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घड़ी के विज्ञापनों में 10:10 ही क्यों बजते हैं, सबसे पहले किसने और क्यों शुरू किया था यह काम?

घड़ी के विज्ञापनों में हमेशा 10:10 का समय दिखने के पीछे एक सोची-समझी मार्केटिंग और मनोवैज्ञानिक रणनीति है. यह सुइयों की स्थिति ब्रांड लोगो को सही ढंग से उभारती है, घड़ी के फीचर्स साफ दिखाती है.

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  • पहले 8:20 समय 'उदास चेहरा' दिखाता था, जिसे बदलकर 10:10 किया गया.

चाहे अखबार का कोई पन्ना हो, टीवी का कोई कमर्शियल या फिर किसी बड़े मॉल का चमचमाता होर्डिंग, आपने कभी न कभी घड़ियों के विज्ञापनों पर गौर जरूर किया होगा. अगर ध्यान दिया हो, तो दुनिया का कोई भी ब्रांड हो- चाहे रोलेक्स, टाइटन या टाइमैक्स- सभी के विज्ञापनों में घड़ी के भीतर हमेशा 10 बजकर 10 मिनट का ही समय दिखाई देता है. पहली बार देखने पर यह महज एक इत्तेफाक लग सकता है, लेकिन सच यह है कि पिछले 100 सालों से पूरी दुनिया में जानबूझकर इसी एक खास समय को विज्ञापनों के लिए सेट किया जा रहा है. इसके पीछे छिपे हैं कुछ बेहद दिलचस्प व्यावहारिक, सौंदर्यपरक और मनोवैज्ञानिक राज. 

ब्रांड लोगो को फ्रेम करने की कला

घड़ी निर्माताओं के लिए विज्ञापनों में सबसे जरूरी चीज अपने ब्रांड का नाम और लोगो दिखाना होता है. आमतौर पर किसी भी घड़ी का मुख्य लोगो या ब्रांड का नाम डायल के भीतर ठीक 12 अंक के नीचे या फिर 6 अंक के ऊपर की तरफ प्रिंट किया जाता है. जब घड़ी की सुइयां 10:10 की स्थिति में होती हैं, तो वे एक खूबसूरत V-शेप (वी-आकार) बनाती हैं. यह आकार 12 के नीचे लिखे ब्रांड के नाम को एक बेहतरीन फ्रेम की तरह घेर लेता है. इससे ग्राहकों का ध्यान सीधे कंपनी के नाम पर जाता है और घड़ी के आकर्षक हैंड डिजाइन्स भी साफ नजर आते हैं.

घड़ी के फीचर्स का साफ दिखना

एक व्यावहारिक कारण यह भी है कि 10 बजकर 10 मिनट पर घड़ी का कोई भी महत्वपूर्ण हिस्सा एक-दूसरे के पीछे नहीं छिपता है. इस समय पर दोनों सुइयां अलग-अलग दिशाओं में होती हैं और कभी भी ओवरलैप नहीं करतीं. इसके अलावा, घड़ी के बाकी जरूरी फीचर्स, जैसे कि तारीख दिखाने वाली छोटी विंडो जो अक्सर 3, 6 या 9 अंक के पास होती है, पूरी तरह साफ और खुली दिखाई देती है. सुइयों की यह खास पोजीशन ग्राहकों को घड़ी का पूरा डायल, उसकी कारीगरी और सारे इंडेक्स बिना किसी रुकावट के एक ही नजर में साफ-साफ दिखा देती है.

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विज्ञापनों में छिपा मुस्कान का जादू

मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखें तो 10:10 का समय घड़ी के डायल पर एक हंसते हुए चेहरे या स्माइल जैसा लुक बनाता है. इसमें 10 पर मौजूद सुई बाईं आंख, 2 पर मौजूद सुई दाईं आंख और नीचे का हिस्सा एक खूबसूरत मुस्कान की तरह महसूस होता है. इंसानी दिमाग किसी भी मुस्कुराती हुई चीज को देखकर तुरंत सकारात्मक रूप से प्रभावित होता है. यही वजह है कि यह समय अवचेतन मन में घड़ी को ज्यादा फ्रेंडली, पॉजिटिव और आकर्षक बना देता है. जब लोग विज्ञापन में मुस्कुराती हुई घड़ी देखते हैं, तो उनके मन में उसे खरीदने की इच्छा अपने आप बढ़ जाती है.

