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Jal Sahelis of Rajasthan: रेत के समंदर में बसाया पानी का आशियाना, जैसलमेर की 'जल सहेलियों' ने किया कमाल

Sanwarai Talab: सांवराई तालाब आसपास के आठ गांवों के करीब 11 हजार लोगों की प्यास बुझाता है, लेकिन 10 साल यानी करीब 2015 से रिजॉर्ट वाले इस तालाब का पानी चोरी करने लगे.

Jaisalmer Adbala Village: यहां दूर तलक नजर जाए तो रेत के टीले दिखते हैं. दिन की रोशनी में ऐसा लगता है कि चमकती रेत पर पानी बिखरा हुआ है, लेकिन पास जाते ही हकीकत सामने आ जाती है. हम बात कर रहे हैं राजस्थान के जैसलमेर जिले की, जहां आसमान छूते रेत के सुनहरे टीले हर किसी को अपनी ओर खींच लेते हैं, लेकिन यहां की स्याह हकीकत आपके होश उड़ा देगी.


Jal Sahelis of Rajasthan: रेत के समंदर में बसाया पानी का आशियाना, जैसलमेर की 'जल सहेलियों' ने किया कमाल

सूरज की किरणों से लेकर अंधेरी रात की रंग-बिरंगी रोशनी में जगमगाने वाले इस जिले के अधिकतर गांव कभी पीने के पानी के लिए जूझते रहते थे, लेकिन यहां की महिलाओं ने न सिर्फ पानी बचाया, बल्कि 900 साल पुरानी परंपरा को दोबारा जिंदा कर दिया. अडबाला पंचायत से शुरू हुई यह मुहिम अब जैसलमेर के तमाम गांवों में अपना रंग दिखाने लगी है. आइए जानते हैं कि मातृत्व से ममता को सींचने वाली महिलाओं ने कैसे धोरों की धरती की प्यास बुझाई? इनकी इस मुहिम के रास्ते में क्या-क्या दिक्कतें आईं और उन्होंने जल माफिया से पानी कैसे बचाया?

करीब 900 साल पुराना है अडबाला का तालाब

अडबाला गांव के सवाई सिंह ने बताया कि करीब 14वीं सदी के दौरान भिड़कमल भाटी को जागीर मिली थी, जिनके दायरे में करीब 12 गांव आते थे. उस वक्त भी इलाके में पानी की काफी कमी थी. ऐसे अडबाला गांव में एक तालाब बनाया गया और इसका नाम सांवराई तालाब रखा गया, जिसमें उस वक्त सभी 12 गांवों के लोगों ने मिलकर बड़ा तालाब बनाया, जिससे पानी की कमी न हो.


Jal Sahelis of Rajasthan: रेत के समंदर में बसाया पानी का आशियाना, जैसलमेर की 'जल सहेलियों' ने किया कमाल

उस दौरान सबसे पहले तालाब के लिए खुदाई की गई और चारों तरफ मेड़बंदी भी हुई. उस वक्त बारिश काफी कम होती थी, लेकिन जो भी पानी आता, वह इस तालाब में इकट्ठा होने लगा और लोग इस्तेमाल करने लगे. आजादी के बाद जब राजस्थान में सरकार बनने लगी तो तालाब के लिए सरकार से भी थोड़ी-थोड़ी मदद मिलती रही.

कैसे बिगड़े हालात?

सवाई सिंह के मुताबिक, जैसलमेर में धीरे-धीरे टूरिज्म बढ़ने लगा, जिसकी वजह से पानी की कमी में भी इजाफा हो गया. उन्होंने बताया कि यह सांवराई तालाब आसपास के आठ गांवों के करीब 11 हजार लोगों की प्यास बुझाता है, लेकिन 10 साल यानी करीब 2015 से रिजॉर्ट वाले इस तालाब का पानी चोरी करने लगे. पर्यटकों को पीने का पानी देते-देते तालाब सूखने लगा. इसकी वजह से गर्मियों में गांव के लोगों को डेढ़-डेढ़ हजार रुपये खर्च करके टैंकर मंगाने पड़ते थे.


Jal Sahelis of Rajasthan: रेत के समंदर में बसाया पानी का आशियाना, जैसलमेर की 'जल सहेलियों' ने किया कमाल

उन्होंने बताया कि पानी की कमी के चलते झगड़े भी होते, लेकिन कुछ बदलाव नहीं आ रहा था. उस वक्त पुरुषों ने चोरी रोकने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए. ऐसे में महिलाओं ने मोर्चा संभाल लिया और खुद को जल सहेलियां का नाम देकर तालाब की रक्षा शुरू कर दी. उन्होंने बताया कि आसपास के सभी गांवों के लोग इसी गांव का पानी पीते हैं और खेती समेत अन्य कार्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है. 

