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भारत की इन कंपनियों का नहीं है कोई भी मालिक, सिर्फ ट्रस्ट के भरोसे करती हैं कारोबार

जब परिवार में कोई वारिस नहीं होता या बच्चों को व्यापार में कोई इंटरेस्ट नहीं होती, तो कंपनियों को संभालने के लिए पेशेवर मैनेजर्स या ट्रस्ट जिम्मेदार बन जाते हैं.

भारत में ज्यादातर बड़े बिजनेस फैमिली कंट्रोल में होते हैं यानी कंपनी के मालिक और उसके बोर्ड के प्रमुख अक्सर एक ही परिवार से होते हैं. लेकिन इसके बावजूद कई बड़ी कंपनियों में ऐसा होता है कि परिवार के किसी सदस्य के पास कंपनी का कंट्रोल नहीं होता हैं जब परिवार में कोई वारिस नहीं होता या बच्चों को व्यापार में कोई इंटरेस्ट नहीं होती, तो कंपनियों को संभालने के लिए पेशेवर मैनेजर्स या ट्रस्ट जिम्मेदार बन जाते हैं. इस तरह बिजनेस को चलाए रखने में मदद करती है, बल्कि निवेशकों और समाज के भरोसे को भी बनाए रखती है.

भारत में कुछ बड़ी कंपनियां ऐसी हैं जिनका कोई व्यक्तिगत मालिक नहीं है और ये ट्रस्ट या फाउंडेशन के भरोसे चलती हैं. इसका मतलब है कि कंपनी का नियंत्रण किसी एक व्यक्ति के पास नहीं होता, बल्कि ट्रस्ट या बोर्ड तय करता है कि मुनाफा और संचालन कैसे होंगे, इन कंपनियों का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि समाज की भलाई और विकास के लिए काम करना होता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि भारत की किन कंपनियों का कोई भी मालिक नहीं है , सिर्फ ट्रस्ट के भरोसे कारोबार करती हैं. 

भारत की किन कंपनियों का कोई भी मालिक नहीं है

1. टाटा ग्रुप में रतन टाटा के कोई प्रत्यक्ष वारिस नहीं थे, इसलिए साइरस मिस्त्री जैसे पेशेवरों को नेतृत्व दिया गया. बाद में मिस्त्री के जाने के बाद एन. चंद्रशेखरन टाटा ग्रुप के प्रमुख बने. लेकिन टाटा ग्रुप की ज्यादा हिस्सेदारी अब भी परिवार या व्यक्तिगत मालिकों के बजाय टाटा ट्रस्ट्स के पास है. ये ट्रस्ट्स कंपनी के मुनाफे को शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे सामाजिक कार्यों में निवेश करते हैं. 

2. महिंद्रा ग्रुप में भी ऐसा ही मामला है. आनंद महिंद्रा की बेटियों ने व्यापार संभालने में कोई सक्रिय भूमिका नहीं ली, उनके दोस्तों या पेशेवरों ने ग्रुप को प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली, भारत में अब पारिवारिक मालिकाना होना जरूरी नहीं है, बल्कि पेशेवर प्रबंधन और ट्रस्ट आधारित नियंत्रण भी कंपनियों को मजबूत बनाए रखता है. 

3. भारत की तीसरी बड़ी दवा कंपनी सिप्ला भी इसी स्थिति में है. इसके चेयरमैन युसूफ हमीद के वारिस कारोबार में दिलचस्पी नहीं रखते हैं. इसलिए वे अब अपनी कंपनी बेचने की तैयारी कर रहे हैं. इसी तरह बिसलेरी और बायोकॉन जैसे बड़े ब्रांडों में भी वारिस की अनुपस्थिति के कारण व्यवसाय को पेशेवर हाथों में सौंपा गया या ट्रस्ट आधारित प्रबंधन अपनाया गया. 

ये कंपनियां सिर्फ ट्रस्ट के भरोसे करती हैं कारोबार

1. टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) – टाटा ग्रुप की ज्यादातर कंपनियों की हिस्सेदारी इन ट्रस्टों के पास है. इसका फायदा शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे सामाजिक कार्यों में निवेश किया जाता है. 
 
2. इंफोसिस फाउंडेशन (Infosys Foundation) – इंफोसिस कंपनी के मुनाफे का यूज शिक्षा और ग्रामीण विकास में किया जाता है. 
 
3. अजीम प्रेमजी फाउंडेशन (Azim Premji Foundation) – यह शिक्षा सुधार पर केंद्रित है और विप्रो के मुनाफे का समाज में योगदान सुनिश्चित करता है. इन कंपनियों में कोई व्यक्तिगत मालिक नहीं होता है. इसके बजाय बोर्ड और ट्रस्ट कंपनियों के संचालन और दिशा-निर्देश तय करते हैं.
             
कैसे काम करता है ट्रस्ट मॉडल?

ट्रस्ट आधारित कंपनियों में कोई भी एक व्यक्ति कंपनी का मालिक नहीं होता है. इसका फायदा भी व्यक्तिगत फायदे के बजाय सामाजिक कार्यों में लगाया जाता है. इसके अलावा पेशेवर मैनेजर्स और बोर्ड कंपनी का संचालन करते हैं. साथ ही लंबे समय तक सस्टेनेबिलिटी और ट्रांसपेरेंसी रहती है. 

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