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Surrogacy Myths : सरोगेसी से जुड़े इन मिथ्स की जान लें सच्चाई, बिना जाने भरोसा करना है बेवकूफी

सरोगेसी के जरिए माता-पिता बनने की सोच रहे हैं लेकिन, इससे जुड़े मिथ्स को लेकर परेशान हैं तो आज ये लेख आपकी मदद करने वाला है. जाने क्या है सच्चाई. 

Surrogacy Myths: साल 2022 में सरोगेसी को खूब गूगल किया गया. सरोगेसी को आम भाषा में किराए की कोख भी कहा जाता है. दरअसल, जब कपल किसी कारण से बच्चा पैदा करने में सक्षम नहीं होते या उन्हें कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी है तो वे सरोगेसी के जरिए माता-पिता बनते हैं. सरोगेसी को लेकर कई सोशल टैबू और मिथ्स भी हैं. अगर कोई कपल सरोगेसी ऑप्ट करने की सोचता है तो समाज में चल रहे मिथ्स को सुनकर वो डर जाता है और इससे बचने लगता है. आज इस लेख के माध्यम से जानिए सरोगेसी से जुड़े कुछ कॉमन मिथ्स और इनकी सच्चाई. 

सरोगेसी को लेकर ये हैं कुछ कॉमन मिथ्स

सरोगेट मदर ही हमेशा बच्चे की बायोलॉजिकल मां होती है

सरोगेसी को लेकर ये एक सबसे बड़ा मिथ है. ऐसा जरूरी नहीं है कि सरोगेट मदर ही हमेशा बच्चे की बायोलॉजिकल मदर हो. सरोगेट मदर बच्चें की मां तब कहलाती है जब ट्रेडिशनल सरोगेसी को ऑप्ट किया गया हो. इसमें पिता के शुक्राणु को सेरोगेट मदर के अंडाणु से मिलाया जाता है. जबकि जेस्टेशनल सरोगेसी में माता-पिता के शुक्राणु और अंडाणु को सरोगेट मदर की कोख में रखा जाता है. इस स्थिति में माता-पिता वही होते हैं जो सरोगेसी को ऑप्ट करते हैं.

सरोगेसी उन महिलाओं के लिए है जो अपना फिगर मेंटेन रखना चाहती हैं

नेशनल सेंटर फॉर बायो टेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन के अनुसार, अधिकांश महिलाएं सरोगेसी का विकल्प तब चुनती हैं जब वह बच्चा पैदा करने में सक्षम नहीं होती. गर्भावस्था और मां बनना एक व्यक्तिगत निर्णय है. ये कहना बिल्कुल गलत है कि सरोगेसी केवल वहीं महिलाएं चुनती हैं जो अपना फिगर मेंटेन रखना चाहती हैं. सरोगेसी का विकल्प अधिकतर कपल तब चुनते हैं जब वे बच्चे पैदा करने में सक्षम नहीं होते या किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या से जूझ रहे होते हैं.

सरोगेसी सिर्फ अमीरों की बातचीत

कई लोग मानते हैं कि सरोगेसी सिर्फ अमीर लोगों के लिए है जोकि बिल्कुल गलत है. सरोगेसी का खर्च निर्धारित नहीं है. ये कम या ज्यादा दोनों हो सकता है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि सरोगेट मदर की देखभाल, हॉस्पिटल का खर्च  और सरोगेट मदर की फीस आदि सबकुछ क्या बैठता है.

बच्चे से नहीं बनते संबंध

इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि गर्भावस्था मां और बच्चे के बीच एक अनोखा बंधन बनाती है. लेकिन, इसका मतलब ये नहीं है कि सरोगेसी के जरिए पैदा हुए बच्चे से संबंध बनाना माता-पिता के लिए मुश्किल होता है. बच्चा जब सरोगेसी के जरिए पैदा हो जाता है तो उसे त्वचा से त्वचा के संपर्क के लिए माता-पिता को सौंप दिया जाता है और यहीं से धीरे-धीरे संबंध बनना शुरू हो जाता है.


सरोगसी में संबंध बनाना है जरूरी

एक कॉमन मिथ ये भी है कि सरोगेसी में संबंध बनाना जरूरी होता है जोकि सही नहीं है. दरअसल, आईवीएफ तकनीक के जरिए माता-पिता के स्पर्म और शुक्राणु को सरोगेट मदर के यूट्रस में डाला जाता है. इसमें संबंध बनाने जैसी कोई बात नहीं है. 

कोई भी बन सकती है सरोगेट मदर

दरअसल, सरकार ने सरोगेसी के लिए कुछ नियम बनाए हैं और इसके लिए कुछ मेडिकल कंडीशन भी है. कोई महिला तभी सरोगेट मदर बन सकती है जब उसकी उम्र 35 से कम हो, विवाहित और उसका 1 बच्चा पहले से हो.


सरोगसी 100% कारगर 

जरूरी नहीं है कि सरोगेसी 100% कारगर हो. पुरुष के स्पर्म और महिला के शुक्राणु की गारंटी नहीं दी जा सकती. क्योकि यही तय करते है कि बच्चा कैसा होगा. अगर दोनों में से किसी के स्पर्म और शुक्राणु में कोई कमी होती है तो बच्चें पर इसका असर पड़ता है. हालांकि आईवीएफ तकनीक के जरिए 95% तक ये कारगर साबित होती है.

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