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टीबी से लड़ना आसान, सालों-साल दवा खाने से मिलेगी मुक्ति, साइंटिस्ट को मिली बड़ी कामयाबी

एमडीआर-टीबी के मरीजों के लिए खुशखबरी है. अब इन्हें सालों तक दवाई नहीं खानी पड़ेगी क्योंकि साइंटिस्ट ने एक दूसरा तरीका निकाल लिया है.

Multi-Drug Resistant Tuberculosis: एमडीआर-टीबी के मरीजों के लिए एक खास खबर है, जिसे जानकर इसका हर मरीज खुश जरूर हो जाएगा. जैसा कि आपको पता है टीबी सबसे पहले फेफड़ों को अपने चपेट में लेता है और फिर फेफड़ों में गंभीर इंफेक्शन हो जाता है. हाल ही में हुए एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि बेडाक्विलाइन दवा इस इंफेक्शन को ठीक करने में कारगर है. और यह मरीज को ठीक करने में टाइम भी कम लेता है.

'यूनियन वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस 2022' में एमडीआर-टीबी को लेकर यह घोषणा कि गई 'द लैंसेट' में टीबी से संबंधित आर्टिकल पब्लिश किए गए हैं जिसमें बताया कि टीबी के मरीजों को अब सालों तक दवाई नहीं खानी पड़ेंगी क्योंकि अब एक नया दवा खोज निकाल लिया गया है. जिसमें मरीज को सिर्फ 9 महीने या 6 महीने के कोर्स में ठीक कर दिया जाएगा. इलाज करने का यह नया तरीका कम खर्चीला है. दूसरी इससे मरीजों के पॉकेट पर भी भी ज्यादा असर नहीं पड़ेगा. टीवी के इलाज में काफी ज्यादा पैसे खर्च होते हैं वह भी कम हो जाएंगे. देश के दूसरे स्वास्थ्य विशेषज्ञ का मानना है कि यह रिसर्च इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. दूसरे देश के स्वास्थ्य विशेषज्ञ भारत में एमडीआर-टीबी मरीजों की बढ़ती संख्या पर चिंता जाहिर कर चुके हैं. 

कैसे कामयाब हुआ ग्लोबल रिसर्च?

कई देशों में इस दवा का शॉर्ट टर्म रेजिम का एक्जामिन किया गया साथ ही यह जानने की कोशिश की गई कि यह लंग्स इंफेक्शन में कितना कारगर है. इस रिसर्च में पूरा फोकस  यह था कि बेडाक्विलाइन कम समय में एमडीआर-टीबी पर कितना असर करती है.  इथियोपिया , जॉर्जिया (32), भारत (148), मोल्दोवा (63), मंगोलिया (130), दक्षिण अफ्रीका (92), और युगांडा (56) के टीबी मरीजों पर क्लिनिकल ट्रायल किया गया यह शॉर्ट टर्म दवा का रेजिम एग्जामिन किया गया. इन मरीजों पर 6 और 9 महीने का क्लिनिकल ट्रायल किया गया. जिसमें पता लगाया कि यह दवाई कितने दिन में अपना असर करता है. 

रिसर्च क्या कहती हैं?

रिसर्च में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि बेडाक्विलाइन दवाई की दो सीरीज चलेगी. जिसके पहले रेजिम में आपको 9 महीने दवाई खानी है. उसके बाद 6 महीने 8 सप्ताह आपको इंजेक्शन लेना है. यह भी कहा गया कि नौ महीने दवा खाने के मुकाबले इंजेक्शन लेने से ज्यादा फायदा मिलेगा. इससे 82.7 प्रतिशत मरीजों के ठीक होने के आसार बढ़ जाते हैं.

बेडाक्विलाइन और दो महीने की शॉर्ट टर्म की इंजेक्शन खाने वाले दवाई के मुकाबले में ज्यादा असरदार है. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के रिसर्चर डॉ रूथ गुडॉल कहा- रिफाम्पिसिन दवा टीबी बीमारी की रोकथाम करने में काफी मददगार है. 

एमडीआर-टीबी का इलाज चुनौतीपूर्ण क्यों है? 

टीबी बैक्टीरिया के कारण होता है. बीमारी का पता चलते ही आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन की दवा दी जाती है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक टीबी के शुरुआती इलाज में आइसोनियाजिड और रिफैम्पिसिन दवा ठीक से काम नहीं करती तो फिर सेकेंड लाइन की दवा दी जाती है जिसका कोर्स 9 महीने से लेकर 20 महीने तक का होता है.

