क्यों आसानी से स्वीकारे नहीं जाते अफसरों के इस्तीफे, जानिए एक इस्तीफे से सरकार को कैसे होता है नुकसान
सरकारी सेवाओं में इस्तीफा देना जितना आसान दिखाई देता है, उसे स्वीकार किया जाना उतना ही मुश्किल होता है. नियमों के अनुसार सरकार किसी भी अफसर के इस्तीफे को तुरंत स्वीकारने के लिए बाध्य नहीं है.

उत्तर प्रदेश में हाल ही में सामने आया सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री इस्तीफे के मामले ने एक ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सरकारी अफसर के इस्तीफे इतनी आसानी से क्यों स्वीकार नहीं किए जाते हैं. दरअसल माघ मेले से जुड़ें विवाद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन और राजनीतिक बयान बाजी के बीच दिया गया यह इस्तीफा केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि संवैधानिक और राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है. रिपब्लिक डे के दिन अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा देकर प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी. उन्होंने न सिर्फ सरकार और यूजीसी से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक बयान दिए, बल्कि इस्तीफे के बाद राजनीति में जाने के भी संकेत दिए. इसके बाद यह सवाल चर्चा में आ गया कि अफसर के इस्तीफे आसानी से क्यों नहीं स्वीकारे जाते हैं और एक इस्तीफे से सरकार को कैसे नुकसान होता है.
अफसर के इस्तीफे को लेकर क्या कहते हैं सरकारी नियम?
अलंकार अग्निहोत्री का यह मामला उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक नियमावली 1999 के सीधे उल्लंघन का बताया जा रहा है. दरअसल बताया जा रहा है कि नियम 4 के तहत कोई भी सरकारी सेवक ऐसा आचरण नहीं कर सकता, जिससे सरकार की निष्पक्षता, गरिमा और विश्वसनीयता पर सवाल उठे. वहीं नियम 7 किसी भी तरह की राजनीतिक एक्टिविटी या समर्थन-विरोध पर साफ रोक लगाता है. इसके अलावा कई एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि सिविल सेवा में रहते हुए, सार्वजनिक आंदोलन धरना या राजनीतिक बयान देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला नहीं, बल्कि संवैधानिक पद की मर्यादा से जुड़ा विषय है. इस आधार पर विभागीय कार्रवाई और निलंबन को पूरी तरह कानूनी माना जा रहा है.
अफसर के इस्तीफे आसानी से क्यों नहीं स्वीकारे जाते?
सरकारी सेवाओं में इस्तीफा देना जितना आसान दिखाई देता है, उसे स्वीकार किया जाना उतना ही मुश्किल होता है. नियमों के अनुसार सरकार किसी भी अफसर के इस्तीफे को तुरंत स्वीकारने के लिए बाध्य नहीं है. यही कारण है कि कई मामलों में सालों तक इस्तीफे लंबित रहते हैं. वहीं पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन का मामला भी इसका एक बड़ा उदाहरण माना जाता है. दरअसल उन्होंने 2019 में इस्तीफा दिया था, लेकिन 6 साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने उसे स्वीकार नहीं किया. इस दौरान उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू हुई, जबकि बाद में वह मामला बंद हो गया.
इसके बावजूद उनका इस्तीफा लंबित ही रहा. इसके अलावा कई एक्सपर्ट्स के अनुसार नियमों में कोई तय समय सीमा नहीं है, जिसमें सरकार को इस्तीफा स्वीकार करना ही पड़े. वहीं सरकार चाहे तो किसी अफसर के रिटायरमेंट तक भी इस्तीफा मंजूर न करें. ऐसे में अफसर के पास अदालत जाने का ऑप्शन जरूर होता है, लेकिन नियमों के अनुसार जिम्मेदारी अफसर की ही मानी जाती है. यही वजह है कि कुछ अफसरों के इस्तीफे जल्दी स्वीकार हो जाते हैं, जबकि कुछ मामलों में वर्षों तक फाइलें अटकी रहती है.
एक इस्तीफे से सरकार को कैसे होता है नुकसान?
किसी अफसर का इस्तीफा सिर्फ एक पद खाली होने का मामला नहीं होता है. इससे सरकार की प्रशासनिक साख, निष्पक्षता और नियमों की समानता पर सवाल उठते हैं. जब एक जैसे हालात में कुछ अफसर के इस्तीफे जल्दी मंजूर हो जाते हैं और कुछ के नहीं, तो सिस्टम पर भी उंगली उठती है.
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