US Leaving NATO Impact: अमेरिका नाटो से अलग हुआ तो किसे होगा सबसे ज्यादा फायदा, क्या खत्म हो जाएगा रूस-यूक्रेन युद्ध?
US Leaving NATO Impact: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो छोड़ने की चेतावनी ने वैश्विक राजनीति में खलबली मचा दी है. आइए जानें कि इसका सीधा फायदा किन-किन देशों को मिल सकता है.

US Leaving NATO Impact: दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन नाटो (NATO) की बुनियाद हिलती नजर आ रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया बयान ने यूरोपीय देशों की नींद उड़ा दी है. ट्रंप ने संकेत दिया है कि वह अमेरिका को नाटो से बाहर निकालने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. अगर ऐसा होता है, तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है. यह सिर्फ एक देश का गठबंधन छोड़ना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की पावर पॉलिटिक्स का रुख मोड़ देने वाली घटना साबित होगी.
ट्रंप की नाराजगी और नाटो से मोहभंग की वजह
डोनाल्ड ट्रंप की इस नाराजगी के पीछे मुख्य कारण ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई पर सहयोगी देशों का सुस्त रवैया है. ट्रंप का मानना है कि अमेरिका नाटो देशों की सुरक्षा का भारी बोझ उठा रहा है, लेकिन जब अमेरिका को समर्थन की जरूरत होती है, तो ये देश पीछे हट जाते हैं. उन्होंने नाटो को 'कागज का शेर' तक कह डाला है. दरअसल, नाटो का गठन सोवियत संघ के खतरे से निपटने के लिए किया गया था, लेकिन ट्रंप अब इसे अमेरिका के लिए एक घाटे का सौदा मानने लगे हैं, जो सिर्फ अमेरिकी संसाधनों का इस्तेमाल कर रहा है.
किसे होगा सबसे ज्यादा फायदा?
अमेरिका के अलग होते ही सबसे बड़ी लॉटरी रूस की लगेगी. नाटो की ताकत का मुख्य आधार अमेरिकी सेना और उसके परमाणु हथियार हैं. यदि अमेरिका हटता है, तो पूर्वी यूरोप के छोटे देशों के पास रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने का कोई ठोस जरिया नहीं बचेगा. व्लादिमीर पुतिन के लिए यह एक सुनहरा मौका होगा कि वह सोवियत संघ के पुराने गौरव को वापस पाने के लिए अपनी सैन्य गतिविधियों को और तेज कर सकें. नाटो की सामूहिक सुरक्षा की गारंटी खत्म होते ही रूस यूरोप के राजनीतिक नक्शे पर हावी हो सकता है.
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रूस-यूक्रेन युद्ध पर क्या होगा असर?
यूक्रेन के लिए अमेरिका का नाटो से हटना किसी बुरे सपने जैसा होगा. वर्तमान में यूक्रेन को मिलने वाली अधिकांश सैन्य मदद और खुफिया जानकारी अमेरिका के जरिए ही आती है. यदि ट्रंप हाथ खींच लेते हैं, तो यूक्रेन को मिलने वाली आर्थिक और हथियारों की सप्लाई रुक जाएगी. ऐसी स्थिति में युद्ध भले ही तुरंत खत्म न हो, लेकिन पलड़ा पूरी तरह रूस के पक्ष में झुक जाएगा. रूस आसानी से यूक्रेन को समझौते की मेज पर ला सकेगा या फिर पूरे क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेगा, क्योंकि यूरोपीय देश अकेले रूस का मुकाबला करने में सक्षम नहीं दिखते हैं.
प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दादागिरी
सिर्फ यूरोप ही नहीं, बल्कि एशिया और प्रशांत क्षेत्र में भी इसके गहरे परिणाम होंगे. अमेरिका के वैश्विक प्रभाव में कमी आते ही चीन को अपनी विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाने का मौका मिल जाएगा. अमेरिका का ध्यान जैसे ही नाटो से हटेगा, चीन ताइवान और दक्षिण चीन सागर में अपनी पकड़ और मजबूत करेगा. वैश्विक शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा और दुनिया एकध्रुवीय से हटकर चीन और रूस के प्रभाव वाली बन जाएगी. अमेरिका का यह कदम उसके अपने अंतरराष्ट्रीय दबदबे को भी चोट पहुंचाएगा.
यूरोपीय देशों की सुरक्षा के लिए बड़ा सिरदर्द
फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों को अब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका के भरोसे रहने की आदत छोड़नी होगी. अमेरिका के बिना नाटो के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो जाएगा. ऐसे में यूरोपीय देशों को अपना रक्षा बजट कई गुना बढ़ाना पड़ेगा. उन्हें अपनी सेनाओं का पुनर्गठन करना होगा और एक नई यूरोपीय सेना के विचार पर काम करना होगा. यह प्रक्रिया न केवल महंगी होगी, बल्कि इसमें कई दशक लग सकते हैं. तब तक यूरोप एक अस्थिर और असुरक्षित क्षेत्र बना रह सकता है.
भारत पर क्या होगा असर?
इस उथल-पुथल के बीच भारत के लिए एक नई राह खुल सकती है. जब यूरोपीय देश अमेरिकी हथियारों पर अपनी निर्भरता कम करेंगे या विकल्पों की तलाश करेंगे, तब भारत के रक्षा विनिर्माण (Defense Manufacturing) क्षेत्र को बढ़ावा मिल सकता है. भारत एक किफायती और भरोसेमंद रक्षा निर्यातक के रूप में उभर सकता है. यूरोपीय देशों को नए रक्षा साझेदारों की जरूरत होगी और भारत अपनी 'मेक इन इंडिया' पहल के जरिए इस शून्य को भर सकता है. यह भारत के लिए ग्लोबल डिफेंस मार्केट में अपनी धाक जमाने का सही समय हो सकता है.
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Source: IOCL



























