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Muslim Cap History: मुस्लिमों में कहां से आया गोल टोपी का कल्चर, जानिए किसने लगाई थी पहली टोपी?

मान्यताओं के अनुसार इस्लाम में टोपी पहनना अनिवार्य नहीं है. नमाज या कुरान की तिलावत के दौरान इसे जरूरी नहीं बताया है. हालांकि इसे सुन्नत माना जाता है यानी इसे अपनाना शिष्टाचार से जुड़ा माना जाता है.

Muslim Cap History:  दुनिया भर में अलग-अलग धर्म के लोग रहते हैं और हर धर्म की अपनी परंपराएं और पहनावे के तरीके होते हैं. इन्हीं परंपराओं में इस्लाम धर्म की परंपराएं भी शामिल है. वहीं इस्लाम धर्म में भी खास तौर पर सिर पर टोपी रखने की परंपरा की काफी मान्यता है. खासकर नमाज के दौरान पहनी जाने वाली गोल जालीदार टोपी इन मान्यताओं में शामिल है. वहीं मुसलमानों में पहनी जाने वाली टोपी को लेकर अक्सर लोगों के सवाल भी उठते हैं कि आखिर मुस्लिम समुदाय में यह टोपी पहनने की शुरुआत कहां से हुई और इसके पीछे क्या कारण है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि मुस्लिम में टोपी का कल्चर कहां से आया और किसने लगाई थी पहली टोपी.

दुनिया भर में कितनी है मुस्लिम आबादी?

अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो दुनियाभर में मुस्लिम समुदाय की संख्या करीब 1.9 अरब के आसपास है. आने वाले सालों में इसके बढ़ने का अनुमान भी लगाया जाता है. यही वजह है कि इस्लाम दुनिया के सबसे बड़े धर्मों में शामिल और इसकी परंपराएं भी वैश्विक स्तर पर दिखाई देती है.

इस्लाम में टोपी पहनाना परंपरा का हिस्सा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस्लाम में टोपी पहनना अनिवार्य नहीं है. नमाज या कुरान की तिलावत के दौरान इसे जरूरी नहीं बताया गया है. हालांकि इसे सुन्नत माना जाता है यानी इसे अपनाना अच्छा और शिष्टाचार से जुड़ा माना जाता है. नमाज के दौरान टोपी पहनाना सम्मान और सादगी का प्रतीक समझा जाता है. अगर कोई व्यक्ति बिना टोपी के नमाज पढ़ता है तो उसकी नमाज अमान्य नहीं होती है.

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कहां से आई सिर ढकने की परंपरा?

इतिहास के अनुसार सिर ढकने की परंपरा इस्लाम के शुरुआती दौर से जुड़ी मानी जाती है. बताया जाता है कि पैगंबर मोहम्मद के समय में सिर ढकना, सादगी और विनम्रता का प्रतीक था. हालांकि उस समय आज की तरह खास गोल टोपी का कोई निश्चित स्वरूप नहीं था, लेकिन सिर को ढकने की आदत धीरे-धीरे मुस्लिम समाज में एक परंपरा के रूप में विकसित हो गई. वहीं कुछ एक्सपर्ट्स यह भी मानते हैं कि इस परंपरा के पीछे भौगोलिक कारण भी रहे हैं. मिडिल ईस्ट की गर्मी और रेगिस्तानी इलाकों में सिर को धूप और गर्मी से बचाने के लिए लोग कपड़ा या टोपी पहनते हैं. समय के साथ यही आदत धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन गई.

किसने लगाई थी पहले टोपी?

दरअसल इस्लामी मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि पहले मोहम्मद पैगंबर मोहम्मद पगड़ी पहनते थे और अपने साथियों को भी पगड़ी पहनने के लिए प्रोत्साहित करते थे. इस्लाम के कई हदीसों में भी यह दर्ज है कि पैगंबर मोहम्मद को पगड़ी पहने हुए देखा गया था, जिसका पिछला सिर उनके कंधों के बीच लटका रहता था. वहीं माना जाता है कि हिजरी के आठवें वर्ष में मक्का के उद्घाटन के समय पैगंबर मोहम्मद ने शहर में प्रवेश करते समय काली पगड़ी पहनी थी. बाद में मदीना से पैगंबर के कई साथियों ने पीली पगड़ी पहनी थी. इसी के बाद धीरे-धीरे टोपी और पगड़ी इस्लाम के महत्व के रूप में सामने आई. आपको बता दें कि मुस्लिम समाज में पहनी जाने वाली टोपी एक जैसी नहीं होती है. अलग-अलग देश और क्षेत्र में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं. 

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कविता गाडरी बीते कुछ साल से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी हुई है. राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाली कविता ने अपनी पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स और अपेक्स यूनिवर्सिटी जयपुर से बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में की है. 
पत्रकारिता में अपना सफर उन्होंने राजस्थान पत्रिका से शुरू किया जहां उन्होंने नेशनल एडिशन और सप्लीमेंट्स जैसे करियर की उड़ान और शी न्यूज के लिए बाय लाइन स्टोरी लिखी. इसी दौरान उन्हें हेलो डॉक्टर शो पर काम करने का मौका मिला. जिसने उन्हें न्यूज़ प्रोडक्शन के लिए नए अनुभव दिए. 

इसके बाद उन्होंने एबीपी नेटवर्क नोएडा का रुख किया. यहां बतौर कंटेंट राइटर उन्होंने लाइफस्टाइल, करंट अफेयर्स और ट्रेडिंग विषयों पर स्टोरीज लिखी. साथ ही वह कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी लगातार सक्रिय रही. कविता गाडरी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में दक्ष हैं. न्यूज़ राइटिंग रिसर्च बेस्ड स्टोरीटेलिंग और मल्टीमीडिया कंटेंट क्रिएशन उनकी खासियत है. वर्तमान में वह एबीपी लाइव से जुड़ी है जहां विभिन्न विषयों पर ऐसी स्‍टोरीज लिखती है जो पाठकों को नई जानकारी देती है और उनके रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़ती है.

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