कैसे बचाया गया तालाब?

अडबाला में रहने वाली कमला देवी बताती हैं कि जब तालाब का पानी खत्म होने लगा और उसे बचाने की पुरुषों की कोशिश कामयाब नहीं हुई तो उन्होंने 5 महिलाओं के साथ मिलकर एक ग्रुप बनाया. इस ग्रुप को जल सहेलियां नाम भी दिया गया. इस ग्रुप में शामिल महिलाएं सुबह से लेकर शाम तक इस तालाब की निगरानी करती हैं, जिससे किसी भी रिजॉर्ट का टैंकर यहां से पानी भरकर न ले जा सके.


Jal Sahelis of Rajasthan: रेत के समंदर में बसाया पानी का आशियाना, जैसलमेर की 'जल सहेलियों' ने किया कमाल

उन्होंने बताया कि कई बार दोपहर के वक्त टैंकर पानी भरने आ जाते हैं, जिसके लिए महिलाएं मुस्तैद रहती हैं. अगर कोई टैंकर पानी भर भी लेता है तो उसे तुरंत खाली करा लिया जाता है और पानी तालाब में भी डलवा दिया जाता है. ऐसे टैंकरों के मालिकों पर 1000 रुपये का जुर्माना भी लगाया जाता है. इस पैसे का इस्तेमाल तालाब को गहरा करने और उसके मेंटिनेंस आदि पर किया जाता है. 

रात में भी दिया जाता है पहरा

जल सहेलियां ग्रुप में शामिल भानू देवी बताती हैं कि लगातार होने वाली पानी चोरी को रोकने के लिए उन्होंने रिजॉर्ट मालिकों से भी बात की. उन्हें पानी की अहमियत समझाई की. साथ ही, बताया गया कि यह पानी हम सभी के लिए है. इस पर सिर्फ पर्यटकों का हक नहीं है. ऐसे में पानी चोरी रोकी जाए.


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इसका असर यह हुआ कि कई रिजॉर्ट मालिक मान गए, लेकिन कुछ लोग अब भी पानी चोरी की कोशिश में लगे रहते हैं. ऐसे लोगों को पकड़ने के बाद उन पर 1000 रुपये का जुर्माना लगाया जाता है. पानी की चोरी रोकने के लिए रात के वक्त भी तालाब की पहरेदारी की जाती है. इसमें पुरुषों का भी पूरा सहयोग मिलता है, जिससे पानी बचाना आसान हो गया है. 

अब कितना बड़ा हो चुका ग्रुप?

कमला देवी बताती हैं कि हमारे जल सहेलियां ग्रुप का साइज लगातार बढ़ता जा रहा है. 5 महिलाओं से शुरू हुए इस ग्रुप में अब करीब 50 महिलाएं जुड़ चुकी हैं, जिनका मकसद तालाब के पानी की रक्षा करना होता है. वहीं, अलग-अलग गांवों में इनकी संख्या 300 के पार पहुंच चुकी है.


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ग्रुप में शामिल हर महिला की अलग-अलग शिफ्ट लगाई जाती है. अगर कोई महिला अपनी शिफ्ट नहीं करती है तो उस पर 50 रुपये का जुर्माना भी लगाया जाता है. जुर्माने से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल तालाब के मेंटिनेंस में किया जाता है.

हर महीने की जाती है मीटिंग

तालाब की साफ-सफाई के लिए हर महीने मीटिंग भी की जाती है, जिसमें तालाब के मेंटिनेंस को लेकर भी बातचीत की जाती है. साथ ही, लोगों से सुझाव भी मांगे जाते हैं, जिससे तालाब की बेहतरी के लिए कदम उठाए जा सकें.


Jal Sahelis of Rajasthan: रेत के समंदर में बसाया पानी का आशियाना, जैसलमेर की 'जल सहेलियों' ने किया कमाल

रेनू देवी के मुताबिक, ग्रुप में शामिल महिलाओं के अलावा गांव के हर घर से एक सदस्य को समिति का सदस्य बनाया गया है. इसके लिए 50 रुपये मेंबरशिप चार्ज लिया जाता है. यह पैसा भी तालाब की बेहतरी में इस्तेमाल होता है.

बेटी और बहू को भी दी जाती है सीख

कमला देवी के मुताबिक, गांव में आने वाली नई बहुओं को भी तालाब से जोड़ने का रिवाज है. जब किसी घर में बेटे की शादी होती है तो आने वाली बहू को सिखाया जाता है कि अपने परिवार के रिवाज निभाने के साथ-साथ उन्हें तालाब का ख्याल कैसे रखना है. साथ ही, तालाब की साफ-सफाई के बारे में भी उन्हें जानकारी दी जाती है.


