Nadrai Bridge of Kasganj : नीचे नदी, बीच में सुरंग फिर दो नहरें और चौराहा... इतना क्यों खास है कासगंज का नदरई पुल?
Nadrai Bridge of Kasganj : कासगंज के नदरई पुल में नीचे नदी बहती है, बीच में सुरंगें बनी हैं, ऊपर नहर गुजरती है और सबसे ऊपर सड़कें एक-दूसरे से मिलकर चौराहे का रूप लेती हैं.

Nadrai Bridge of Kasganj : उत्तर प्रदेश में एक ऐसा पुल मौजूद है, जिसे पहली बार देखने वाला अक्सर हैरान रह जाता है. इसकी बनावट नॉर्मल पुलों जैसी बिल्कुल नहीं है. इसमें नीचे नदी बहती है, बीच में सुरंगें बनी हैं, ऊपर नहर गुजरती है और सबसे ऊपर सड़कें एक-दूसरे से मिलकर चौराहे का रूप लेती हैं. सबसे हैरानी की बात यह है कि करीब 140 साल पहले बने इस विशाल पुल के निर्माण में लोहे का इस्तेमाल नहीं किया गया था. इसके बाद भी यह आज मजबूती से खड़ा है. यही वजह है कि इसकी इंजीनियरिंग और निर्माण शैली की चर्चा केवल भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों की यूनिवर्सिटीज तक में होती है. तो आइए जानते हैं आखिर कासगंज का नदरई पुल इतना खास क्यों माना जाता है.
कहां है यह अनोखा पुल?
यह अनोखा पुल उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर नदरई गांव में स्थित है. स्थानीय लोग इसे नदरई पुल या झाल का पुल भी कहते हैं. अपनी अलग बनावट और इंजीनियरिंग के कारण यह देश के सबसे अनोखे पुलों में गिना जाता है. इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं.
कब बना था यह पुल?
इस पुल का निर्माण ब्रिटिश शासन के दौरान कराया गया था. इसका निर्माण वर्ष 1885 में शुरू हुआ और 1889 में पूरा हुआ. इसे बनने में पूरे चार साल लगे. अब इस पुल को बने करीब 140 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी यह मजबूती से खड़ा हुआ है.
आयरलैंड में तैयार हुआ था डिजाइन
नदरई पुल का डिजाइन आयरलैंड की कॉर्क यूनिवर्सिटी के सहयोग से ब्रिटिश इंजीनियर विलियम गुड ने तैयार किया था. पुल की लंबाई 1300 फीट से ज्यादा है. साल 1892 में अमेरिका के कैलिफोर्निया से प्रकाशित पैसेफिक रूलर प्रेस अखबार ने अपने फ्रंट पेज पर इस पुल पर लेख प्रकाशित किया था और इसे इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना बताया था.
कासगंज का नदरई पुल इतना खास क्यों माना जाता है?
इस पुल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके निर्माण में लोहे का इस्तेमाल नहीं किया गया इसे मेहराब (आर्क) तकनीक से बनाया गया था. इतनी बड़ी संरचना को बिना लोहे के तैयार करना उस समय की इंजीनियरिंग का अनोखा तरीका माना जाता है. इसी वजह से इसकी निर्माण शैली का अध्ययन ब्रिटेन, यूरोप और अमेरिका की कई यूनिवर्सिटीज में कराया जाता है.
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नीचे नदी और बीच में सुरंग फिर दो नहरें
इस पुल के नीचे काली नदी बहती है, जिसका उद्गम मुजफ्फरनगर जिले की खतौली तहसील के अंतवाड़ा गांव से होता है. पुल के ऊपर हजारा नहर गुजरती है. पुल की ऊंचाई करीब 100 फीट बताई जाती है. नदरई पुल के दोनों ओर कोठियां बनी हुई हैं, जिन्हें सुरंग कोठी कहा जाता है. इन सुरंगों का इस्तेमाल नहर के एक ओर से दूसरी ओर जाने के लिए किया जाता था. स्थानीय लोग इन्हें चोर कोठी के नाम से भी जानते हैं. पहले इन सुरंगों में नीचे जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं, लेकिन सुरक्षा कारणों से बाद में उन्हें हटा दिया गया. आज भी इन सुरंगों को देखकर लोग इसकी अनोखी बनावट की तारीफ करते हैं.
पुल के ऊपर बना है चौराहा
नदरई पुल की एक और खास बात इसकी सड़क व्यवस्था है. पुल के दोनों तरफ सड़कें बनी हुई हैं और ऊपर सड़कें आपस में मिलकर चौराहे का रूप लेती हैं. यहां नहर के ऊपर अलग से कोई पुल नहीं बनाया गया है, बल्कि नीचे बनी सुरंगों के जरिए दोनों तरफ की सड़कें आपस में जुड़ती हैं.
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