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Kargil Vijay Diwas: कारगिल की जंग में टाइगर हिल को जीतना इतना मुश्किल क्यों था?

Kargil Vijay Diwas: जब भी कारगिल की जंग की बात होती है तब सबसे पहले दिमाग में टाइगर हिल ही आता है. क्या आप जानते हैं कि कारगिल की जंग में टाइगर हिल जीतना कितना अहम था?

Kargil Vijay Diwas: हर साल 26 जुलाई को पूरा देश कारगिल विजय दिवस मनाता है. इस दिन भारत ने कारगिल युद्ध को जीत कर दुनिया की नजरों में अपनी साख फिर से कायम की थी. इस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना द्वारा कब्जा की गई गई चोटियों को फिर से हासिल किया था. हालांकि, इस जंग में टाइगर हिल की लड़ाई सबसे महत्वपूर्ण थी. टाइगर हिल को कारगिल युद्ध का टर्निंग पॉइंट माना जाता है. आज हम जानेगें कि आखिर टाइगर हिल भारतीय सेना के लिए क्यों इतनी जरूरी थी और इसे जीतना कितना मुश्किल था. 

टाइगर हिल की अहमियत

टाइगर हिल कारगिल सेक्टर की सबसे ऊंची चोटी है, जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 16,700 फीट है. इस चोटी की स्थिति ऐसी है कि यहां कब्जा करने वाला पूरे बड़ी आसानी से पूरे इलाके को नियंत्रित कर सकता था. टाइगर हिल से श्रीनगर को लेह से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग-1डी साफ दिखाई देता था, जिसे पाकिस्तानी सेना ऊपर बैठकर हमारे इस मुख्य हाईवे को देख सकती थी. ऐसे में इस चोटी पर बैठकर दुश्मन हमारे सैनिकों के लिए जाने वाले राशन, हथियार और गाड़ियों पर आसानी से तोप और बंदूकों से हमला कर रहे थे. अगर यह चोटी हमारे पास न आती, तो लद्दाख का संपर्क पूरे भारत से टूट जाता. साथ ही ऊपर बैठी पाकिस्तानी फौज को पता चल जाता था कि भारतीय सेना नीचे क्या रणनीति बना रही है और उसकी गाड़ियां कहां जा रही हैं. 

इसे जीतना इतना मुश्किल क्यों था

टाइगर हिल पर जीत हासिल करना किसी चमत्कार से कम नहीं था. युद्ध का एक सीधा नियम है कि जो ऊपर होता है, वह फायदे में रहता है. पाकिस्तानी सैनिक चोटी पर बंकर बनाकर सुरक्षित बैठे थे, जबकि हमारे सैनिकों को बिल्कुल खुली और सीधी खड़ी चट्टान पर चढ़कर ऊपर जाना था. दुश्मन नीचे चढ़ रहे भारतीय जवानों को आसानी से निशाना बना रहे थे. यह जंग मई से जुलाई के महीनों में लड़ी गई थी, लेकिन 16 हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर रात का तापमान शून्य से भी कई डिग्री नीचे -10°C से -15°C चला जाता था. इतने ठंडे मौसम में बर्फीली हवाओं के बीच चढ़ाई करना जानलेवा था. टाइगर हिल के चारों तरफ तीन तरफ से सीधी खड़ी चट्टानें थीं. सामने से चढ़ने का मतलब था सीधे दुश्मन की गोलियों के आगे आना. इसलिए भारतीय जवानों ने वह रास्ता चुना जो सबसे खतरनाक और नामुमकिन था. 

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भारतीय सैनिकों की जीत

मई 1999 में शुरू हुई कोशिशें जुलाई की शुरुआत में खत्म हुई. भारतीय वायुसेना के मिराज-2000 विमानों ने टाइगर हिल पर मौजूद दुश्मन के बंकरों पर लेजर गाइडेड बम बरसाए, जिससे वहां बैठा दुश्मन डर गया. इसके बाद 3-4 जुलाई की रात को 18 ग्रेनेडियर्स के जवानों ने पीछे की तरफ से रस्सियों की मदद से बिल्कुल सीधी चट्टान पर चढ़ना शुरू किया. करीब 11 घंटे तक चली आमने-सामने की खूनी जंग के बाद, 4 जुलाई 1999 की सुबह को टाइगर हिल पर भारतीय जवानों ने जीत हासिल की. 

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