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वहीं, जब गांव की किसी बेटी की शादी दूसरे गांव में होती है तो उसे समझाया जाता है कि वह अपने ससुराल के लोगों को पानी की अहमियत समझाए, जिससे इलाके से पानी की किल्लत खत्म हो सके. यह परंपरा कई पीढ़ियों से फॉलो की जा रही है.

त्योहारों से भी जोड़ा तालाब का कनेक्शन

भानू देवी ने बताया कि तालाब की देखभाल का कनेक्शन तीज त्योहार आदि से भी जोड़ा गया है. इसके तहत पूर्णिमा, हरियाली तीज, एकादशी, बैशाखी, गुरु पूर्णिमा जैसे त्योहारों पर महिलाएं खासतौर पर तालाब की देखभाल करने जाती हैं. उस दौरान तालाब की साफ-सफाई के बाद पूजा-अर्चना आदि की जाती है.


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उस दौरान बच्चों को भी तालाब के पास ले जाते हैं और उन्हें इसकी अहमियत समझाते हैं. इसके अलावा गांव के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी समय-समय पर तालाब की विजिट कराई जाती है और उन्हें पानी की अहमियत समझाई जाती है.

साल-दर-साल बढ़ा तालाब का दायरा

अडबाला पंचायत में एलडीसी जालम सिंह बताते हैं कि पहले यह तालाब काफी छोटा था, लेकिन साल-दर-साल इसका साइज बढ़ाया जा रहा है. इसके लिए काफी लोगों ने अपनी जमीन छोड़ दी है. इस वक्त तालाब का साइज ढाई से तीन बीघा तक पहुंच चुका है. शुरुआत में जिन लोगों की जमीन इस तालाब के दायरे में आई, उन्होंने अपनी जमीन इस तालाब के लिए दान कर दी.


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दान की गई जमीन की बात करें तो तालाब के लिए 25 बीघा जमीन छोड़ दी गई है. वहीं, बारिश का पानी बिल्कुल भी बर्बाद न हो, इसके लिए तालाब के चारों तरफ लगातार रास्ते बनाए जाते हैं. ऐसे में यह तालाब अब 25 बीघा जमीन पर फैल चुका है. इसका पनघट करीब तीन बीघा का है और बहाव क्षेत्र 1000 से 1200 बीघा तक है. तालाब के नीचे जैसलमेर के पीले पत्थर लगवाए गए हैं, ताकि पानी साफ रहे और जल्दी न सूखे. वहीं, गहराई बीच में करीब 20 फीट तक पहुंच चुकी है.  

लगातार बनाए जा रहे तालाब

जालम सिंह के मुताबिक, सांवराई तालाब अब आसपास के इलाकों के लिए मॉडल तालाब बन चुका है. इसकी तर्ज पर लगातार नए-नए तालाब बनाए जा रहे हैं. सांवराई तालाब के एक किलोमीटर दायरे की बात करें तो यहां अब तक कई तालाब खोदे जा चुके हैं. इनमें हापासर तालाब, सूटिआई तालाब, उदासर तालाब और सांवरा तालाब आदि बन चुके हैं.


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वहीं, कई अन्य तालाबों को भी बनाने का काम लगातार किया जाता है. उन्होंने बताया कि नए तालाबों पर काम करने के लिए गांव के लोगों से 500-500 रुपये का जल सहयोग भी लिया जाता है, जिसके बाद जेसीबी मंगवाकर तालाब खुदवाया जाता है. 

गांव के लोगों को रोजगार भी मिला

अडबाला गांव में रहने वाले तन सिंह ने बताया कि इन तालाबों को बनाने के लिए मनरेगा योजना की मदद भी मिली. इसके तहत गांव के लोगों को भी रोजगार मिला. उन्हें रोजाना करीब 250 रुपये दिए जाते हैं, जिससे उन्हें रोजगार के लिए दूसरे शहर में नहीं जाना पड़ता है. वे गांव में ही काम करते हैं और तालाब की देखभाल भी करते हैं. 


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उन्होंने बताया कि इसके अलावा तालाब के चारों तरफ दीवार भी बनाई गई है, जिससे बारिश के पानी से बहकर रेत वापस तालाब में न जाए. हालांकि, केंद्र सरकार की हर घर जल हर घर नल योजना का लाभ अभी इलाके को नहीं मिला है, जिसकी वजह से पानी के लिए लोगों की निर्भरता आज भी तालाबों पर ही है.

दूसरे गांवों में भी रंग लाई मुहिम

अडबाला गांव की जल सहेलियों की मुहिम अब सिर्फ अडबाला तक ही नहीं रह गई है. इन महिलाओं का ग्रुप अलग-अलग गांवों में अब तक 216 पुराने वॉटर सोर्सेज को ठीक कर चुका है. इसके अलावा 1000 वॉटर रिर्सोसेज को रिवाइव करने का काम किया जा रहा है.


