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सबसे पहले किसके पास था कोहिनूर हीरा, मुगलों से भी जुड़ा है इसका इतिहास

Kohinoor Diamond History: कोहिनूर हीरा करीब 800 पहले आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित गोलकोंडा की खदान से निकाला गया था. उस समय तक यह खोजा गया सबसे बड़ा हीरा था और यह करीब 186 कैरेट का था.

Kohinoor Diamond History: दुनिया के सबसे बेशकीमती हीरों में शुमार विश्व प्रसिद्ध 'कोहिनूर हीरा' कभी भारत की शान हुआ करता था. भारत से जब अंग्रेज वापस गए तो अपने साथ यह कोहिनूर हीरा भी ले गए. तब से यह हीरा ब्रिटेन के शाही परिवार के पास ही है. बीते साल जब ब्रिटेन के किंग चार्ल्स की ताजपोशी हुई तो यह बेशकीमती हीरा उनके सर का ताज बना, इससे पहले महारानी एलिजाबेथ के क्राउन में यह शाही हीरा जड़ा हुआ था. 

कोहिनूर हीरे को ब्रिटेन से वापस भारत लाने की मांग आजादी से बाद से ही उठ रही है. कई बार इसको लेकर प्रयास भी किए गए, लेकिन हकीकत यह है कि फिलहाल यह हीरा ब्रिटेन में ही है. ऐसे में क्या आपको कोहिनूर हीरे के इतिहास के बारे में पता है? सबसे पहले यह हीरा किसके पास था? यह मुगलों और अंग्रेजों के पास कैसे पहुंचा, चलिए जानते हैं इसके बारे में...

कहां मिला था कोहिनूर हीरा

कोहिनूर हीरे के बारे में सबसे रोचक बात यह है कि इस हीरे को कभी बेचा नहीं गया, या तो इसे जीता गया या फिर लूटा गया. अगर इसके इतिहास की बात करें तो कोहिनूर हीरा करीब 800 पहले आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित गोलकोंडा की खदान से निकाला गया था. उस समय तक यह खोजा गया सबसे बड़ा हीरा था और यह करीब 186 कैरेट का था. तब से लेकर इसे कई बार तराशा गया और इस समय इसका मूल रूप 105.6 कैरेट का है, जिसका कुल वजन 21.12 ग्राम रह गया है. कहा जाता है कि कोहिनूर हीरा जमीन से 13 फीट की गहराई में मिला था. 

कौन था कोहिनूर हीरे का पहला मालिक

कहा जाता है कि कोहिनूर हीरे के पहले मालिक काकतिय राजवंश था. काकतिय ने इस हीरे को अपनी कुलदेवी भद्रकाली की बाई आंख में जड़वाया था. 14वीं शताब्दी में जब अलाउद्दीन खिलजी आया तो उसने इस हीरे को लूट लिया. इसके बाद पानीपत के युद्ध में बाबर ने जब आगरा और दिल्ली किले को जीता तो यह हीरा मुगलों के पास पहुंच गया.   

भारत से पहली बार बाहर गया कोहिनूर

लंबे समय तक कोहिनूर हीरे पर मुगलों का ही कब्जा रहा, लेकिन 1738 में जब ईरानी शासक नादिर शाह ने मुगलों पर हमला बोला तो उसने यह हीरा 13वें मुगल शासक मोहम्मद शाह रंगीला से लूट लिया और इसे अपने साथ बाहर लेकर चला गया. इसके बाद यह हीरा भी अफगान पहुंचा. 1813 में महाराजा रणजीत सिंह ने इस हीरे को वापस भारत लेकर आए. हालांकि, जब अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा किया तो यह हीरा उनके पास चला गया और ब्रिटेन पहुंच गया. 

यह भी पढ़ें: मुगलों के दौर में यूपी और संभल में कैसे मनाई जाती थी ईद? जानें कौन करता था यहां राज

प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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