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सैनेटरी पैड पर 0% पर्सेंट तो कंडोम पर 12% टैक्स क्यों, क्या है दोनों हेल्थ प्रॉडक्ट में अंतर की वजह?

सैनेटरी पैड और कंडोम दोनों स्वास्थ्य से जुड़े हैं, लेकिन टैक्स नीति में इनके साथ अलग व्यवहार हुआ है. फर्क की वजह सिर्फ टैक्स नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव, जरूरत की परिभाषा और सरकारी प्राथमिकताएं हैं.

सैनेटरी पैड और कंडोम दोनों ही स्वास्थ्य से जुड़े उत्पाद हैं, दोनों ही रोजमर्रा की जरूरतों से सीधे जुड़े हैं, फिर भी टैक्स के मामले में इनके साथ अलग-अलग व्यवहार है. एक तरफ सैनेटरी पैड पर शून्य टैक्स है, तो दूसरी ओर कंडोम पर 12 प्रतिशत जीएसटी लिया जाता है. यह सवाल सिर्फ टैक्स का नहीं, बल्कि सरकारी नीति, सामाजिक सोच और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं से जुड़ा है. इसी अंतर के पीछे छिपी है एक लंबी नीति यात्रा और सामाजिक दबाव की कहानी. आइए जानें.

जीएसटी के दायरे में कैसे आए ये दोनों प्रॉडक्ट?

जब 2017 में देश में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू हुआ, तब सैनेटरी पैड और कंडोम दोनों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया. उस समय सैनेटरी पैड पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगाया गया था, जबकि कंडोम को भी 12 प्रतिशत टैक्स स्लैब में रखा गया. यह फैसला तकनीकी वर्गीकरण पर आधारित था, न कि सामाजिक जरूरतों पर.

सैनेटरी पैड टैक्स से मुक्ति तक का सफर

सैनेटरी पैड को शुरुआत में व्यक्तिगत देखभाल या कॉस्मेटिक प्रॉडक्ट की श्रेणी में रखा गया था, जिस पर 12 प्रतिशत जीएसटी लागू हुआ. इसके खिलाफ देशभर में महिलाओं, सामाजिक संगठनों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आवाज उठाई. तर्क दिया गया कि मासिक धर्म कोई विकल्प नहीं, बल्कि जैविक जरूरत है. इसी व्यापक जनदबाव और महिला स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए सरकार ने जुलाई 2018 में सैनेटरी पैड को पूरी तरह टैक्स-फ्री कर दिया. इसके बाद से इन पर 0 प्रतिशत जीएसटी लागू है. 

कंडोम पर अब भी 12% टैक्स क्यों?

कंडोम को परिवार नियोजन और यौन संचारित रोगों जैसे HIV/AIDS से बचाव का अहम साधन माना जाता है. इसके बावजूद इसे पूरी तरह टैक्स-फ्री नहीं किया गया. नीति विशेषज्ञों के अनुसार, कंडोम को स्वास्थ्य उत्पाद जरूर माना जाता है, लेकिन इसे मासिक धर्म जैसी अनिवार्य जैविक जरूरत की श्रेणी में नहीं रखा गया है. इसके अलावा, सरकारी और मुफ्त वितरण योजनाओं के तहत कंडोम पहले से ही बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे बाजार में बिकने वाले कंडोम पर टैक्स बनाए रखने का तर्क दिया गया.

नीति में सामाजिक सोच का असर

सैनेटरी पैड पर टैक्स हटाना सामाजिक जागरूकता और महिला अधिकार आंदोलन का नतीजा था. वहीं कंडोम को लेकर समाज में मौजूद झिझक और सीमित सार्वजनिक दबाव भी टैक्स नीति को प्रभावित करता रहा है. हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि यौन स्वास्थ्य भी सार्वजनिक स्वास्थ्य का उतना ही अहम हिस्सा है, जितना मासिक धर्म स्वच्छता.

क्या भविष्य में कंडोम भी होंगे टैक्स-फ्री?

समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि कंडोम को भी 0 प्रतिशत जीएसटी स्लैब में लाया जाए. फिलहाल सरकार ने ऐसा कोई फैसला नहीं लिया है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य और जागरूकता बढ़ने के साथ इस नीति पर दोबारा विचार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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