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जल सहेलियों की इस मुहिम को देखते हुए राजस्थान की भजन लाल शर्मा सरकार भी उनकी मदद कर रही है. इसके तहत जल सहेलियों को ट्रेनिंग भी दी गई, जिसके बाद वे बारिश के पानी को बचाने में ज्यादा सक्षम हुई हैं और तालाबों की डिजिटल मॉनिटरिंग करने लगी हैं. 

क्या कहते हैं रिजॉर्ट संचालक?

तालाबों से पानी चोरी करने के आरोपों को लेकर जैसलमेर के कई रिजॉर्ट संचालकों से भी बात की गई. उन्होंने पहचान छिपाने की शर्त पर बताया कि इलाके में पानी की कमी के कारण उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ती है. उनका कहना है कि बारिश के पानी को बचाने और निजी जल स्रोत डिवेलप करने पर जोर देने की जरूरत है. इस दिशा में सरकार से मदद मिले तो हालात बेहतर हो सकते हैं.


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सरकार भी कर रही मदद

ग्राम विकास अधिकारी प्रेमा राम ने बताया कि जैसलमेर जैसे जिलों में पानी की किल्लत को देखते हुए राजस्थान में जल संरक्षण का अभियान काफी तेजी से चलाया जा रहा है. इसके तहत राज्य सरकार ने जुलाई 2025 में एक कैंपेन लॉन्च किया, जिसमें पानी की संकट से निपटने के लिए पुराने जल सोर्सेज को पुनर्जीवित करने का फैसला लिया गया. इस कैंपेन में जल सहेलियों को खास जगह दी गई है.


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यही वजह है कि ये महिलाएं अब 100 से ज्यादा गांवों में काम कर रही हैं. उन्होंने बताया कि अगर कोई तालाब से पानी चोरी करता है तो उसका सामान जब्त कर लिया जाता है. साथ ही, उसके खिलाफ पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराई जाती है.

ये भी पढ़ें: बर्बाद हो रहे पानी को बनाया जिंदगी का सहारा, 'आसमां' से जमीं पर उतारा जल

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट प्रॉमिस ऑफ कॉमन्स फेलोशिप के तहत प्रकाशित की गई है.

खबर कोई भी हो... कैसी भी हो... उसकी नब्ज पकड़ना और पाठकों को उनके मन की बात समझाना कुमार सम्भव जैन की काबिलियत है. मुहब्बत की नगरी आगरा से मैंने पत्रकारिता की दुनिया में पहला कदम रखा, जो अदब के शहर लखनऊ में परवान चढ़ा. आगरा में अकिंचन भारत नाम के छोटे से अखबार में पत्रकारिता का पाठ पढ़ा तो लखनऊ में अमर उजाला ने खबरों से खेलना सिखाया. 

2010 में कारवां देश के आखिरी छोर यानी राजस्थान के श्रीगंगानगर पहुंचा तो दैनिक भास्कर ने मेरी मेहनत में जुनून का तड़का लगा दिया. यहां करीब डेढ़ साल बिताने के बाद दिल्ली ने अपने दिल में जगह दी और नवभारत टाइम्स में नौकरी दिला दी. एनबीटी में गुजरे सात साल ने हर उस क्षेत्र में महारत दिलाई, जिसका सपना छोटे-से शहर से निकला हर लड़का देखता है. साल 2018 था और डिजिटल ने अपना रंग जमाना शुरू कर दिया था तो मैंने भी हवा के रुख पकड़ लिया और भोपाल में दैनिक भास्कर पहुंच गया. 

झीलों के शहर की खूबसूरती ने दिल और दिमाग पर काबू तो किया, लेकिन जरूरतों ने वापस दिल्ली ला पटका और जनसत्ता में काफी कुछ सीखा. यह पहला ऐसा पड़ाव था, जिसकी आदत धारा के विपरीत चलना थी. इसके बाद अमर उजाला नोएडा में करीब तीन साल गुजारे और अब एबीपी न्यूज में बतौर फीचर एडिटर लोगों के दुख-दर्द और तकलीफ का इलाज ढूंढता हूं. करीब 18 साल के इस सफर में पत्रकारिता की दुनिया के हर कोने को खंगाला, चाहे वह रिपोर्टिंग हो या डेस्क... प्रिंटिंग हो या मैनेजमेंट... 

काम की बात तो बहुत हो चुकी अब अपने बारे में भी चंद बातें बयां कर देता हूं. मिजाज से मस्तमौला तो काम में दबंग दिखना मेरी पहचान है. घूमने-फिरने का शौकीन हूं तो कभी भी आवारा हवा के झोंके की तरह कहीं न कहीं निकल जाता हूं. पढ़ना-लिखना भी बेहद पसंद है और यारों के साथ वक्त बिताना ही मेरा पैशन है. 

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