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India Census : जब डाक टिकटों और पोस्टकार्ड से हुई थी देश की जनगणना, जानें कब हुआ था ऐसा?

India Census : डाक टिकटों, पोस्टकार्डों और लिफाफों पर जनगणना से जुड़े संदेश छापकर लोगों को जागरूक किया जाता था. इन संदेशों का मकसद सिर्फ लोगों की गिनती करना नहीं था.

India Census : भारत आज अपनी नई जनगणना की तैयारी कर रहा है. यह आजादी के बाद देश की आठवीं और कुल 16वीं जनगणना होगी. इस बार जनगणना कर्मचारी मोबाइल ऐप की मदद से लोगों की जानकारी दर्ज करेंगे और डेटा सीधे डिजिटल सिस्टम में अपलोड किया जाएगा, लेकिन कई दशक पहले हालात बिल्कुल अलग थे. उस समय सरकार के पास लोगों तक संदेश पहुंचाने का सबसे बड़ा और सबसे भरोसेमंद माध्यम डाक विभाग था. डाक टिकटों, पोस्टकार्डों और लिफाफों पर जनगणना से जुड़े संदेश छापकर लोगों को जागरूक किया जाता था. इन संदेशों का मकसद सिर्फ लोगों की गिनती करना नहीं था, बल्कि उन्हें यह भरोसा दिलाना भी था कि जनगणना देश के विकास और भविष्य के लिए जरूरी है. ऐसे में आइए जानते हैं कि देश की जनगणना कब डाक टिकटों और पोस्टकार्ड से हुई थी. 

आजादी के बाद क्यों जरूरी थी पहली जनगणना?

भारत को आजादी मिलने के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देश की असली आबादी और सामाजिक स्थिति की जानकारी जुटाना थी. सरकार को चुनाव कराने, विकास योजनाएं बनाने और संसाधनों का सही वितरण करने के लिए भरोसेमंद आंकड़ों की जरूरत थी. इसी कारण स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 में कराई गई. जनगणना को इतना जरूरी माना गया कि संविधान लागू होने से पहले ही वर्ष 1948 में जनगणना अधिनियम पारित कर दिया गया था. 

लोगों तक संदेश पहुंचाने का सबसे बड़ा माध्यम बना डाक विभाग

1950 और 1960 के दशक में न तो इंटरनेट था और न ही टीवी का इतना चलन था, उस समय डाक विभाग ही देश का सबसे बड़ा नेटवर्क था. देश के लाखों गांवों तक डाकिए नियमित रूप से चिट्ठियां पहुंचाते थे. कई गांवों में डाकिया सिर्फ पत्र पहुंचाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सरकारी सूचनाओं और संदेशों का माध्यम भी होता था.यही वजह थी कि सरकार ने जनगणना के प्रचार के लिए डाक टिकटों और पोस्टमार्क का यूज शुरू किया. 

देश की जनगणना कब डाक टिकटों और पोस्टकार्ड से हुई थी?

1951 की पहली स्वतंत्र भारत की जनगणना के दौरान डाक टिकटों, पोस्टमार्क और चिट्ठियों का यूज लोगों तक जनगणना का संदेश पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर किया गया था. जनवरी 1951 में जनगणना को बढ़ावा देने के लिए विशेष डाक-छाप यानी पोस्टमार्क जारी किए गए. इनमें एक छोटे परिवार की तस्वीर बनी होती थी और उसके साथ हिंदी और अंग्रेजी में भारत की जनगणना, फरवरी 1951 लिखा जाता था. ये पोस्टमार्क देशभर में भेजी जाने वाली चिट्ठियों और लिफाफों पर लगाए जाते थे जिससे लोगों तक जनगणना का संदेश आसानी से पहुंच सके.ब्रिटिश शासन के दौरान हुई कुछ जनगणनाओं का कई इलाकों में विरोध हुआ था. ऐसे में स्वतंत्र भारत की सरकार चाहती थी कि लोग बिना किसी डर के अपनी जानकारी शेयर करें. इसी कारण डाक सामग्री में ऐसे संदेश शामिल किए गए जो लोगों को जनगणना के लिए प्रेरित करते थे. 

1961 में चला बड़ा जागरूकता अभियान

1961 की जनगणना के दौरान पोस्टकार्ड और डाक-छापों पर लोगों से अपील की गई कि वे खुद की और अपने पूरे परिवार की गणना करवाएं. साथ ही लोगों से यह भी कहा गया कि वे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भी जनगणना में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करें.सरकार ने जनगणना को एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत किया जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें भाग लें. वहीं साल 1971 में जनगणना की शताब्दी मनाई गई. इस अवसर पर लाखों डाक टिकट जारी किए गए. इन टिकटों में भारत की विविधता को दर्शाने के लिए अलग-अलग समुदायों और लोगों की तस्वीरों का यूज किया गया. सरकार ने इसे दुनिया के सबसे बड़े प्रशासनिक अभियानों में से एक बताया. यही वह समय था जब जनगणना के आंकड़ों को प्रोसेस करने के लिए कंप्यूटर तकनीक का यूज भी शुरू हुआ. 

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2001 की जनगणना को क्या दिए गए नाम?

साल 2001 की जनगणना के दौरान सरकार ने इसे राष्ट्र का आईना और राष्ट्र की सामूहिक तस्वीर जैसे नाम दिए. पोस्टकार्डों और विज्ञापनों में लोगों से अपील की गई कि वे बिना किसी डर के अपनी जानकारी शेयर करें. इस दौरान कई भाषाओं में जनगणना संबंधी संदेश प्रकाशित किए गए जिससे देश के अलग-अलग हिस्सों तक यह अभियान पहुंच सके. कुछ प्रचार सामग्री में छोटे परिवार को भी दिखाया गया, जो उस समय की जनसंख्या कंट्रोल संबंधी नीतियों को बढ़ावा दे रहा था. 

2011 में डिजिटल युग की ओर बढ़ता भारत

2011 की जनगणना तक आते-आते तकनीक का यूज काफी बढ़ गया था. इस दौरान जारी टिकटों में जनगणना कर्मियों और परिवारों को आधुनिक तरीके से दिखाया गया. हालांकि डेटा कलेक्ट करने का प्रोसेस अभी भी पूरी तरह डिजिटल नहीं हुआ था. वहीं अब आने वाली जनगणना भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना मानी जा रही है. इस बार मोबाइल ऐप का यूज कर के जानकारी सीधे ऑनलाइन सिस्टम में दर्ज की जाएगी. 

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मानसी उपाध्याय करीब दो साल से डिजिटल मीडिया और कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में काम कर रही हैं. मूल रूप से उत्तराखंड से जुड़ी मानसी ने अपनी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय से पूरी की. इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की और वर्तमान में राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नलिज्म कर रही हैं. पत्रकारिता में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अक्टूबर 2024 में एबीपी नेटवर्क से की. अब वह डिजिटल कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें फीचर और इंफॉर्मेटिव स्टोरीज लिखने के साथ-साथ स्क्रिप्ट राइटिंग, सोशल मीडिया और रिसर्च आधारित कंटेंट तैयार करने में रुचि है. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखने वाली मानसी ऐसी स्टोरीज लिखना पसंद करती हैं, जो पाठकों को नई और जरूरी जानकारी आसान भाषा में दें. उनकी कोशिश रहती है कि कंटेंट सिर्फ जानकारी देने वाला ही नहीं, बल्कि पढ़ने में दिलचस्प और पाठकों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ भी हो.

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