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आश्रम, अखाड़ा, मठ में क्या अंतर होता है और इनका काम क्या है?

आप जब भी आश्रम, मठ और अखाड़ा शब्द एक साथ सुनते होंगे तो इसमें अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता होगा. तो चलिए आज हम इन तीनों के बीच के भेद को समझते हैं.

आश्रम, मठ और अखाड़ा कई सदियों से चला आ रहा है. तीनों ही हिंदू धर्म और आस्था से जुड़े हुए हैं. जहां आश्रम में ऋषियों का निवास सदियों पुराना रहा है तो वहीं मठ और अखाड़ों की स्थापना उनके काफी समय बाद हुई है, लेकिन जब आप इन तीनों शब्दों को एकसाथ सुनते हैं तो आपके मन में भी सवाल उठता होगा कि आखिर इन तीनों के बीच अंतर क्या है. चलिए आज हम यही जानते हैं.

क्या है आश्रम, मठ और अखाड़े में अंतर?
आश्रम लोगों के एक छोटे समूह के लिए बनाई गई एक अस्थायी संस्था है. सामान्य तौर पर इनकेे अंदर पूजा की कोई स्थाई व्यवस्था नहीं होत. आश्रम जीवन न केवल भिक्षुओं के लिए, बल्कि गृहस्थों के लिए भी होता है. आश्रमों में रहने वाले प्राचीन ऋषि विवाहित हुआ करते थे.

वहीं मठ शंकराचार्य द्वारा शुरू की गई पूजा की स्थायी व्यवस्था वाली एक स्थायी संस्था है. उनका अनुसरण करते हुए अनके अनुयायी रामानुजाचार्य और माधवाचार्य ने भी मठों की स्थापना की. येे मठ लोगों के बीच धर्म का प्रचार करने वाले भिक्षुओं के लिए होतेे हैं.

इसके अलावा अखाड़ा एक अर्ध-स्थायी संस्था है जिसमें पूजा-पाठ की कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं होती. इसमें बहुत बड़ी संख्या में भिक्षुओं का एक समुदाय शामिल है जो लिखित नियमों का पालन नहीं करते हैं. इस तरह के मठों की स्थापना 16वीं शताब्दी में मधुसूदन सरस्वती ने की थी.

क्या होते हैं इनके काम? 
इस तरह अखाड़ों, आश्रम और अखाड़े हिंदू धर्म के अलग-अलग पहलू होते हैं जिनमें धर्म को समर्पित ऋषि जीवन यापन करते हैं. आश्रम में रहनेे वाले ऋषि भगवान की पूजा पाठ में लीन रहते हैं और वहीं अपनेे परिवार के साथ रहते हैं तो वहींं मठ में गुरु द्वारा अपनेे शिष्यों को शिक्षा और उपदेश दिए जाते हैं. जो हिंदू धर्म से संबंधित होते हैं. इसके अलावा अखाड़े में शैव, वैरागी और उदासीन साधू होते हैं जो शस्त्र विद्या में भी निपूर्ण होते हैं.

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