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2023 था जलवायु संकट से बचाव में मानवता की सामूहिक नाकामी का वर्ष, लेकिन उम्मीदें अभी हैं बाकी

साल की शुरुआत ओजोन लेयर को बचाने के लिए किये गए प्रयासों पर अमेरिकन मेट्रोलोजिकल सोसाइटी के एक रिपोर्ट से हुई, जिसके अनुसार ओजोन परत में वृद्धि देखि जा रही है, बल्कि जल्द ही यह पुराने स्तर पर होगी.

पिछला वर्ष पृथ्वी के लिए काफी कठिन रहा है. अन्य सालों की तरह तीन प्रमुख ग्रहीय संकटों जलवायु परिवर्तन, प्रकृति और जैव विविधता का विनाश और प्रदुषण और मानव जनित कचरों को केंद्र में रख कर सालों भर गतिविधियों का दौर चलता रहा. छिटपुट अच्छी खबरों के अलावा पृथ्वी के तापमान में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गयी, प्रकृति के स्वास्थ में गिरावट बदस्तूर जारी रही है और मानव जनित प्रदूषण और कूड़ा-कचरा का दायरा ना सिर्फ बढ़ा, बल्कि लाखों जीवन को ग्रस भी लिया. हालांकि, आदत के अनुरूप जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से जुड़े मसलो पर हुए कई बैठको, समझौतों, आम सहमतियो के नतीजों को ‘ना भूतो न भविष्यति’, मील का पत्थर और ऐतिहासिक बताने में कोई कसार नहीं छोड़ी गयी, पर समय की जरुरत और महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए जरुरी उपादानो के आधार पर देखे तो साल भर के घोंघे जैसे सुस्त चाल वाली इन गतिविधियों को मेढक की ऊँची छलांग दिखाने की कवायद का साल रहा है साल 2023.

बढ़ रही है जागरूकता, पर चाल धीमी

ये बात जरुर है कि अंतराष्ट्रीय उलझाव, गुटबंदी, आर्थिक और क़ानूनी दाव-पेंच के बीच घोंघे की गति से ही सही कुछ तो बात हुई, जागरूकता आयी, वैश्विक विमर्श में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से जुड़े मसले तो प्रमुखता पाए. ये बात तो स्पष्ट हो गयी की पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्यों के आईने में आठ साल बीत जाने के बाद भी कथनी और करनी में ना सिर्फ अंतर है बल्कि ये अंतर सालों-साल और तेजी से बढ़ भी रहा.  साल की शुरुआत ओजोन लेयर को बचाने के लिए किये गए प्रयासों पर अमेरिकन मेट्रोलोजिकल सोसाइटी के एक रिपोर्ट से हुई, जिसके अनुसार ना सिर्फ ओजोन परत में वृद्धि देखि जा रही है बल्कि अगले चार दशक में परत अपने मूल स्वरूप (साल 1980 के स्तर को) पा लेगी.,ऐसा मोंट्रियल प्रोटोकॉल और किगाली संशोधन के सफल क्रियान्वयन से संभव हो पाया, जिसके तहत ओजोन परत का खात्मा करने वाले पदाथो का उपयोग 99% तक कम हो पाया. मोंट्रियल प्रोटोकॉल को अब तक का एक मात्र और सबसे सफल अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण समझौता माना जाता है, जिसको ले कर न सिर्फ वैश्विक स्तर पर आम सहमति बनी बल्कि लक्ष्य को हासिल भी कर लिया गया. 

जलती धरती और तपा सूरज

पिछले साल के तापमान का आंकड़ा हमारे सामने है, मई से सबसे गर्म महीने बनने का जो रिकॉर्ड शुरू हुआ, वो 22 दिसम्बर तक जारी रहा. मौसम विज्ञानी  इस बात से सहमत हैं कि  रिकॉर्ड रखने की शुरुआत के बाद से 2023 पृथ्वी ग्रह पर सबसे गर्म वर्ष रहा है. हालांकि शोध साल 2023 को पिछले 120000 साल का सबसे गर्म साल होने की ओर इशारा कर रहे हैं. लगभग हर महाद्वीप पर, हर मौसम में और लगभग हर महीने का, सतह के तापमान का पिछला सारा रिकॉर्ड टूट गया.  और यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि जलवायु परिवर्तन का युग कोई दूर का खतरा नहीं है, बल्कि अब हमारे सामने है. थोड़े समय के लिए तो औसत तापमान पेरिस समझौते के लक्ष्य 1.5°C को भी पर कर गया, कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज के अनुसार यहां नवम्बर में तो कम से कम दो दिन का तापमान पूर्व औद्योगिक औसत तापमान से 2°C ज्यादा दर्ज किया गया.  ग्रीनलैंड से लेकर अंटार्कटिका, यूरोप, जापान से लेकर चीन तक झुलसाने वाले गर्मी की खबरों के बीच जापान की मौसम एजेंसी के मुताबिक पिछला साल पिछले तीस साल के औसत तापमान से 0.53°C ज्यादा रहा. और तो और पिछले सबसे गर्म साल 2016 के मुकाबले बीता वर्ष 0.35°C यानि एक डिग्री के तिहाई हिस्से अधिक गरम रहा है. हम तेजी से 1.5°C के लक्ष्य के नजदीक जा रहे है, फ़िलहाल हमारी पृथ्वी पूर्व औधोगिक तापमान से 1.2°C तक गर्म हो चूकी है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अगर जलवायु संकट के प्रति सरकारे मौजूदा गति से प्रयास करती रहीं तो सदी के अंत तक निर्धारित लक्ष्य से बहुत दुर तापमान 3°C तक बढ़ चुका रहेगा.