यह दवाएं महंगी और शरीर के लिए हानिकारक भी है. 2019 का आंकड़ा देखें तो 60 प्रतिशत मरीज टीबी की बीमारी से ठीक हो चुके हैं  साथ ही यह भी कहा गया है कि ज्यादातर टीवी के मरीज इंजेक्शन से ज्यादा टीबी की दवाई खाना पसंद करते हैं और इसी वजह से वह लंबे समय तक टीबी की दवाई खाते हैं जिसके काफी नुकसानदेह परिणाम भी है. 

भारत में टीबी की इस नई दवा को लेकर डॉक्टर्स का क्या कहना है?

WHO के मुताबिक, 1 करोड़ 6 लाख नए टीबी के मामलों में भारत का हिस्सा 28 प्रतिशत है. देश में टीबी से लड़ने के लिए ये दो दवा आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन पर भारतीय निर्भर करते हैं. मुंबई के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ विकास ओसवाल कहते हैं,'टीबी की ये दोनों दवा अलग- अलग मरीजों पर अलग तरह से असर करती है. इसी से पता चलता है कि टीबी की दवाई मरीज को कम समय देनी है या लंबे समय तक चलेगी. बीमारी से शरीर किस तरह से लड़ता है इसकी भी बहुत बड़ी भूमिका है. कई बार ऐसा भी होता है कि किसी मरीज को लॉन्ग टर्म इलाज एंड दवा की जरूरत है, तो हम उसे शॉर्ट टर्म कोर्स नहीं चला सकते हैं.

नेशनल टीबी एलिमिनेशन प्रोग्राम (वेस्ट ज़ोन) के जोनल टास्क फोर्स के चेयरमैन डॉ संजय गायकवाड़ के मुताबिक,'ये जो नई दवा आई है उससे टीबी के शॉर्ट टर्म इलाज में पैसे जरूर कम खर्च होंगे. लेकिन साथ ही हमें इस बात का भी पूरा ख्याल रखना होगा कि मरीज शॉर्ट टर्म से पूरी तरह से ठीक हो रहा है या नहीं. डॉ. गायकवाड़ कहते हैं,'टीवी के मरीजों को इस नई दवाई के आने के बाद लॉन्ग टर्म दवाई और इंजेक्शन न लेना पड़े ये फायदेमंद होगा. आगे वह कहते हैं कोरोना के बाद से हमें किसी भी बीमारी को लेकर थोड़ा सजग होने की जरूरत है.

कोविड महामारी ने हमें बहुत बड़ा सबक दिया है कि जैसे कोविड को फैलने से रोकने के लिए हम कुछ बातों का ख्याल रखते थे या अभी भी रखते हैं वैसे ही टीवी के मरीजों के संपर्क में आए व्यक्तियों की स्क्रीनिंग होनी चाहिए. ऑफिस घर या फैमिली में ही क्यों न हो. अगर आपके आसपास टीबी का कोई मरीज है और आप उसके कॉन्टैक्ट में आए तो जरूरी है एक बार हॉस्पिटल जाकर स्क्रीनिंग जरूर करवाएं.'

टीबी की बीमारी के लिए सरकारों को नियम- कानून बनाने चाहिए

द यूनियन के अध्यक्ष और डब्लूसीओएलएच के चेयरमैन गाइ मार्क्स कहते हैं,'आज के समय में टीबी की बीमारी पूरी दुनिया के लिए एक समस्या बन गई है. इस बीमारी के लिए अच्छी हाई क्वालिटी की दवाई, कुछ नियम- कानून बनाने की आवश्यकता है.

कोविड से पहले टीबी ऐसी बीमारी है जो एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलती है. कोविड कीे तुलना में इस बीमारी ने अधिक लोगों की जान ली है. इस बीमारी से पिछले एक साल में 10 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. वहीं हर साल एक करोड़ लोग इस बीमारी के चपेट में आ जाते हैं. ऐसे में जरूरी है कि एमडीआर-टीबी के मरीजों के लिए कुछ नियम कानून बनने चाहिए. जिसकी वजह से इस बीमारी का खतरा रोका जा सके. 

ये भी पढ़ें: Cancer Study: सिगरेट पीने के शौकीन हैं तो स्मॉल सेल लंग कैंसर से जरा संभलकर रहिए

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