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दो बार दफनाया गया था यह मुगल बादशाह, जानें पहली बार क्यों खोदी गई थी कब्र?

भारत में मुगलों ने सालों तक राज किया है, लेकिन एक मुगल बादशाह ऐसा था, जिसको मरने के बाद दो बार दफनाना पड़ा था. आइए जानें कि ऐसा क्यों हुआ और आखिर कितने वक्त के बाद वह दूसरी बाद दफनाया गया.

इतिहास के पन्नों में कई ऐसी दास्तानें दफन हैं जो आज भी हमें हैरान कर देती हैं. ऐसी ही एक कहानी भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाले पहले बादशाह बाबर की है. महज 47 साल की उम्र में दुनिया छोड़ने वाले इस शासक को अपनी मौत के बाद भी एक जगह सुकून नहीं मिला. उसे एक बार नहीं, बल्कि दो बार अलग-अलग जगहों पर दफनाया गया था. आखिर क्या वजह थी कि ऐसा करना पड़ा था, आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक घटना के पीछे की पूरी सच्चाई.

दो बार दफन होने की पूरी कहानी

भारत में करीब 300 सालों तक शासन करने वाले मुगल वंश की शुरुआत जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर ने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई जीतकर की थी. बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर का पांचवां और माता की ओर से चंगेज खान का चौदहवां वंशज था. उसने महज 12 साल की उम्र में सत्ता संभाली थी और कई संघर्षों के बाद भारत में अपनी सल्तनत कायम की, लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था; अपनी जीत के मात्र चार साल बाद ही 1530 में बाबर की मृत्यु हो गई.

बेटे की सलामती के लिए दी अपनी जान

बाबर की मौत से जुड़ी एक बेहद भावुक कहानी इतिहास में दर्ज है. कहा जाता है कि जब उसका बड़ा बेटा हुमायूं गंभीर रूप से बीमार पड़ा और हकीमों ने भी हाथ खड़े कर दिए, तब बाबर ने ईश्वर से एक अनोखी दुआ मांगी. उसने प्रार्थना की कि हुमायूं के बदले उसकी जान ले ली जाए और हुमायूं को ठीक कर दिया जाए. माना जाता है कि उस दिन के बाद हुमायूं धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा और बाबर की सेहत बिगड़ती चली गई. आखिरकार 26 दिसंबर 1530 को आगरा में बाबर ने अंतिम सांस ली. 

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कहां और क्यों बनी बाबर की पहली कब्र?

बाबर की मृत्यु के तुरंत बाद उसे आगरा में यमुना नदी के किनारे स्थित 'आरामबाग' में दफनाया गया. यह भारत का सबसे पुराना मुगल गार्डन माना जाता है, जिसे खुद बाबर ने ही 1528 में बनवाया था. उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और जल्दबाजी के कारण उसे वहीं सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया. हालांकि, यह स्थान बाबर की पसंद का नहीं था, क्योंकि वह खुद को भारत में हमेशा एक अजनबी ही मानता रहा और उसका दिल हमेशा काबुल के लिए धड़कता था.

आखिरी इच्छा और काबुल से लगाव

बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में स्पष्ट रूप से लिखा था कि मरने के बाद उसे काबुल में दफनाया जाए. उसे काबुल की आबोहवा और वहां के पहाड़ों से इतना लगाव था कि वह भारत को केवल एक जीता हुआ क्षेत्र मानता था, जबकि काबुल को अपनी रूह. वह चाहता था कि उसे उसी बाग में जगह मिले जिसे उसके पूर्वज कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल करते थे.

14 साल बाद पूरी हुई इच्छा

बाबर की यह अंतिम इच्छा उसकी मौत के तुरंत बाद पूरी नहीं हो सकी. लगभग 14 साल बीत जाने के बाद, 1544 के आसपास उसके पार्थिव अवशेषों को आगरा की कब्र से निकाला गया और अफगानिस्तान के काबुल ले जाया गया. वहां 'बाग-ए-बाबर' में उसे दोबारा पूरे सम्मान के साथ दफनाया गया. यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, यह वही स्थान है जिसे बाबर ने खुद चुना था. इस तरह एक बादशाह की वसीयत उसकी मौत के एक दशक से भी ज्यादा समय बाद मुकम्मल हुई.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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