा और अक्षय कुमार उन्हें काफी पसंद हैं. अगर फिल्म की बात करें तो तारे जमीं पर उन्हें इमोशनली छूती है.

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