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Bihar Elections 2025: बिहार चुनाव से पहले पार्टियों को क्यों याद आ रहे कर्पूरी ठाकुर, क्या है यहां की सियासत में इनका रोल?

Bihar Elections 2025: बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारी चल रही है. इसी बीच सभी पार्टियां कर्पूरी ठाकुर को जमकर याद कर रही है. आइए जानते हैं उनके बारे में पूरी जानकारी.

Bihar Elections 2025: बिहार आने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी में लगा हुआ है. ऐसे में राज्य के राजनीतिक माहौल में एक और नाम गूंज रहा है. यह नाम है कर्पूरी ठाकुर का. कर्पूरी ठाकुर को जननायक भी कहा जाता है. समस्तीपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से लेकर पटना में तेजस्वी यादव के संबोधन तक सभी दलों के नेता कर्पूरी ठाकुर को जरूर याद कर रहे हैं. लेकिन सवाल यह उठता है कि बिहार चुनाव से ठीक पहले पार्टियों को आखिर क्यों याद आ रहे हैं कर्पूरी ठाकुर. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह और साथ ही यह भी कि कर्पूरी ठाकुर की सियासत में कैसी है विरासत.

जनता के नेता 

कर्पूरी ठाकुर का जन्म 1924 में पिठौंझिया गांव में हुआ था. इसे अब कर्पूरीग्राम के नाम से पहचाना जाता है. एक साधारण परिवार से उठकर कर्पूरी ठाकुर सामाजिक न्याय और समानता के प्रतीक बन गए. पिछड़े समुदायों में गिनी जाने वाली जाति से होने के बावजूद भी वे बिहार के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों में से एक के रूप में उभरे. कर्पूरी ठाकुर 1970 के दशक में दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. उन्होंने उस वक्त बिहार की कमान संभाली जब राजनीतिक प्रभुत्व ज्यादातर उच्च जाति के अभिजात वर्ग के हाथों में था.

स्वतंत्रता सेनानी से सुधारक बने 

राजनीति में आने से पहले कर्पूरी ठाकुर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे. उन्हें अपनी भागीदारी के लिए कारावास भी हुई थी. स्वतंत्रता के बाद उन्होंने चुनावी राजनीति में प्रवेश किया और 1952 में विधायक बने. उनका यह राजनीतिक सफर लगभग चार दशकों तक चला जिसके दौरान उन्होंने समानता, शिक्षा सुधार और सामाजिक सशक्तिकरण की आवाज के रूप में काम किया.

कर्पूरी ठाकुर के ऐतिहासिक निर्णय 

कर्पूरी ठाकुर ने मुख्यमंत्री के रूप में एक अमिट छाप छोड़ी. उन्होंने कई बड़े सुधार लागू किए जैसे कि मैट्रिक परीक्षा में अंग्रेजी को अनिवार्य विषय के रूप में हटाना, शराबबंदी करना और साथ ही सरकारी ठेकों में बेरोजगार इंजीनियरों को प्राथमिकता देना. उनका सबसे बड़ा योगदान 1976 में मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिश के आधार पर पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण नीति को लागू करना था. उन्होंने कर्पूरी ठाकुर फार्मूला के तहत 26% आरक्षण का प्रावधान रखा था. इसके अंतर्गत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 12%, ओबीसी के आर्थिक रूप से पिछले वर्ग को 8%, उच्च जातियों के गरीबों को और साथ ही महिलाओं को 3%-3% आरक्षण दिया गया.

आज क्यों किए जा रहे हैं याद 

जैसे-जैसे बिहार में चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं कर्पूरी ठाकुर के आदर्श बिहार के गहरे सामाजिक न्याय आंदोलन की याद दिलाते हैं. बिहार में सभी पार्टियां कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी आदर्श और गरीब हितैषी छवि से खुद को जोड़ने की पूरी कोशिश कर रही हैं.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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