ब्रह्मोस मिसाइल को हवा में क्यों नहीं रोक सकता कोई भी देश, जानें किस टेक्नोलॉजी पर यह करती है काम?
हाल ही में भारत ने वियतनाम के साथ ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात का बड़ा समझौता किया है, जबकि इंडोनेशिया के साथ भी बातचीत अंतिम दौर में है. आइए जानें कि क्यों इसको हवा में नहीं मारा जा सकता है.

- ब्रह्मोस जमीन, हवा, पानी तीनों जगह से दागी जा सकती.
वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की ताकत लगातार बढ़ती जा रही है और इसका सबसे बड़ा प्रतीक ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनकर उभरी है. हाल ही में सिंगापुर में आयोजित हुए बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम शांग्री-ला डायलॉग के दौरान भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने एक बेहद अहम और बड़ा खुलासा किया है. उन्होंने बताया कि भारत ने वियतनाम को ब्रह्मोस मिसाइल बेचने के लिए एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता पूरा कर लिया है. इस बड़े सौदे को लेकर दोनों देशों के बीच साल 2012 से ही लंबी बातचीत चल रही थी, जो अब जाकर एक सफल मुकाम पर पहुंच चुकी है.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी धमक
भारत सिर्फ वियतनाम के साथ ही डील पर नहीं रुका है, बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया के एक और बड़े देश इंडोनेशिया के साथ भी ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री को लेकर बातचीत अब अपने बिल्कुल अंतिम चरण में पहुंच चुकी है. रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत और रूस के बीच इस मिसाइल को लेकर हुए मूल समझौते को कभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन वर्तमान घटनाक्रमों से यह साफ हो चुका है कि भारत को इस मिसाइल की तकनीक को अपनी जरूरत के हिसाब से बदलने, इसमें सुधार करने और इसे दुनिया के अन्य मित्र देशों को बेचने का पूरा अधिकार मिला हुआ है.
कितनी वजनदार है ब्रह्मोस मिसाइल?
ब्रह्मोस मिसाइल को भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO और रूस के NPOM ने मिलकर पिछले दो दशक से भी ज्यादा समय की कड़ी मेहनत से तैयार किया है. इस बेजोड़ मिसाइल का नाम भारत की विशाल ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की प्रसिद्ध मोस्कोवा नदी के शुरुआती अक्षरों को आपस में मिलाकर रखा गया है. इस बेहद घातक और अचूक मिसाइल का कुल वजन लगभग 3000 किलोग्राम है, जबकि इसकी कुल लंबाई तकरीबन 10 मीटर के आसपास है. इस मिसाइल का निर्माण और असेंबलिंग का पूरा मुख्य काम भारत के हैदराबाद शहर में किया जाता है.
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ब्रह्मोस की मारक क्षमता में जबरदस्त सुधार
जब इस मिसाइल को शुरुआती दौर में विकसित किया गया था, तब इसकी मारक क्षमता करीब 300 किलोमीटर तक तय की गई थी. लेकिन भारत ने समय के साथ अपनी आधुनिक स्वदेशी तकनीक का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए इसकी ताकत को और ज्यादा बढ़ाया और अब इसकी मारक क्षमता को बढ़ाकर करीब 500 किलोमीटर तक कर दिया गया है. यह एक ऐसी बेहद असरदार और सफल मिसाइल है जो हमला करते समय करीब 4000 किलोमीटर प्रति घंटा की तूफानी रफ्तार पकड़ लेती है. इसके सामने दुनिया का बड़े से बड़ा एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह से लाचार और नाकाम साबित होता है.
स्वदेशी तकनीक की बड़ी ताकत
इस मिसाइल के निर्माण में भारत की आत्मनिर्भरता साफ झलकती है क्योंकि इसमें करीब 85% तक भारतीय स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि, इसके बचे हुए 15% हिस्से जैसे कि इसका मुख्य इंजन और कुछ विशेष प्रकार की मजबूत धातुएं आज भी सीधे रूस से ही आयात की जाती हैं. ये विशेष हिस्से फिलहाल भारत के भीतर नहीं बनते हैं और मौजूदा समय में भारत के पास घरेलू स्तर पर इन्हें अकेले तैयार करने की वैसी पूर्ण क्षमता उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण इन खास पुर्जों के लिए आज भी रूस के साथ मिलकर काम किया जाता है.