क्या कहती है साइंटिफिक रिसर्च?

इस मनोवैज्ञानिक पहलू को साबित करने के लिए साल 2017 में एक बाकायदा वैज्ञानिक अध्ययन भी किया गया था. 'फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी' जर्नल में छपी इस रिसर्च के मुताबिक, 10:10 समय वाली घड़ियों को देखने वाले लोगों के भीतर अन्य समय के मुकाबले ज्यादा पॉजिटिव इमोशन्स यानी सकारात्मक भावनाएं देखी गईं. इस स्टडी में यह भी सामने आया कि खासकर महिलाओं में निर्जीव चीजों के भीतर इंसानी चेहरे के हाव-भाव ढूंढने की प्रवृत्ति ज्यादा होती है. यही कारण है कि यह मुस्कुराती हुई घड़ी महिलाओं को अपनी तरफ बहुत जल्दी और गहराई से आकर्षित कर लेती है.

इतिहास में उदास चेहरे की सुइयां

आपको जानकर हैरानी होगी कि हमेशा से विज्ञापनों में 10:10 का समय नहीं रखा जाता था. इस चलन से पहले ज्यादातर घड़ियों के ब्रांड्स अपने विज्ञापनों में 8:20 का समय सेट किया करते थे. हालांकि, 8 बजकर 20 मिनट पर भी दोनों सुइयां एक-दूसरे से बराबर दूरी पर होती थीं, लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या थी. इस पोजीशन में सुइयां नीचे की तरफ झुककर एक उदास चेहरा या रोता हुआ लुक (सैड फेस) बनाती थीं. विज्ञापनों में इस नकारात्मक और उदास लुक को बदलने के लिए ही बाद में कंपनियों ने समय में बदलाव करने का बड़ा फैसला लिया.

हैमिल्टन वॉच कंपनी ने की पहली शुरुआत

घड़ी की सुइयों को 10:10 पर सेट करने की इस अनोखी मार्केटिंग प्रैक्टिस की शुरुआत का पूरा श्रेय मशहूर हैमिल्टन वॉच कंपनी को दिया जाता है. साल 1926 में इस कंपनी के लिए काम करने वाली एक एडवरटाइजिंग एजेंसी के आर्ट डायरेक्टर ने पहली बार इस आइडिया को आजमाया था. उन्होंने पाया कि घड़ी को 8:20 के बजाय 10:10 पर रखने से प्रोडक्ट ज्यादा खूबसूरत और बिकने लायक दिखता है. हैमिल्टन की इस नई और सफल तरकीब को देखकर धीरे-धीरे दूसरी बड़ी कंपनियों ने भी अपनी पुरानी आदत को बदलना शुरू कर दिया.

इंडस्ट्री का परफेक्शन और ग्लोबल स्टैंडर्ड

साल 1950 के दशक तक आते-आते यह टाइमिंग पूरी घड़ी इंडस्ट्री का एक ऑफिशियल और ग्लोबल स्टैंडर्ड बन गई. टाइमैक्स जैसी दुनिया की दिग्गज और नामी कंपनियों ने भी अपने विज्ञापनों को 8:20 से हटाकर हमेशा के लिए 10:10 पर शिफ्ट कर लिया, क्योंकि उदास चेहरे को एक खुशहाल स्माइल में बदलना बिजनेस के लिहाज से ज्यादा फायदेमंद साबित हुआ. आज करीब 100 साल बीत जाने के बाद भी यह परंपरा पूरी दुनिया में उतनी ही मजबूती से कायम है. आज डिजिटल युग में भी घड़ियों के विज्ञापनों की दुनिया इसी 10:10 के सुनहरे नियम पर बखूबी चल रही है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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