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क्या है अब्राहम अकॉर्ड, जिसमें शामिल होने के लिए मुस्लिम देशों को मजबूर कर रहा अमेरिका?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मुस्लिम देशों पर अब्राहम समझौते में शामिल होने के बढ़ते दबाव ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है. आइए जानें कि आखिर यह समझौता है क्या.

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  • पाकिस्तान ने समझौते में शामिल होने से सार्वजनिक तौर पर इनकार किया.

पश्चिम एशिया के अशांत राजनीतिक माहौल के बीच अब्राहम समझौते को लेकर एक बार फिर दुनिया भर में बड़ी बहस छिड़ गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और ईरान समेत कई बड़े मुस्लिम देशों से इस ऐतिहासिक समझौते का हिस्सा बनने की पुरजोर अपील की है. अमेरिका इस कूटनीतिक ढांचे के जरिए इजरायल और अरब जगत के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी को खत्म कर दोस्ती की नई इबारत लिखना चाहता है. हालांकि, ईरान के साथ चल रही तनातनी और फिलिस्तीन संकट के कारण कई मुस्लिम बाहुल्य राष्ट्रों के लिए इस समझौते को स्वीकार करना एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील मुद्दा बन गया है. 

डोनाल्ड ट्रंप की नई अपील और अमेरिका का कड़ा रुख

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पश्चिम एशिया में शांति स्थापना के नाम पर एक नया कूटनीतिक दांव खेला है. ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन जैसे बड़े मुस्लिम-बहुल देशों से सीधे तौर पर इस शांति ढांचे से जुड़ने की वकालत की है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इन देशों से आग्रह किया है कि वे ईरान के साथ चल रही बातचीत में सक्रिय रूप से भाग लें और इजरायल के साथ अपने आधिकारिक संबंधों को सामान्य करें. ट्रंप की इस नई पहल ने इन देशों के सामने बड़ी दुविधा खड़ी कर दी है. 

अमेरिका की चेतावनी और मुस्लिम देशों के सामने बड़ी दुविधा

इस समझौते को लेकर अमेरिका का रुख बेहद आक्रामक नजर आ रहा है, जिसने कई मुस्लिम शासकों की रातों की नींद उड़ा दी है. राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ संकेत दिए हैं कि यदि इन देशों ने इस अमेरिकी शांति पहल का खुलकर समर्थन नहीं किया, तो आने वाले समय में वाशिंगटन के साथ उनके द्विपक्षीय और कूटनीतिक संबंधों पर इसका बेहद गंभीर और नकारात्मक असर पड़ सकता है. अमेरिका की यह परोक्ष चेतावनी इन देशों के लिए एक बड़ी मजबूरी बनती जा रही है, जिससे वे आसानी से पीछे नहीं हट सकते हैं. 

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क्या है अब्राहम समझौता? 

अब्राहम एकॉर्ड या अब्राहम समझौता मूल रूप से अमेरिका की मध्यस्थता से साल 2020 में शुरू किया गया एक बेहद महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता है. इस ऐतिहासिक पहल का मुख्य उद्देश्य इजरायल और अरब देशों के बीच कूटनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक सुरक्षा संबंधों को पूरी तरह सामान्य और मजबूत बनाना है. इस समझौते को ‘अब्राहम’ नाम देने के पीछे एक खास वजह है; यह नाम यहूदी धर्म, इस्लाम और ईसाई धर्म की साझा धार्मिक और ऐतिहासिक जड़ों को ध्यान में रखकर एकजुटता के प्रतीक के रूप में चुना गया है.

समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देश और समूह का विस्तार

इस ऐतिहासिक शांति समझौते की शुरुआत 15 सितंबर, 2020 को हुई थी, जब व्हाइट हाउस में इजरायल के साथ संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन ने इस पर हस्ताक्षर किए थे. इसके बाद अमेरिका के प्रयासों से इस कूटनीतिक ढांचे का विस्तार किया गया और बाद में इसमें अफ्रीकी देशों मोरक्को तथा सूडान को भी आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया. कूटनीति के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए साल 2025 में कजाकिस्तान भी औपचारिक रूप से इस खास समूह का एक अहम हिस्सा बन गया.

सऊदी अरब और ईरान को शामिल करने की अमेरिकी रणनीति

अमेरिकी रणनीति के तहत सऊदी अरब और ईरान को इस समझौते में लाना बेहद जरूरी माना जा रहा है, क्योंकि ये दोनों पश्चिम एशिया के सबसे शक्तिशाली देश और मुस्लिम जगत के बड़े लीडर हैं. यदि ये दोनों देश इजरायल को मान्यता देकर संबंध सामान्य कर लेते हैं, तो मध्य-पूर्व के कई बड़े वैश्विक विवादों का हमेशा के लिए अंत हो जाएगा. वर्तमान में इस समझौते की बदौलत ही संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल के बीच व्यापारिक और सामाजिक संबंध इतिहास में सबसे बेहतरीन दौर से गुजर रहे हैं.

ईरान और सऊदी अरब का इजरायल पर पुराना स्टैंड

अमेरिकी दबाव के बावजूद इस रास्ते में ऐतिहासिक अड़चनें बरकरार हैं, क्योंकि ईरान आज भी वैचारिक रूप से इजरायल के अस्तित्व को ही पूरी तरह खारिज करता है. दूसरी ओर, मुस्लिम जगत का नेतृत्व करने वाले सऊदी अरब का स्पष्ट रुख है कि जब तक फिलिस्तीन समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता और फिलिस्तीनियों को उनका स्वतंत्र देश नहीं मिल जाता, तब तक वह इजरायल से कोई रिश्ता नहीं रखेगा. गाजा पर इजरायली सैन्य कार्रवाई के बाद से तो इन देशों में जनभावनाएं और भी ज्यादा भड़क चुकी हैं. 

पाकिस्तान का इनकार

डोनाल्ड ट्रंप की इस नई कूटनीतिक अपील को पाकिस्तान ने सार्वजनिक और आधिकारिक रूप से सिरे से खारिज कर दिया है, क्योंकि पाकिस्तान भी उन देशों में शामिल है जो इजरायल को राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं देते हैं. हालांकि, ट्रंप का दावा है कि इस समझौते से जुड़े देशों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में भारी सुधार आया है. इस सिलसिले में ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, यूएई के राष्ट्रपति, कतर के अमीर, पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर और तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन समेत कई राष्ट्राध्यक्षों से गहन चर्चा की है. 

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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