तीनों सेनाओं का अचूक ब्रह्मास्त्र
ब्रह्मोस की सबसे बड़ी और अनोखी खासियत यह है कि यह जमीन, हवा और पानी... हर जगह से बेहद आसानी के साथ दुश्मन पर सटीक वार कर सकती है. इसे भारतीय सेना के तीनों अंगों के लिए पूरी तरह अनुकूल बनाया गया है. इसे जमीन पर मौजूद मोबाइल लॉन्चर से, समुद्र में तैरते युद्धपोतों से, पानी के भीतर डूबी पनडुब्बियों से और आसमान में उड़ते सुखोई Su-30MKI जैसे लड़ाकू विमानों से भी बेहद आसानी से दागा जा सकता है. इसका निशाना इतना सटीक है कि 290 किलोमीटर की दूरी पर भी यह अपने तय लक्ष्य के महज 1 मीटर के घेरे के भीतर गिरकर भारी तबाही मचा देती है.
हवा में क्यों नहीं रोकी जा सकती ब्रह्मोस मिसाइल?
दावा किया जाता है कि ब्रह्मोस मिसाइल को बीच हवा में इंटरसेप्ट करना यानी रोकना दुनिया के किसी भी देश के अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए पूरी तरह से नामुमकिन है. इसकी सबसे बड़ी वजह इसकी अविश्वसनीय रफ्तार है, जो इसे ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना ज्यादा तेज यानी करीब 2.8 से लेकर 3.0 Mach तक ले जाती है. यह पूरी उड़ान के दौरान सुपरसोनिक गति बनाए रखती है. इसके साथ ही इसका खतरनाक सेंसर इतना स्मार्ट है कि यह एक जैसे दिखने वाले कई नकली लक्ष्यों के बीच में से भी असली दुश्मन के टारगेट को ढूंढकर उसे पल भर में तबाह कर देता है.
समुद्र की सतह से सटकर उड़ान
यह एक बेहद उन्नत क्रूज मिसाइल है, जिसका मतलब यह है कि यह बहुत ज्यादा ऊंचाई पर उड़ने के बजाय जमीन और समुद्र की सतह के काफी करीब होकर अपना सफर तय करती है. यह उड़ान के दौरान समुद्र तल से मात्र 3 से 4 मीटर जैसी बेहद कम ऊंचाई पर तैरते हुए आगे बढ़ सकती है, जिसे सैन्य भाषा में 'सी-स्किमिंग' कहा जाता है. पृथ्वी की गोलाई यानी वक्रता के कारण दुश्मन के बड़े-बड़े और आधुनिक रडार भी इसे बहुत देर से देख पाते हैं. जब तक दुश्मन के सिस्टम को इसकी मौजूदगी का पता चलता है, तब तक हमला हो चुका होता है.
बीच हवा में रास्ता बदलने का हुनर
आमतौर पर मिसाइलें एक तय रास्ते पर ही आगे बढ़ती हैं, लेकिन ब्रह्मोस के पास उड़ान के दौरान भी हवा में ही बहुत तेजी से अपनी दिशा बदलने की अद्भुत क्षमता मौजूद है. इसके अलावा यह पूरी तरह से 'दागो और भूल जाओ' यानी 'Fire and Forget' के आधुनिक सिद्धांत पर काम करती है, जिसका मतलब है कि एक बार लॉन्च होने के बाद इसे बाहर से किसी गाइडेंस की जरूरत नहीं होती. इसकी सुरक्षा प्रणाली में बहुत ही उन्नत किस्म के हार्डवेयर लेवल कोड और सॉफ्टवेयर एनक्रिप्शन का इस्तेमाल किया गया है, जिसकी वजह से दुश्मन देश इसके सिस्टम को कभी हैक या जाम नहीं कर सकते.
दो चरणों वाले इंजन की तकनीक
अगर इसके भीतर काम करने वाली मुख्य तकनीक की बात करें, तो यह एक बेहद आधुनिक दो-चरणीय इंजन प्रणाली पर काम करती है. इसके पहले चरण में सॉलिड प्रोपेलेंट यानी ठोस ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है, जो मिसाइल को लॉन्च होते ही एक जबरदस्त शुरुआती रफ्तार देता है. इसके बाद इसका दूसरा चरण शुरू होता है, जिसमें लगे लिक्विड रैमजेट इंजन की मदद से यह हवा से ही ऑक्सीजन खींचकर अत्यधिक वेग प्राप्त करती है. यही रैमजेट तकनीक और इसकी जड़त्वीय नेविगेशन प्रणाली (Inertial Navigation System) इसे दुनिया की सबसे घातक मिसाइल बनाती है.
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