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मुंह में 4000 नुकीले दांत, फिर भी शिकार को साबुत क्यों निगल जाता है मगरमच्छ?

मगरमच्छ भले ही कितना ही खतरनाक जानवर क्यों न हो, लेकिन वह कभी भी अपने शिकार को चबाकर नहीं खा सकता है. भोजन को चबाने में असमर्थ होने के कारण यह शिकारी बड़े जानवरों के टुकड़े सीधा निगलता है.

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  • मगरमच्छ के नुकीले दांत सिर्फ शिकार को पकड़ने के लिए होते हैं.
  • यह जीवनभर दांत बदलता, शिकार को पूरा निगल जाता है.
  • बड़े शिकार को 'डेथ रोल' से फाड़कर, पत्थर निगलता है.
  • पानी में शिकार रखता, पक्षी इसके दांत भी साफ करते.

जलीय जीवों की दुनिया में मगरमच्छ को सबसे खतरनाक और बेरहम शिकारी माना जाता है. नदी या तालाब के किनारे घात लगाकर बैठने वाले इस जीव की एक झलक ही इंसानों से लेकर बड़े-बड़े जानवरों को कंपाने के लिए ही काफी है. इस जीव की बनावट और इसके शिकार करने का तरीका वैज्ञानिकों को हमेशा हैरान करता आया है. सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि जिस जानवर के मुंह में हजारों बेहद पैने और मजबूत दांत होते हैं, वह अपने शिकार को चबाने के बजाय पूरा का पूरा जिंदा या साबुत ही निगल जाता है. इसके इस अजीब बर्ताव के पीछे एक बेहद खास प्राकृतिक वजह छिपी हुई है. चलिए आज इसके बारे में जान लेते हैं. 

दांतों की संख्या और अनोखी बनावट

जब हम एक वयस्क मगरमच्छ के जबड़े को देखते हैं, तो उसमें एक समय में 60 से लेकर 110 तक बेहद नुकीले दांत दिखाई देते हैं. उदाहरण के तौर पर नाइल क्रोकोडाइल प्रजाति के मुंह में औसतन 64 से 68 दांत पाए जाते हैं. ये सभी दांत देखने में बिल्कुल कोन यानी शंकु के आकार के, पैने और बेहद मजबूत होते हैं. मगरमच्छ के मुंह की यह पूरी बनावट केवल शिकार को मजबूती से पकड़ने और उसे अपनी जगह से हिलने न देने के लिए तैयार की गई है, न कि उसे इंसानों या गाय-भैंस की तरह बारीक चबाने के लिए. 

जीवनभर दांत बदलने का अनोखा चक्र

इस जीव के बारे में एक और बेहद हैरान करने वाला वैज्ञानिक सच यह है कि मगरमच्छ 'पॉलीफायोडॉन्ट' जीव होते हैं. इसका सीधा सा मतलब यह है कि इंसानों की तरह इनके दांत जीवन में सिर्फ दो बार नहीं उगते, बल्कि पूरे जीवनकाल में बार-बार टूटते और नए आते रहते हैं. यदि शिकार के दौरान मगरमच्छ का कोई दांत टूट जाए या खराब हो जाए, तो उसके ठीक नीचे एक नया दांत तुरंत उगने के लिए तैयार रहता है. आंकड़े बताते हैं कि एक मगरमच्छ अपने पूरे जीवनकाल में लगभग 3000 से 4000 तक दांत बदल डालता है.

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जबड़े की बनावट और चबाने की मजबूरी

हजारों दांत बदलने की इस क्षमता के बाद भी मगरमच्छ चाहकर भी भोजन को चबा नहीं सकता है. इसके पीछे उसके जबड़े का एक अजीब प्राकृतिक जोड़ जिम्मेदार है. मगरमच्छ का जबड़ा इंसानों की तरह दाएं-बाएं या गोल नहीं घूम सकता, यह केवल ऊपर और नीचे की तरफ ही खुल या बंद हो सकता है. किसी भी भोजन को मुंह में चबाने के लिए जबड़े का साइड में घूमना बेहद जरूरी होता है. इसी जैविक मजबूरी के कारण मगरमच्छ छोटे शिकार को तो एक बार में सीधे पूरा का पूरा निगल जाता है. 

डेथ रोल से बड़े शिकार के टुकड़े

जब मगरमच्छ के सामने कोई बड़ा जानवर जैसे हिरण या गाय-भैंस होती है, तो उसे निगलने के लिए वह एक खूंखार तरकीब अपनाता है. वह पानी के भीतर शिकार को अपने जबड़े में जकड़कर तेजी से गोल-गोल घूमता है, जिसे विज्ञान की भाषा में 'डेथ रोल' कहा जाता है. इस रोल की मदद से और पानी के तेज बहाव के दबाव से वह बड़े शिकार के मांस को फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर देता है. जब शिकार बड़े-बड़े हिस्सों में बंट जाता है, तो मगरमच्छ उन टुकड़ों को बिना चबाए सीधा पेट के अंदर गटक जाता है. 

भोजन पचाने के लिए पत्थर का सहारा

बिना चबाए पेट में गए मांस के इन भारी-भरकम टुकड़ों को पचाने के लिए मगरमच्छ एक और अनोखा रास्ता चुनता है. वह जानबूझकर नदी या तालाब के किनारे पड़े छोटे-छोटे कंकड़ और पत्थरों को निगल लेता है. ये निगले गए पत्थर उसके पेट (गिजार्ड) में जाकर जमा हो जाते हैं और वहां चक्की के पत्तों की तरह काम करते हैं. जब पेट की मांसपेशियां हिलती हैं, तो ये पत्थर मांस के कड़े टुकड़ों और हड्डियों को पीसकर महीन बना देते हैं. ये कंकड़ तब तक पेट में रहते हैं जब तक बहुत घिसकर पुराने न हो जाएं. 

पानी के नीचे शिकार को होल्ड करना

मगरमच्छ की शिकार करने की रणनीति में सब्र का बहुत बड़ा योगदान होता है. कई बार वह अपने शिकार को मारने के बाद तुरंत नहीं खाता, बल्कि उसे पानी के नीचे किसी भारी चीज या चट्टान के नीचे घंटों तक दबाकर रख सकता है. ऐसा करने से शिकार का मांस थोड़ा नरम हो जाता है जिसे बाद में टुकड़ों में तोड़ना और निगलना आसान हो जाता है. यह खूंखार शिकारी पानी के भीतर बिना सांस फुलाए अपने शिकार को लंबे समय तक होल्ड रखने की गजब की क्षमता रखता है.

पक्षी है मगरमच्छ का डेंटिस्ट

इस जानलेवा शिकारी की जिंदगी का एक बहुत ही शांत और खूबसूरत पहलू भी है, जो इसके दांतों की सफाई से जुड़ा है. मगरमच्छ के दांतों के बीच फंसे मांस के सड़ते हुए टुकड़ों को साफ करने के लिए एक छोटी सी चिड़िया (प्लवर बर्ड) बिना किसी डर के उसके खुले हुए मुंह के अंदर घुस जाती है. वह चिड़िया मगरमच्छ के मसूड़ों और दांतों के बीच से बचे हुए मांस को चुन-चुनकर खाती है. हैरानी की बात यह है कि मगरमच्छ इस दौरान अपने दांत साफ कराने के बदले में उस छोटी सी चिड़िया को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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