बिगड़ती वैश्विक जलवायु

तापमान बढ़ने के कारण वैश्विक जलवायु का संतुलन बड़े स्तर पर बिगड़ता हुआ दिखा और नतीजा यह कि बीता साल मानव जनित जलवायु आपदाओं का वर्ष रहा. सारे महाद्वीप चक्र्वातीय तूफ़ान, बाढ़, सुखाड़, जंगल की आग, गर्मी और लू, शहरी और क्षेत्रीय वायु प्रदुषण, अति वृष्टि और  शहरी बाढ़ की चपेट में रहे और बड़े स्तर का आर्थिक नुकसान झेला. एक तरीके से जलवायु संकट के विमर्श का उत्तर और दक्षिण का विभाजन ख़त्म होता प्रतीत हुआ, जलवायु संकट से पारम्परिक रूप से जलवायु संकट से कम प्रभावित होने वाले यूरोप, अमेरिका, कनाडा ने अभूतपूर्व जंगल की आग, गर्मी, बाढ़, सुखाड़ का सामना किया. अकेले कनाडा में 37 मिलियन हेक्टेयर जंगल जल कर भस्म हो गया. अफ्रीका (लीबिया, केन्या और सोमालिया), एशिया (चीन) से लेकर अमेरिका (पेरू) तक बाढ़ का कहर तो कहीं चक्रवातीय तूफान (जिसमे छोटे टापू देश वनातु, गुआम भी शामिल है) का कहर जारी रहा. डैनिअल, ताकसुरी सहित चक्रवाती तुफानो एक बढ़ी हुई श्रृंखला से डो चार होना पड़ा.  दोनों ध्रुवो के गर्म होने का दौर जा सिर्फ बदस्तूर जारी रहा बल्कि उसमे महत्वपूर्ण इजाफा हुआ. अंटार्टिका में ब्राज़ील के क्रिस्फेरा-2 लेबोरेट्री ने गर्मी और सर्दी दोनों मौसम का सबसे कम समुद्री बर्फ रिकॉर्ड किया. यहाँ तक कि शर्दी के मौसम में स्नो फाल के बदले बारिश देखा गया. अनुमान है कि मौजूदा साल शायद बीते साल से भी ज्यादा जलवायु आपदा प्रभावित हो.

तापमान का रिकॉर्ड डरावना

अब तक तापमान का रिकॉर्ड डिग्री के दसवे हिस्से के आस पास से टूटता रहा है, पर 2023 में पिछले सबसे गर्म साल 2016 के तापमान को 0.35°C (डिग्री के एक तिहाई हिस्से) के बड़े अंतर से पीछे छोड़ देना, एक भयावह स्थिति है. तभी तो नासा के पूर्व वैज्ञानिक जेम्स हानसेन मानते हैं कि ना अब तक सिर्फ सरकारे जलवायु संकट के प्रति असजग रहीं बल्कि इस साल जलवायु परिवर्तन की गति भी अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है. जलवायु संकट के लिए जीवाश्म इंधन का इस्तेमाल जिम्मेदार है इस बात को स्वीकार करने में तीन दशक लग गए जब कॉप-28 में जा कर जीवाश्म इंधन पर रोक की आधी-अधूरी बात की गयी. अब ये साफ है कि “साल 2023 मानवता की सामूहिक नाकामी के जग जाहिर होने के साल के रूप में याद किया जायेगा”.

नए साल में भी वही गति जारी है और जनवरी के पहले सप्ताह में ग्रीनहाउस गैस का स्तर सर्वकालिक उच्चतम स्तर 420 पीपीएम पाया गया है और चूंकि मौजूदा साल वैश्विक बुखार यानि अल नीनो का है तो तापमान में और बढ़ोतरी अवश्यम्भावी ही है तभी तो संयुक्त राष्ट्र भी मान चुका है कि  "इसका कोई अंत नहीं दिख रहा है." एक क्रूर तथ्य यह है कि आने वाले सालों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन शून्य भी हो जाये, तब भी कुछ दशकों तक पृथ्वी का तापमान बढ़ता ही रहेगा. मान लीजिए, अब से 20 साल बाद, 2023 का झुलसा देने वाला वर्ष संभवतः तब के मुकाबले ठंडा और आरामदायक दिखाई देगा. तभी तो एक ताजा  शोध के निष्कर्ष में आशंका जताई गयी है कि पृथ्वी एक ऐसे दौर की तरफ बढ़ रही है जहां पिघलते ग्लेशियर, गर्माते समुद्र, बड़े स्तर पर बदलते समुद्री जलधाराएं, और सूखते जंगल एक ऐसे कासकेड बना देंगे जहा ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन कम करने के हमारे सारे प्रयास धरे के धरे रह जायेंगे.  

कुशाग्र राजेंद्र, एमिटी यूनिवर्सिटी हरियाणा में पर्यावरण विभागाध्यक्ष हैं. वे पर्यावरण के मुद्दे पर लगातार अलग-अलग मंचों पर लिखते रहते हैं. कुशाग्र राजेंद्र ने अपनी पढ़ाई जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन संस्थान यानी स्कूल ऑफ इनवॉयरनमेंटल स्टडीज से की है. वह वर्तमान में एमिटी यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम में पर्यावरण अध्ययन विभाग में पढ़ाते हैं. अपने खाली समय में कुशाग्र फोटोग्राफी और घूमने का शौक रखते हैं और उनके संग्रह में प्रकृति की बहुत अच्छी तस्वीरें हैं. कुशाग्र मूलतः बिहार के रहने वाले हैं.
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